मैं मिला हूं उन लड़कों से…

— एक भावनात्मक दस्तावेज़ उन अनकहे संघर्षों का

दीपक कुमार तिवारी।

मैं मिला हूं उन लड़कों से जो घर से निकलते हैं तो अपने सपनों की गठरी लेकर निकलते हैं — आंखों में चमक होती है, दिल में जोश होता है, लेकिन समय की मार और अपनों की उम्मीदों के नीचे वह खुद को कहीं खो बैठते हैं। धीरे-धीरे वे अपने ही सपनों को भूलने लगते हैं और अपनों के लिए जीने का हुनर सीख जाते हैं। कुछ लड़के तो वैसे भी अपनों के सपनों को पूरा करने के लिए ही घर से निकलते हैं, लेकिन इस सफर में वे अपना लड़कपन, अपनी हंसी, अपनी मासूमियत, सब कुछ पीछे छोड़ आते हैं। वो भी घर को याद करते हैं, मां के हाथों की रोटी को, पिता की डांट को, दोस्तों की मस्ती को, लेकिन कभी रोते नहीं। क्योंकि उन्हें सिखाया गया है — “लड़के रोते नहीं।”

मैं मिला हूं उन लड़कों से जो अपने लंबे बालों और बड़ी दाढ़ी में खुद को छुपा लेते हैं, शायद इस उम्मीद में कि उनकी पहचान इनमें कहीं सुरक्षित रह जाएगी। लेकिन समय के साथ उनके बाल और दाढ़ी भी उनके सपनों की तरह सफेद होने लगते हैं — सूने, थके और बोझिल। मैं मिला हूं उन लड़कों से जो किताबों में खुद को खो चुके हैं, जो मशीनों के नीचे, लैपटॉप की रोशनी में, फाइलों की धूल में, और एक्सेल शीट के नंबरों में अपना वजूद ढूंढते हैं। फिर भी जब जिंदगी सामने मुस्कुराकर खड़ी होती है, तो ये लड़के भी मुस्कुराते हैं — झूठी, मगर हौसले से भरी मुस्कान के साथ। और दुनिया कहती है, “ये लड़के बेपरवाह हैं।”

मैं मिला हूं उन लड़कों से जिनके पास अपने लिए कोई सपना नहीं होता। जो दौड़ते हैं उस रेस में जो कभी उनकी थी ही नहीं। उनका सपना बस इतना सा था कि दोस्त की सेकंड हैंड स्प्लेंडर की पिछली सीट पर अपनी महबूबा को बैठाकर एक बार हवा से बातें कर सकें। उनकी दुनिया साइड मिरर से महबूबा के उड़ते बालों को देखने तक सिमटी थी। लेकिन सपनों का पीछा करते-करते वे खुद से ही दूर हो गए। अब न स्प्लेंडर है, न महबूबा — बस एक कंप्यूटर स्क्रीन है और उस पर खुली फाइलें हैं।

मैं मिला हूं उन लड़कों से जो खुद के लिए जीने से पहले दूसरों के लिए जीना सीखते हैं। उनकी मुस्कुराहटों के पीछे कहानियां होती हैं — थकी हुई, टूटी हुई, मगर अब भी खड़ी हुई। वे गैर-जिम्मेदार दिखते हैं, उनके कपड़े गंदे होते हैं, बाल बिखरे हुए, शायद कई दिन से न नहाए हों। लेकिन उनकी आत्मा में एक गहराई होती है, एक तड़प होती है — कुछ कर दिखाने की, कुछ बदलने की।

वे शायद मंदिर नहीं जाते, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे ईश्वर को नहीं मानते। वे बस इतने व्यस्त हैं कि खुद के लिए मांगना भी भूल गए हैं। मांगते हैं तो अपनों के लिए — मां के लिए आराम, पिता के लिए गर्व, बहन की शादी, भाई की पढ़ाई, और दोस्त की मुस्कान।

मैं मिला हूं उन लड़कों से, जो रात के 11:40 पर अपनी सेकंड हैंड स्प्लेंडर को बाहर खड़ी करके, टूटी हुई थाली में मैगी-चावल बनाकर खाते हैं — और थक कर मुस्कुराते हैं। उनका संघर्ष कोई नहीं देखता, लेकिन वे जानते हैं कि हर सुबह फिर से लड़ना है — क्योंकि वे लड़के हैं, और लड़के रोते नहीं।

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