Farmers Movement : किसानों पर सख्ती से बिगड़ सकता है माहौल, संभाले नहीं संभलेगा किसानों का उग्र रूप!

आंदोलित किसानों पर एनएसए लगा तो लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा बड़ा असर

चरण सिंह

किसानों के मसीहा पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और कृषि वैज्ञानिक एमके स्वामीनाथम को भारत रत्न देने वाली मोदी सरकार आखिर किसानों को दिल्ली में क्यों नहीं आने दे रही है ? स्वामीनाथन की रिपोर्ट लागू करने में आखिर सरकार को दिक्कत क्या है ? किसानों के दिल्ली आने पर ऐसा क्या हो जाएगा, जिसकी चिंता सरकार को सता रही है ? क्या इससे पहले किसान दिल्ली में नहीं आये हैं ? क्या देश का किसान देश की राजधानी में अपनी बात रखते नहीं आ सकता है ? क्या शंभु बोर्डर पर किसानों को जेसेबी मशीन लाने के लिए पुलिस प्रशासन ने मजबूर नहीं किया है ? क्या किसान इस देश के नागरिक नहीं हैं ? यदि ये किसान नहीं हैं और असामाजिक तत्व हैं तो फिर इनका रिकार्ड खंगालकर इन पर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही हैै ? किसानों को रोकने के लिए बैरेकेड्स केंद्र सरकार और हरियाणा सरकार की शह पर पुलिस ने लगाये हैं। आंसू गैस के गोले पुलिस ने दागे हैं। रबर की गोलियां पुलिस ने मारी हैं। ऊपर से यह भी जानकारी मिल रही है कि एनएसए लगाने की तैयारी किसानों पर की जा रही है। आंदोलन के चलते फसल के नुकसान की भरपाई की तैयारी भी सरकार कर रही है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जिन किसानों की फसल इन किसानों की वजह से बर्बाद हुई है, क्या वे नुकसान की भरपाई करने के लिए सरकार या पुलिस प्रशासन से कह रहे हैं ?

शंभु बोर्डर पर एक किसान की मौत के बाद किसान संगठनों में आक्रोश देखने को मिल रहा है। कल संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रेस कांफ्रेंस कर बता दिया है कि २६ फरवरी को देश में विभिन्न हाईवे पर ट्रैक्टर मार्च निकाला जाएगा। 14 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में किसान पंचायत रखी गई है। २६ फरवरी को ट्रैक्टर मार्च दिल्ली में भी घुस सकता है। शम्भू बॉर्डर पर किसान आंदोलन में एक किसान की मौत पर एसकेएम की ओर से आज यानी कि शुक्रवार को किसान काला दिवस मना रहे हैं।

उधर शंभु बोर्डर पर किसानों को उपद्रवी बताकर उन पर एनएसए लगाने की तैयारी चल रही है। ऐसा किसानों ने क्या कर दिया कि उन पर एनएसए लगाने की तैयारी की जा रही है। क्या किसान कृषि प्रधान देश में मांग भी नहीं कर सकते हैं? देखने की बात यह है कि शंभु बोर्डर पर किसान मजदूर संघर्ष समिति का प्रदर्शन चल रहा है। जगजीत सिंह और सरवन पंढेर दो किसान नेता हैं। संयुक्त किसान मोर्चा में तो तीन सौ से भी अधिक किसान संगठन हैं। उधर पंजाब में भी कई किसान जत्थे हैं। हरियाणा में भारतीय किसान यूनियन अलग से हुंकार भर रही है। गुरुनाम चढ़ूनी ने आंदोलन में शामिल होने का ऐलान कर दिया है।

महाराष्ट्र के साथ ही दक्षिण भारत में भी कई किसान संगठन हैं। ऐसे में यदि ये सभी संगठन सरकार के खिलाफ खड़े हो गये तो सरकार को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। भले ही किसानों पर तरह-तरह के आरोप लगाये जाते हों पर किसान आंदोलन को दमनकारी नीतियां लागू कर खत्म कराने के प्रयास हुए तो इस आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। वैसे भी पिछले किसान आंदोलन में सरकार और सरकार के समर्थकों के तमाम प्रयास के बावजूद किसान आंदोलन खत्म नहीं हो सका था बल्कि सरकार को किसानों की बात मानने के लिए आगे आने पड़ा था। वह बात दूसरी है कि ७०० किसान आंदोलन की भेंट चढ़ गये थे। आज की तारीख में किसान सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रहे हैं।
एमएसपी और कर्जमाफी पर किसान कानून की गारंटी चाहते हैं। दरअसल किसानों का कहना है कि वे तो एमएसपी का काूनन की गारंटी तो ही चाह रहे हैं। सरकार को एमएसपी निर्धारित करे। उससे कम पर फसल की खरीद न हो। जो भी उससे कम पर खरीद करे उसको सजा का प्रावधान हो। किसानों का आरोप है कि कानून की गारंटी न होने की वजह से किसान की फसल औने पौने दाम पर खरीदी जाती है। किसानों का कहना है कि जब सरकार पूंजीपतियों का कर्ज माफ कर सकती है तो किसानों का क्यों नहीं कर सकती। किसानों का यह भी कहना है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी प्रचार में इन सभी मांगों को मानने की बात करते थे जो वे कर रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या सरकार की सख्ती से किसानों की आवाज को दबाया जा सकता है ? या फिर सरकार की सख्ती से किसान आंदोलन और उग्र होगा। ऐसे में यदि किसान आंदोलन उग्र होता है तो फिर उसका फायदा विपक्ष को भी मिल सकता है।

 

 

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