सुनो सरकारी स्कूलों को बंद करने वालों, जस्टिस सुधीर अग्रवाल के फैसले पर काम करो! 

2015 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने दिया था सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने की अनिवार्यता का आदेश

आंदोलनों के बाद रुका हुआ है यूपी के 5000 सरकारी स्कूल बंद होने का निर्णय

राजस्थान सरकार अब बंद करने जा रही है 312 और सरकारी स्कूल

 

चरण सिंह 

क्या देश में शिक्षा माफिया इतने हावी हो चुके हैं कि सरकारों ने गरीब बच्चों के भविष्य को बर्बाद करने और लोगों पर पढ़ाई का बेतहाशा बोझ डालने की ठान ली है। उत्तर प्रदेश में 5000 सरकारी स्कूल बंद होने जा रहे थे कि जो निर्णय आंदोलनों के बाद फ़िलहाल रोक दिया गया है। अब राजस्थान सरकार 312 सरकारी स्कूल और बंद करने जा रही है। मतलब गरीब बच्चे पढ़ ने लें। वैसे तो बीजेपी अपने राज की तुलना राम राज से करती है पर बीजेपी सरकारों में शराब के सरकारी ठेकों की संख्या लगातार बढ़ी है और सरकारी स्कूल लगातार कम हो रही है।

दिलचस्प बात यह है कि सरकारें सरकारी स्कूलों में 50 से कम बच्चे होने का हवाला देकर सरकारी स्कूल बंद कर रही हैं। वह बात दूसरी है कि नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स के बच्चे महंगे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं। दरअसल ये सब फैसले शिक्षा माफिया के दबाव में लिए जा रहे हैं। वैसे भी अधिकतर प्राइवेट स्कूल नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स के हैं। यदि सरकारें गरीब बच्चों की शिक्षा के प्रति गंभीर होतीं तो सरकारी स्कूल बंद ही न होने देतीं। जो लोग सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने और शिक्षा का स्तर घटिया होने की बात करते हैं वे लोग इलाहाबाद हाई कोर्ट का वह फैसला याद करें, जिसमें उत्तर प्रदेश में सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों की सरकारी स्कूलों में पढ़ने की अनिवार्यता की बात कही गई थी।

दरअसल 2015 में शिवकुमार पाठक और अन्य कई याचिकाओं को स्वीकार करते हुए जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने फैसला दिया था कि सरकारी अधिकारी, जनप्रतिनिधि और सरकारी सुविधा लेने वाले लोगों के बच्चों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने की अनिवार्यता की जाए। इतना ही नहीं जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव को छह महीने में रिपोर्ट देने और इस पर अमल न करने पर संबंधित व्यक्ति पर दंडात्मक कार्रवाई करने उनके प्रोन्नति रोकने का भी आदेश दिया था। क्या हुआ ? उस समय उस समाजवादी पार्टी की सरकार थी जो योगी सरकार के सरकारी स्कूलों को बंद करने के निर्णय पर फ़िलहाल रोक लगाने का श्रेय लेने का प्रयास कर रही है। उस समय अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। न तो अखिलेश यादव ने जस्टिस सुधीर अग्रवाल के उस आदेश पर काम किया और न ही मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने।

यदि उत्तर प्रदेश में जस्टिस सुधीर अग्रवाल का सरकारी फायदा उठाने वाले लोगों के बच्चों की सरकारी स्कूलों में पढ़ने की अनिवार्यता के आदेश को लागू कर दिया जाता तो देश में कोई सरकारी स्कूल बंद ही न होता। सरकारी स्कूलों में बच्चे भी पर्याप्त में मात्रा में होते और शिक्षा का स्तर भी सुधर जाता। कल्पना कीजिये कि डीएम, एसपी, विधायक और सांसद के बच्चे जब सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो फिर प्राइवेट स्कूलों में कौन अपने बच्चों को पढ़ाएगा ? हर स्तर से सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूलों से भी अच्छे हो जाएंगे।

दरअसल यह सरकारों द्वारा माहौल बनाया जाता कि जिस विभाग को बंद करना होता है उसकी कमियां गिनानी शुरू कर दी जाती है। सुधार के प्रयास नहीं होते हैं। ऐसे ही सरकारी अस्पताल बंद किये जा रहे हैं और ऐसे ही सरकारी स्कूल। कभी समाजसेवा के पेशा माने जाने वाले शिक्षा और चिकित्सा के पेशे में सबसे अधिक लूट खसोट और गिरावट आई है। लोगों को इससे कोई मतलब नहीं कि उनके बच्चों का क्या होगा ? युवाओं का यह हाल है जो युवा अपने दादा की पेंशन पर निर्भर है वह पेंशन बंद करने के सरकारों के फैसले का समर्थन कर रहा है।

आज का युवा न तो अपने करियर के प्रति जागरूक है और न ही देश और समाज के प्रति। जरा जरा सी बात पर आंदोलन करने वाले राजनीतिक और सामाजिक दलों में से कोई दल जस्टिस सुधीर अग्रवाल के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने की अनिवार्यता के फैसले के पक्ष में आंदोलन न कर सका।

अब राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर को ही देख लीजिये। इन साहब का कहना है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाने या बरकरार रखने की सारी कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं। इनका मानना है कि प्राइवेट स्कूलों में बच्चे बढ़ रहे हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में संख्या तेजी से घट रही है।  शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने सीधे तौर पर नाम लिए बिना स्कूलों को बंद किए जाने के फैसले के पीछे कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों को जिम्मेदार ठहराया है। इनसे कोई पूछे कि इनके बच्चे कहां पढ़े हैं या पढ़ रहे हैं। यदि पौते पोतियां हैं तो कहां पढ़ रहे हैं। अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ाएंगे नहीं और बात करेंगे सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की। खुद वे सरकारी शिक्षक और शिक्षिकाएं अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं जो सरकार से भारी भरकम वेतन लेते हैं।

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