किसानों ने मोदी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर भेजा ज्ञापन 

द न्यूज 15 

नई दिल्ली/लखनऊ। मोदी सरकार पर वादाखिलाफी आरोप लगा संयुक्त मोर्चा ने राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा है । इस ज्ञापन में किसानों ने कहा है कि इस पत्र के जरिये हम आप तक देश भर के किसानो का रोष पहुँचाना चाहते हैं। जबसे “संयुक्त किसान मोर्चा” ने सरकार के आश्वासन पर भरोसा कर दिल्ली बॉर्डर से अपने मोर्चे उठाने का ऐलान किया, उसके बाद से सरकार अपने वादों से मुकर ही नहीं गयी है बल्कि किसानो के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम भी कर रही है। इसलिए पूरे देश के किसानों ने 31 जनवरी 2022 को विश्वासघात दिवस मनाया था और हर जिले से आपके नाम ज्ञापन भेजा था। हमें बहुत अफ़सोस है कि उस ज्ञापन से अब तक हालात में विशेष बदलाव नहीं हुआ है, बल्कि स्थिति और बिगड़ी है।किसानों ने कहा है कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सचिव श्री संजय अग्रवाल ने 9 दिसंबर 2021 को संयुक्त किसान मोर्चा के नाम एक पत्र (सचिव/ऐएफडब्लू/2021/मिस/1) में वादा किया था कि देश के किसानों को एमएसपी मिलना कैसे सुनिश्चित किया जाय इसपर एक कमिटी बनायी जाएगी। अब तक सरकार ने न तो कमेटी के गठन की घोषणा की है, और न ही कमेटी के स्वरूप और उसकी मैंडेट के बारे में कोई जानकारी दी है।
उन्होंने कहा कि सरकार का वादा था कि आन्दोलन के दौरान किसानों पर दर्ज मुकदमे “तत्काल प्रभाव से वापिस लिये जायेंगे”। अब तक सिर्फ हरियाणा सरकार ने कुछ कागजी कार्यवाई की है और केस वापिस लेने के कुछ आदेश जारी किए हैं। लेकिन हरियाणा में भी यह काम अधूरा है, किसानों को अब भी समन आ रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने कुछ दिन पहले घोषणा की थी की वह 54 में से 17 केस वापिस लेगी, लेकिन अभी तक न कोई सूचना है की कौनसे के वापिस लिए जायेंगे, न ही कोई सफाई है की बाकी केस वापिस क्यों नहीं होंगे। रेलवे द्वारा देश भर में “रेल रोको” के दौरान किसानों पर लगाए मुक़दमे वापिस नहीं हुए हैं। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल सरकार की तरफ से आंदोलन के दौरान बनाए गए केस वापिस लेने के आश्वासन पर नाममात्र की भी कोई कार्यवाई नहीं हुई है। केंद्र सरकार ने राज्यों से मुक़दमे वापिस लेने की जो अपील करनी थी, वो भी नहीं की गयी है।आन्दोलन के दौरान शहीद हुए किसानों के परिवारों को मुआवजा देने पर अभी तक न तो किसी औपचारिक निर्णय की घोषणा नहीं हुई है।
किसानों का कहना था कि अपने वादे पूरे करने की बजाय सरकार ने इस बीच किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है। लखीमपुर खीरी हत्याकांड में एसआईटी की रिपोर्ट में षड्यंत्र की बात स्वीकार करने के बावजूद भी इस कांड के प्रमुख षड्यंत्रकारी अजय मिश्र टेनी का केंद्रीय मंत्रिमंडल में बना रहना हर संवैधानिक और राजनैतिक मर्यादा के खिलाफ है। इस बीच पुलिस, प्रशासन और अभियोक्ता की मिलीभगत से इस हत्याकांड के मुख्य अपराधी आशीष मिश्रा मोनू  को हाई कोर्ट से जमानत दिलवा दी गयी। उसके बाद हत्याकांड के एक प्रमुख गवाह पर हमला हुआ। फिर भी सरकार द्वारा जमानत के आर्डर के विरुद्ध अपील न करना और गवाहों को पर्याप्त सुरक्षा न देना सरकार की नीयत स्पष्ट करता है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश पुलिस इस घटना में नामजद किसानों को केसों में फंसाकर गिरफ्तार कर रही है। इन किसानो को जमानत नहीं मिली है।
किसानों ने कहा कि  हमने अपने पिछले ज्ञापन में भी आगाह किया था कि मोर्चा उठाने के बाद से केंद्र सरकार अपने किसान विरोधी एजेंडा पर और आगे बढ़ती जा रही है। ऑस्ट्रेलिया के साथ मुक्त व्यापार समझौते से डेयरी किसान के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। जैव विविधता कानून 2002 में संशोधन से किसान की जैविक संपदा को खतरा है। FSSAI के नए नियम बनाकर GM खाद्य पदार्थों को पिछले दरवाजे से घुसाने की कोशिश हो रही है। FCI के नए गुणवत्ता मानक से फसल की खरीद में कटौती की कोशिश की जा रही है। अब भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड के नियम बदलकर पंजाब और हरियाणा सरकार द्वारा मनोनीत प्रतिनिधियों की जगह केंद्र सरकार की पसंद मुताबिक सदस्य लगाने का फैसला किसानो और देश की संघीय व्यवस्था पर एक और हमला है।
उनका कहना था कि  इस रोषपत्र के माध्यम से देश के अन्नदाता सरकार तक अपना गुस्सा प्रेषित करना चाहते हैं। हम आपसे फिर अनुरोध करते हैं कि आप केंद्र सरकार को उसके लिखित वादों की याद दिलाएं और इन्हे जल्द से जल्द पूरा करवाएं तथा लखीमपुर खेरी कांड में न्याय सुनिश्चित करवाएं। आपके माध्यम से हम सरकार को चेतावनी देते हैं की वो किसान के धैर्य की परीक्षा लेना बंद करे। संयुक्त किसान मोर्चा ने 11 से 17 अप्रेल के बीच एमएसपी की कानूनी गारंटी सप्ताह आयोजित करने का फैसला किया है। अगर तब तक भी सरकार अपने आश्वासन पर अमल नहीं करती है तो किसानों के पास आंदोलन को दोबारा शुरू करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचेगा।

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