क्या इतिहास अतीत का एक लेखा-जोखा, मात्र ही है, या‌ इससे‌ कुछ सबक भी ‌ मिलता है ,?

प्रोफेसर राजकुमार जैन

आईटीएम विश्वविद्यालय ग्वालियर द्वारा आयोजित ‌ गांधी विचार श्रृंखला, अक्टूबर 9 -10 -11, 2025 को ‌ महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु,‌ डॉ‌ राममनोहर लोहिया ‍ की इतिहास दृष्टि पर ‌ आयोजित सेमिनार में शिरकत करते ‌हुए गांधी पर प्रोफेसर शशि भूषण उपाध्याय, ‌ नेहरू पर प्रोफेसर आलोक बाजपेई तथा डॉ लोहिया पर प्रोफेसर अजीत झा ने अपने आलोचनात्मक तथ्य, तर्क प्रस्तुत‌ करते हुए विषय की गहन पड़ताल की।
‌ इतिहास लेखन के मुख्तलिफ ‌ पहलुओं पर डॉक्टर लोहिया ने अपने एक लेख ‘भारतीय इतिहास लेखन’ में इसकी गहन गंभीर, विस्तृत मीमांसा की है।
“मैं कौन हूं? हम कौन हैं? दर्शन इन सवालों का अध्ययन करता है। इतिहास भी उतना ही करता है। ज्यादा ठोस रूप में, और शायद उसका असर भी ज्यादा गहरा होता है। इतिहास मानविकी का आधार है, जैसे गणित विज्ञान का। इतिहास हमें वह औजार और मसाला प्रदान करता है, जिससे मनुष्य का मन बनता है, जिसका सबसे बड़ा हिस्सा सारी दुनिया में किसी भी जगह राष्ट्रीय मन होता है”।
‌ “इतिहास लेखन का ‌ एक बड़ा ही अनाकर्षक रूप वह है, जिसमें तारीखों और व्यक्तियों के कार्यों का बिल्कुल सपाट वर्णन होता है। उसको जोड़ने वाली कड़ियों की, चाहे वे कितनी भी मामूली या दुष्ट हो, कोई चर्चा नहीं होती, लेकिन चारण – काव्य के उद्धरणों और पदवियों आदि के वर्णन की भरमार होती है। ऐसे लेखन में एक और भी गंभीर दोष होता है। अचानक ही बीच में किसी अंग्रेज का नाम आ जाता है, कोई धर्म- प्रचारक या हाकिम, कि वह इस विषय का अधिकारीक विद्वान है और फिर उसका खंडन या समर्थन आवश्यक हो जाता है। इस मूर्खतापूर्ण उद्यम में बेकार भरती की चीजे भी बहुतेरी हो सकती है”।
“इतिहास केवल विवरण नहीं है। विवरण में तो चुनाव करना ही पड़ता
है, इतिहास में वह चुनाव ऐसी हद तक करना पड़ता है, जहां इसमें बड़े खतरे होते हैं। इस कारण अधिकांश इतिहास लेखन – मूर्खतापूर्ण और ‌ त्रुटि‌यो से भरा होता है। इसका कुछ हिस्सा ही ऐसा होता है जिससे सत्य को आंशिक रूप में समझा जा सके और मनुष्य का मन उठे या शिक्षित हो। बुरे ढंग से लिखे गए इतिहास का भविष्य पर उतना ही असर पड़ता है, जितना अच्छे ढंग से लिखे गए इतिहास का, बल्कि और ज्यादा। इतिहास अतीत का अच्छा या बुरा पुनर्जीवित रूप है, इसलिए वह एक हद तक व्यक्ति और राष्ट्र की चेतना के स्वरूप को निर्धारित करता है”।
“इतिहास लेखन किसी हद तक इतिहास का निर्माण भी होता है। इतिहास अतीत को पुनर्जीवित करता है। वह समय के प्रवाह को उलटने की एक चेष्टा है। जरूरी नहीं है कि सभी स्थानों पर सारे समय को उलटने की कोशिश हो, केवल उस देश- काल को जिसे पुनर्जीवित करना होता है, समय के संपूर्ण प्रभाव को उलटना असंभव है और उसकी चेष्टा व्यर्थ है। चुनाव करना पड़ता है। कितने भी सीमित क्षेत्र में किसी एक दिन का अधिक से अधिक पूर्ण विवरण देने में भी तथ्यों का चुनाव करना पड़ता है। इसके अलावा दूसरी बात है कि बहुत सी बातें हमेशा के लिए लुप्त हो जाती है, और कुछ की जानकारी बड़ी मुश्किल से हासिल होती है”।
“पिछले एक हजार सालों में भारत का इतिहास -लेखन एक विचित्र प्रकार के अंतरराष्ट्रीय इतिहासकारों के हाथ में रहा है। फरिश्ता से विंसेंट स्मिथ तक इतिहास के इन अंतरराष्ट्रीय कीड़ा- छोकरो की एक लंबी वंशावली है। उन्होंने तथ्यों को चुना। इसमें उनका एक लक्ष्य था। उनका लक्ष्य था देश में विदेशी शासन को मजबूत करना। जिसका एक अंश, विद्वान अंश, ‌ वे स्वयं भी थे। मेगास्थनीज और फाह्यान ने भी चुनाव किया था। विदेशी विजय का अंग न होने कारण उनका ढंग दूसरा था। फिर भी, मेगास्थनीज से फरिश्ता और उसके आगे तक के सिलसिले को खोजना दिलचस्प होगा। लेकिन पहली और अनिवार्य आवश्यकता विंस्टन स्मिथ तक के इतिहासकारों का गहरा और विस्तृत अध्ययन करने की है। इस काम को पूरे किया बिना इस देश में थोड़ा बहुत सच्चा इतिहास लेखन भी संभव नहीं है। इन इतिहासकारों ने समर्पण के अवगुण को समन्वय गुण बना दिया है। उन्होंने पिछले एक हजार साल के इतिहास को‌ और उसके पहले के कुछ पहलुओं को भी इस तरह रखा है कि ज्यादातर हिंदुस्तानी आज शर्म और यश का फर्क नहीं जानते”। अध्यक्षीय ‌ ‌संबोधन प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी मेरी थी, उसकी वीडियो‌ रिपोर्ट‌ संलग्न है।

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