मोदी काल के 12 वर्षों की प्रमुख विफलताएँ एवं आलोचना

एस आर दारापुरी 

26 मई 2026 को मोदी काल के 12 वर्ष पूरे हुए हैं। इस संबंध में मोदी सरकार द्वारा अपनी उपलब्धियों के संबंध में समाचार पत्रों एवं सोशल मीडिया पर बड़े बड़े दावे किए गए हैं। समर्थक इसे भारत के परिवर्तन और वैश्विक उभार का काल मानते हैं, जबकि आलोचक इसे बढ़ती असमानता, बेरोज़गारी और सामाजिक ध्रुवीकरण का दौर बताते हैं। वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के लिए उपलब्ध आँकड़ों और तथ्यों पर आधारित विश्लेषण पर मोदी काल की प्रमुख विफलताएँ और आलोचना निम्न हैं:-

1. रोजगार सृजन: सबसे बड़ी चुनौती

2014 में भाजपा ने बड़े पैमाने (2 करोड़ प्रति वर्ष) पर रोजगार सृजन का वादा किया था।

आँकड़े

2026 में बेरोजगारी दर लगभग 5.1–5.2 प्रतिशत रही।
श्रम बल भागीदारी दर (Labour Force Participation Rate) लगभग 55–56 प्रतिशत रही।
महिला श्रम बल भागीदारी दर लगभग 34–35 प्रतिशत रही।
आलोचना

आलोचकों का कहना है कि आर्थिक विकास के बावजूद पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजित नहीं हो सके। विशेष रूप से युवाओं में बेरोजगारी एक गंभीर चिंता बनी हुई है।

2. नोटबंदी (2016): सबसे विवादास्पद निर्णय

8 नवंबर 2016 को सरकार ने 500 और 1000 रुपये के नोटों को अमान्य घोषित कर दिया।

आँकड़े

उस समय प्रचलन में मौजूद कुल मुद्रा का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ।
बाद में 99.3 प्रतिशत से अधिक नोट बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आए।
आलोचना

काले धन पर निर्णायक प्रहार नहीं हो सका।
असंगठित क्षेत्र, छोटे व्यापारियों और दैनिक मजदूरों को भारी नुकसान हुआ।
हालाँकि समर्थकों का दावा है कि इससे डिजिटल भुगतान और कर अनुपालन को बढ़ावा मिला।

3. बढ़ती आर्थिक असमानता

आलोचकों के अनुसार:

आर्थिक विकास का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हुआ।
देश की संपत्ति का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत कम लोगों के हाथों में केंद्रित होता गया।
बड़े कॉरपोरेट समूहों और सरकार के संबंधों को लेकर लगातार बहस होती रही।
4. सामाजिक ध्रुवीकरण

आलोचकों का मत है कि:

धार्मिक और साम्प्रदायिक तनाव बढ़े हैं।
राजनीतिक विमर्श अधिक विभाजित हुआ है।
अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।
दूसरी ओर समर्थक इसे राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का दौर मानते हैं।

5. लोकतांत्रिक संस्थाएँ और नागरिक स्वतंत्रताएँ

कई विद्वानों, विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार संगठनों ने चिंता व्यक्त की है कि:

प्रेस की स्वतंत्रता पर दबाव बढ़ा।
जाँच एजेंसियों के उपयोग को लेकर विवाद बढ़े।
संसद और अन्य संस्थाओं की स्वायत्तता पर प्रश्न उठे।
असहमति व्यक्त करने वालों के लिए सार्वजनिक स्थान अपेक्षाकृत संकुचित हुआ।
समर्थकों का तर्क है कि इससे शासन अधिक प्रभावी और निर्णायक बना है।

6. कृषि और ग्रामीण संकट

यद्यपि किसानों के लिए अनेक योजनाएँ लागू की गईं, फिर भी:

कृषि आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था कई क्षेत्रों में दबाव में रही।
कृषि कानूनों के विरुद्ध हुए किसान आंदोलन ने ग्रामीण असंतोष को उजागर किया।
निष्कर्ष

मोदी शासन के 12 वर्षों में रोजगार सृजन, नोटबंदी के प्रभाव, बढ़ती असमानता, सामाजिक ध्रुवीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़ी चिंताएँ इस काल की प्रमुख विफलताएं /आलोचनाएँ रही हैं।

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