हरियाणा की शिक्षक ट्रांसफर पॉलिसी, कोर्ट में उलझाने की रणनीति

कपल केस अंक हटाना – परिवार पर कुठाराघात, नये नियमों में है विरोधाभास

 

हरियाणा की नई शिक्षक ट्रांसफर पॉलिसी शिक्षकों को राहत देने के बजाय कोर्ट की उलझनों में फँसाने वाली दिख रही है। इसमें कपल केस अंक हटाना परिवारों पर कुठाराघात है। पाँच साल बनाम पंद्रह साल का विरोधाभास नीति को अव्यावहारिक बनाता है। दरअसल यह पूरी तरह से कोर्ट में उलझाने की रणनीति प्रतीत होती है। सरकार की नीयत और नीति पर सवाल इसलिए उठते हैं क्योंकि वादे और जमीनी हकीकत मेल नहीं खाते। नतीजतन यह नीति शिक्षकों के लिए बोझ और सरकार के लिए केवल जुमलेबाज़ी का पिटारा बनकर रह गई है।

 

डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा में शिक्षकों की तबादला नीति लंबे समय से विवादों का विषय रही है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन हर सरकार शिक्षकों को पारदर्शी और न्यायपूर्ण तबादला नीति का आश्वासन देकर भी उसे लागू करने में विफल होती रही है। नई शिक्षक ट्रांसफर पॉलिसी भी उसी कड़ी का हिस्सा प्रतीत होती है। इसमें कुछ ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं, जो देखने में तो सुधारवादी लगते हैं, लेकिन गहराई से अध्ययन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि यह नीति शिक्षकों के हितों को साधने के बजाय उन्हें कोर्ट-कचहरी के चक्कर में उलझाने के लिए बनाई गई है। यह नीति न केवल शिक्षकों की व्यावसायिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात करती है बल्कि उनके पारिवारिक जीवन और सामाजिक स्थिरता को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करती है।

 

पॉलिसी की रूपरेखा और घोषित प्रावधान

 

नई नीति में सरकार ने घोषणा की है कि किसी भी शिक्षक का एक ही विद्यालय में अधिकतम ठहराव पाँच वर्ष तक ही रहेगा। इसके साथ ही यह भी तय किया गया है कि ब्लॉक स्तर पर पंद्रह वर्ष से अधिक समय तक कोई शिक्षक नहीं रहेगा। सरकार का दावा है कि यह प्रावधान शिक्षकों को स्थानांतरण का समान अवसर देने और एक ही स्थान पर लंबे समय तक टिके रहने की प्रवृत्ति को रोकने के लिए है। इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि बाल देखभाल अवकाश अर्थात चाइल्ड केयर लीव की अवधि को ठहराव की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा।

सरकार ने तबादलों को पाँच चरणों में विभाजित किया है। पहले चरण में प्राथमिक और जेबीटी शिक्षकों के अंतरजिला तबादले होंगे। दूसरे चरण में मॉडल संस्कृति स्कूलों के लिए तबादले किए जाएंगे। तीसरे चरण में प्रिंसिपल, हेड मास्टर और ब्लॉक स्तर के प्रमुख अधिकारियों के तबादले होंगे। चौथे चरण में पीजीटी और टीजीटी सहित अन्य रेगुलर शिक्षकों के तबादले होंगे और अंत में पाँचवें चरण में गेस्ट टीचर्स को स्थानांतरित किया जाएगा।

कागज़ पर यह व्यवस्था सुव्यवस्थित और सुनियोजित प्रतीत होती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इसमें कई विरोधाभास और असंगतियां हैं, जो न केवल शिक्षकों को निराश कर रही हैं बल्कि नीति की पारदर्शिता और सरकार की नीयत दोनों पर सवाल खड़े कर रही हैं।

 

कपल केस अंक हटाने का असंवेदनशील निर्णय

 

इस नीति की सबसे बड़ी और विवादास्पद खामी कपल केस अंक को पूरी तरह हटा देना है। अब तक की नीतियों में यह व्यवस्था थी कि यदि पति और पत्नी दोनों सरकारी कर्मचारी हों तो उन्हें एक ही जिले या समीपस्थ स्थान पर तैनात करने के लिए अतिरिक्त अंक दिए जाते थे। इसका उद्देश्य केवल सुविधा देना नहीं बल्कि परिवार को एक साथ रखने और पति-पत्नी के संयुक्त पारिवारिक जीवन की रक्षा करना था।

मुख्य सचिव कार्यालय ने सभी विभागों को यह निर्देश दिए थे कि कॉमन ट्रांसफर पॉलिसी में कपल केस को मान्यता दी जाए और अंक दिए जाएं। अन्य विभागों ने इस दिशा-निर्देश का पालन भी किया, लेकिन शिक्षा विभाग ने इसे नज़रअंदाज़ करते हुए कपल केस अंक को ही समाप्त कर दिया। यह न केवल विभागीय अवमानना है बल्कि शिक्षकों के संवैधानिक अधिकारों के साथ भी खिलवाड़ है।

पति-पत्नी को दूर-दूर नियुक्त करने का सीधा अर्थ है परिवार को तोड़ना, बच्चों के पालन-पोषण को प्रभावित करना और सामाजिक जीवन को अस्त-व्यस्त करना। यह निर्णय शिक्षकों के पारिवारिक अधिकारों पर कुठाराघात है और इसे पूरी तरह से संवेदनहीन कहा जा सकता है। निश्चय ही यह प्रावधान न्यायालय में चुनौती पाएगा और शिक्षकों को अपने अधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।

 

पाँच वर्ष और पंद्रह वर्ष का विरोधाभास

 

नीति में दूसरा बड़ा विरोधाभास यह है कि विद्यालय में अधिकतम ठहराव पाँच वर्ष का है जबकि ब्लॉक में पंद्रह वर्ष का। जब एक शिक्षक को हर पाँच वर्ष में विद्यालय बदलना ही है तो उसे पंद्रह वर्ष तक एक ही ब्लॉक में बाँधकर रखने का औचित्य क्या है। यह प्रावधान न तो प्रशासनिक दृष्टि से तर्कसंगत है और न ही शिक्षक हितैषी है।

यदि सरकार का उद्देश्य शिक्षकों को समान अवसर देना है तो ब्लॉक स्तर पर भी ठहराव की अवधि पाँच या अधिकतम सात वर्ष तय की जानी चाहिए। पंद्रह वर्ष तक किसी को एक ही ब्लॉक से बाँधे रखना शिक्षकों की पेशेवर स्वतंत्रता और कैरियर विकास पर गंभीर आघात है। यह नियम केवल औपचारिकता प्रतीत होता है, जिसका वास्तविक लाभ न तो विद्यार्थियों को मिलेगा और न ही शिक्षा व्यवस्था को।

 

कोर्ट में उलझाने की रणनीति

 

नई ट्रांसफर पॉलिसी के प्रावधान इस प्रकार बनाए गए हैं कि यह निश्चित रूप से न्यायालय में चुनौती पाएंगे। कपल केस अंक हटाना, ब्लॉक स्तर पर अव्यावहारिक ठहराव, तबादला चरणों की जटिलता और चयन प्रक्रिया की अस्पष्टता – ये सभी ऐसे बिंदु हैं जो किसी भी समय कानूनी विवाद का कारण बन सकते हैं।

यह स्पष्ट है कि सरकार जानबूझकर ऐसी नीतियां बना रही है जिन्हें अदालत में चुनौती मिले और मामला वर्षों तक लंबित रहे। इस तरह सरकार एक ओर तो दावा करती रहेगी कि उसने पारदर्शी नीति बनाई है, वहीं दूसरी ओर अदालत में मामला लंबित होने के कारण वह वास्तविक तबादले करने से बच निकलेगी। इसका सबसे बड़ा नुकसान शिक्षकों को होगा, जिन्हें वर्षों तक तबादले का इंतजार करना पड़ेगा।

 

शिक्षकों की पीड़ा और असंतोष

 

शिक्षकों के बीच इस नीति को लेकर गहरा असंतोष है। लंबे समय से शिक्षक संगठन सरकार से पारदर्शी नीति की मांग कर रहे हैं। लेकिन हर बार सरकार या तो वादाखिलाफी करती है या ऐसी नीति बनाती है जो शिक्षकों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती। कपल केस अंक का समाप्त होना शिक्षकों के लिए सबसे बड़ा झटका है। महिलाएँ शिक्षिकाएँ हों या पुरुष शिक्षक, सभी अपने परिवार के साथ रहने का अधिकार चाहते हैं। बच्चों की शिक्षा, माता-पिता की देखभाल और पति-पत्नी के संयुक्त जीवन का महत्व केवल शिक्षक ही समझ सकता है।

लेकिन सरकार ने इन सभी संवेदनाओं को दरकिनार कर दिया है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि सरकार की प्राथमिकता शिक्षक और उनका परिवार नहीं बल्कि केवल राजनीतिक लाभ और प्रशासनिक दिखावा है।

 

नीयत और नीति दोनों संदिग्ध

 

सरकार ने बार-बार घोषणा की कि नई पॉलिसी पारदर्शी और डिजिटल होगी, लेकिन जब तक नीयत साफ़ नहीं होगी, तब तक कोई भी नीति शिक्षकों के लिए लाभकारी नहीं हो सकती। नीति की भाषा और सरकार के वादे जितने चमकदार हैं, उसकी वास्तविकता उतनी ही खोखली है। यही कारण है कि शिक्षकों का भरोसा सरकार से उठता जा रहा है।

नीति के हर प्रावधान में असंगति और विरोधाभास दिखाई देता है। कपल केस अंक हटाना संवेदनहीनता है, ब्लॉक ठहराव अव्यावहारिक है और चरणवार प्रक्रिया जटिल है। इन सबके बीच सबसे बड़ी समस्या यह है कि सरकार ने शिक्षकों की आवाज़ को अनसुना किया है। संवाद और सहमति के बजाय एकतरफा निर्णय लेकर नीति थोप दी गई है।

 

आगे की राह

 

हरियाणा की नई शिक्षक ट्रांसफर पॉलिसी शिक्षकों की अपेक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था की जरूरतों – दोनों पर खरी नहीं उतरती। इसमें न तो पारिवारिक जीवन की सुरक्षा का ध्यान रखा गया है और न ही पेशेवर स्वतंत्रता का। यह नीति केवल कोर्ट-कचहरी के मामलों को जन्म देगी और शिक्षकों को निराशा और हताशा के गर्त में धकेलेगी।

सरकार को चाहिए कि वह शिक्षकों की आवाज़ को गंभीरता से सुने और एक ऐसी नीति बनाए जो वास्तव में पारदर्शी, न्यायपूर्ण और व्यावहारिक हो। कपल केस अंक को पुनः बहाल करना, ब्लॉक ठहराव की अवधि पर पुनर्विचार करना और नीति को सरल तथा स्पष्ट बनाना आज की आवश्यकता है। अन्यथा यह नीति भी केवल जुमलेबाज़ी और खोखले वादों का पिटारा साबित होगी, जिससे न शिक्षा व्यवस्था को लाभ होगा और न ही शिक्षकों को राहत।

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