Mahakal Lok Corridor : नंदी के पास बैठ पीएम मोदी ने की पूजा, महाकाल की आरती, अलग अंदाज में दिखे प्रधानमंत्री

पीएम नरेंद्र मोदी ने मंगलवार शाम को महाकाल कॉरिडोर का उद्घाटन किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महाकाल कॉरिडोर पहुंचे तो उनके साथ सीएम शिवराज भी नजर आए थे।  इससे पहले उज्जैन पहुंचने पर यहां उन्होंने पहले नंदी  और फिर महाकाल के दर्शन किये। पीएम मोदी ने यहां मंदिर में पूजा-अर्चना भी की। जो तस्वीरें सामने आई हैं उनमें नजर आया है कि पीएम मोदी ने बाबा महाकाल के दर्शन किये हैं। उस वक्त वहां मंदिर के पुजारी भी मौजूद थे।
पीएम मोदी का काफिला यहां पहुंचा था। महाकाल लोक के उद्घाटन के बाद पीएम मोदी पूरे परिसर का जायजा लेते नजर आए। उनके साथ राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी नजर आए।

महाकाल कॉरिडर के उद्घाटन से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने पारंपरिक धोती और गमछा पहनकर शाम छह बजे मंदिर में प्रवेश किया और गर्भगृह में महाकाल की पूजा की। मोदी के साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय नागर विमानन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी थे। देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से महाकालेश्वर का मंदिर उज्जैन में स्थित है। इससे पहले मोदी अहमदाबाद से इंदौर पहुंचे जहां हवाई अड्डे पर प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा, जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने उनका स्वागत किया। इसके बाद मोदी हेलीकॉप्टर से उज्जैन पहुंचे जहां प्रदेश के राज्यपाल मंगू भाई पटेल और मुख्यमंत्री चौहान ने उनका स्वागत किया। महाकाल मंदिर पहुंचने के बाद मोदी ने भगवान शिव की पूजा के लिए गर्भगृह में प्रवेश किया।

 पीएम मोदी गर्भगृह में लगभग आधा घंटा रुके 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भगवान महाकाल की विधिवत पूजा अर्चना की। मंदिर के गर्भगृह में लगभग आधा घंटा रुके। इसके बाद वो वहां से बाहर निकले। उनके साथ राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहन और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया नजर आए थे।

पीएम मोदी ने नंदी के पास बैठ कर भी की पूजा-अर्चना

महाकाल मंदिर में शीष झुकाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दोनों हाथ जोड़े मंदिर से बाहर निकलते नजर आए। महाकाल कॉरिडोर के उद्घाटन से पहले पीएम मोदी की शिव साधना को पूरे देश ने देखा। पीएम मोदी ने नंदी के पास बैठकर भी उनकी पूजा-अर्चना की है।

PM मोदी ने महाकाल को दिखाई आरती

महाकाल के सामने हाथ जोड़कर बैठे पीएम मोदी की कई तस्वीरें सामने आई हैं। मंदिर में आरती कर रहे पीएम मोदी का वीडियो भी सामने आया है। मंदिर के पुजारी भी पीएम मोदी के साथ नजर आ रहे हैं।

महाकाल मंदिर में पीएम मोदी ने की शिव साधना

उज्जैन पहुंचने के बाद पीएम मोदी महाकाल मंदिर पहुंचे। यहां पीएम मोदी शिव साधना में लीन नजर आए। महाकाल के सामने बैठ कर पीएम मोदी ने उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा की है। इस दौरान मंदिर के पुजारी भी वहां नजर आए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के गर्भगृह में पहुंचकर पूजन किया। इसके बाद उन्होंने नंदी हाल में बैठकर कुछ देर ध्यान किया। महाकाल लोक लोकार्पण का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे उज्जैन में मौजूद लोगों में उत्साह बढ़ रहा है। दरअसल कि मंगलवार को नगर में महा महोत्सव के साथ ही दीपोत्सव मनाया जा रहा है। महाकाल लोक प्रोजेक्ट को दो फेज में 856 करोड़ रुपए की लागत से डेवलप किया जा रहा है। 2.8 हेक्टेयर में फैला महाकाल परिसर 47 हेक्टेयर का हो जाएगा। इसमें 946 मीटर लंबा कॉरिडोर है। इसी पर चलकर भक्त गभगृह तक पहुंचेंगे।

सैलानी भव्य नजारे का लुत्फ उठाएंगे

महाकाल लोक फेज-1 के उद्घाटन के बाद यहां भव्य नजारा नजर आया है। बताया जा रहा है कि अब यहां आने वाले सैलानियों को मंदिर की भव्यता का एक अलग ही आनंद मिलेगा। सैलानियों को यहां विश्व स्तरीय सुविधा मिलेगी। कॉरिडोर में शिव तांडव स्त्रोत, शिव विवाह, महाकालेश्वर वाटिका, महाकालेश्वर मार्ग, शिव अवतार वाटिका, प्रवचन हॉल, नूतन स्कूल परिसर, गणेश विद्यालय परिसर, रूद्रसागर तट विकास, अर्ध पथ क्षेत्र, धर्मशाला और पार्किंग सर्विसेस भी तैयार किया जा रहा है। ऐसे में दर्शालुओं को दर्शन करने और कॉरिडोर घूमने के दौरान भव्य अनुभव होने वाला है।
दरअसल देशभर के 12 ज्योतिर्लिंगों में उज्जैन का महाकाल मंदिर अकेला दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। मंदिर आज जैसा दिखता है, पुराने समय में ऐसा नहीं था। 11वीं सदी में गजनी के सेनापति और 13वीं सदी में दिल्ली के शासक इल्तुतमिश के मंदिर ध्वस्त कराने के बाद कई राजाओं ने इसका दोबारा निर्माण करवाया।

द्वापर युग से पहले का है मंदिर

संस्कृति और पुरातत्वविद् भगवती लाल राजपुरोहित ने बताया कि मंदिर को मुस्लिम शासकों ने हमला कर तोड़ा, तो कई राजवंशों ने इसका दोबारा निर्माण करवाया। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाकाल मंदिर की स्थापना द्वापर युग से पहले की गई थी। जब भगवान श्रीकृष्ण उज्जैन में शिक्षा प्राप्त करने आए, तो उन्होंने महाकाल स्त्रोत का गान किया था। गोस्वामी तुलसीदास ने भी महाकाल मंदिर का उल्लेख किया है। छठी शताब्दी में बुद्धकालीन राजा चंद्रप्रद्योत के समय महाकाल उत्सव हुआ था। इसका मतलब उस दौरान भी महाकाल उत्सव मनाया गया था। इसका उल्लेख बाण भट्ट ने शिलालेख में किया था।

राजा भोज ने निर्माण करवाया

7वीं शताब्दी के बाण भट्‌ट के कादंबिनी में महाकाल मंदिर का विस्तार से वर्णन मिलता है। 11वीं शताब्दी में राजा भोज ने कई मंदिरों का निर्माण करवाया, इनमें महाकाल मंदिर भी शामिल है। उन्होंने महाकाल मंदिर के शिखर को और ऊंचा करवाया था।

महाकाल मंदिर पर कब-कब आक्रमण?

इतिहास पलटकर देखें तो उज्जैन में 1107 से 1728 ई. तक यवनों का शासन था। इनके शासनकाल में 4500 वर्षों की हिंदुओं की प्राचीन धार्मिक परंपराओं-मान्यताओं को खंडित और नष्ट करने का प्रयास किया गया। 11वीं शताब्दी में गजनी के सेनापति ने मंदिर को नुकसान पहुंचाया था। इसके बाद सन् 1234 में दिल्ली के शासक इल्तुतमिश ने महाकाल मंदिर पर हमला कर यहां कत्लेआम किया। उसने मंदिर भी नष्ट किया था। मुस्लिम इतिहासकार ने ही इसका उल्लेख अपनी किताब में किया है। धार के राजा देपालदेव हमला रोकने निकले। वे उज्जैन पहुंचते, इससे पहले ही इल्तुतमिश ने मंदिर तोड़ दिया। इसके बाद देपालदेव ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।

जब राजा सिंधिया का खून खौल उठा

मराठा राजाओं ने मालवा पर आक्रमण कर 22 नवंबर 1728 में अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। इसके बाद उज्जैन का खोया हुआ गौरव पुनः लौटा। 1731 से 1809 तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही। मराठों के शासनकाल में उज्जैन में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं। इनमें पहली- महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग को पुनः प्रतिष्ठित किया गया। दूसरा- शिप्रा नदी के तट पर सिंहस्थ पर्व कुंभ शुरू हुआ।

मंदिर का पुनर्निर्माण ग्वालियर के सिंधिया राजवंश के संस्थापक महाराजा राणोजी सिंधिया ने कराया था। बाद में उन्हीं की प्रेरणा पर यहां सिंहस्थ समागम की भी दोबारा शुरुआत कराई गई। इतिहासकारों के मुताबिक, महाकाल के ज्योतिर्लिंग को करीब 500 साल तक मंदिर के भग्नावशेषों में ही पूजा जाता रहा था। मराठा साम्राज्य विस्तार के लिए निकले ग्वालियर-मालवा के तत्कालीन सूबेदार और सिंधिया राजवंश के संस्थापक राणोजी सिंधिया ने जब बंगाल विजय के रास्ते में उज्जैन में पड़ाव किया, तो महाकाल मंदिर की दुर्दशा देख उनका खून खौल गया। उन्होंने यहां अपने अधिकारियों और उज्जैन के कारोबारियों को आदेश दिया कि बंगाल विजय से लौटने तक महाकाल महाराज के लिए भव्य मंदिर बन जाना चाहिए।

राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने अपनी आत्मकथा ‘राजपथ से लोकपथ पर’ में लिखा है कि राणोजी अपना संकल्प पूरा कर जब वापस उज्जैन पहुंचे, तो नवनिर्मित मंदिर में उन्होंने महाकाल की पूजा अर्चना की। इसके बाद राणो जी ने ही 500 साल से बंद सिंहस्थ आयोजन को भी दोबारा शुरू कराया।

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