आरएसएस प्रष्ठभूमि का न होते हुए भी भाजपा में कट्टर हिंदुत्व की पहली पसंद बने योगी आदित्यनाथ! 

चरण सिंह राजपूत 

देश में राजनीति का दौर बदलता रहा है। कभी देश पर धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाले राज कर रहे थे तो अब कट्टर हिन्दुत्व का राग अलापने वाले। कट्टर हिन्दुत्व में भी एक बड़ा तबका ऐसे नेताओं को पसंद करता है जो मुस्लिमों के खिलाफ खुलकर बोलते हों। उनके खिलाफ खुलकर काम करते हों। आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के अलावा  राजनीतिक पार्टियों में कभी शिवसेना के बाला साहेब ठाकरे, तो कभी नरेंद्र मोदी और अमित शाह और आज की तारीख में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इस कथित हिन्दुत्व का बड़ा चेहरा माना जा रहा है। चेहरा भी ऐसा कि हिन्दुत्व के समर्थकों के लिए प्रधानमंत्री नरंेद्र मोदी को टक्कर देने वाला। यह योगी का हिन्दुत्व के पैरोकार में पैठ बनाना ही है कि भाजपा में उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकल्प माना जाने लगा है। देश में उनके क्रियाकलापोंं को लेकर कितना भी विरोध होता रहे पर उनके समर्थकों में उनका कद लगातार बढ़ रहा है। भाजपा में तमाम कशकश के बाद आखिर योगी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ना भाजपा दिग्गजों की मजबूरी हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का वरिष्ठ आईएएस अरविंद शर्मा को उत्तर प्रदेश की राजनीति में घुसाना भी योगी के सामने कोई काम न आया।
हिन्दू संगठनों में योगी आदित्यनाथ वह बड़ा चेहरा उभरकर आया है जो आरएसएस की पृष्ठभूमि का न होते हुए भी हिन्दुओं की पहली पसंद बने हुए हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के सामने आरएसएस की पसंद भी आज की तारीख में योगी आदित्यनाथ बताये जा रहे हैं। इन सबका बड़ा कारण है कि योगी आदित्यनाथ का मुस्लिमों के प्रति आक्रामक रवैया है।
योगी आदित्यनाथ समय समय पर मुस्लिमों के खिलाफ आग उगलते रहते हैं। जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं तो ऐसे में वह हिंदू वोटबैंक को अपने पक्ष में करने के लिए  मुस्लिमों को लेकर आक्रामक हैं। उन्होंने फिर से बोला है कि हमारा किसी चेहरे, व्यक्ति, जाति या मजहब से विरोध नहीं है लेकिन जिसका विरोध भारत से है और भारतीयता से है तो स्वाभाविक रूप से हमारा उससे विरोध होगा। उनका सीधा सीधा निशाना बीजेपी की ओर है। एक टीवी इंटरव्यू में जब सीएम योगी आदित्यनाथ से पूछा गया कि आपका मुसलमानों से क्या रिश्ता है तो उन्होंने जवाब देते हुए कहा कि जैसे वे मुझे देखते हैं, वैसे मैं भी उन्हें देखता हूं। दरअसल इस टीवी चैनल के इंटरव्यू में  योगी आदित्यनाथ से सवाल पूछा गया कि पीएम मोदी का नारा रहा है सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास। आप भी इस नारे को हर मंच से दोहराते हैं। आपने अभी तक बहुत से उम्मीदवार घोषित किए हैं लेकिन कोई भी मुसलमान कैंडिडेट घोषित नहीं किया है। आपका मुसलमानों से क्या रिश्ता है? इस सवाल के जवाब में सीएम योगी ने कहा कि मेरा वही रिश्ता उनके साथ में है जो उनका रिश्ता मुझसे है। आगे उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार में मेरे मंत्रिमंडल में एक मुस्लिम मंत्री मोहसिन रजा हैं। केंद्र सरकार में मुख़्तार अब्बास नकवी मंत्री हैं। इसी प्रकार के कई चेहरे हैं। आरिफ़ मोहम्मद ख़ान केरल के राज्यपाल के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। हमारा किसी चेहरे, व्यक्ति, जाति या मजहब से विरोध नहीं है। लेकिन जिसका विरोध भारत से है और भारतीयता से है तो स्वाभाविक रूप से हमारा उससे विरोध होगा। कुल मिलाकर योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व का बड़ा चेहरा बना हुआ है। चाहे अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो। मथुरा और काशी का मामला हो योगी आदित्यनाथ हिदुत्व का माहौल बनाते रहते हैं। योगी आदित्यनाथ ने यह भी कहा कि जो भारत को प्यार करता है। हम उससे प्यार करते हैं। जो भारत के मूल्यों और सिद्धांतों में रचा बसा है। हम उसको हृदय से लगाते हैं, गले से लगाते हैं और सम्मान भी देते हैं। लेकिन अगर आजादी के बाद किसी ने ईमानदारी से सबका साथ सबका विकास पर काम किया है तो वो भाजपा सरकार ने किया है। आप देख सकते हैं कि जो लोग गरीब कल्याण का नारा देते थे, गरीबी हटाओ का नारा देते थे, सामाजिक न्याय की बात करते थे। उनका क्या सामाजिक न्याय है? गरीबों की पेंशन हड़प जाना क्या यही सामाजिक न्याय है? गरीबों के आवास योजना को लागू न करना क्या यही सामाजिक न्याय है?बता दें कि करीब तीन दशक के बाद किसी भी प्रमुख पार्टी ने गोरखपुर सदर सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार घोषित किया है। बसपा ने गोरखपुर सदर से योगी आदित्यनाथ के खिलाफ अपने पुराने पार्टी कार्यकर्ता ख्वाजा शम्सुद्दीन को चुनावी मैदान में उतारा है। हालांकि इस सीट पर पहले के चुनावों में भी मुस्लिम उम्मीदवार को 3000 से ज्यादा वोट नहीं मिले हैं। सिर्फ 1993 के चुनाव में बसपा के उम्मीदवार जाफर अली जिप्पू  को करीब 14% वोट मिले थे और वे तीसरे स्थान पर रहे थे।
हिंदुत्व को लेकर जंग छिड़ी है। ‘हिंदुत्व’ राजनीति के दुश्चक्र में फंस गया है। एक तरफ हाहाकारी हिंदुत्ववादी हैं और दूसरी ओर ‘मैं हिंदू हूं, पर हिंदुत्ववादी नहीं’ के झंडाबरदार। फिर कोई खुर्शीद साहब आते हैं और हिंदुत्व को ‘बोको हराम’ बता जाते हैं। बोको हराम जैसे नृशंस संगठन की तुलना हिंदू धर्म से करना अपनी जाहिलियत का एलान ही है।कभी कोट के ऊपर जनेऊ पहनने वाले राहुल गांधी हिंदुत्व को हिंसा और सांप्रदायिकता का औजार बता देते हैं। दरअसल हिंदू और हिंदुत्व अद्वैत हैं। हिंदुत्व अपने आप में कोई धर्म, पंथ या वाद नहीं है। जो ‘हिंदुइज्म’ के जरिये हिंदुत्व को समझने की कोशिश करते हैं, उन्हीं से यह बखेड़ा खड़ा हुआ है। हिंदुत्व सिर्फ ‘हिंदू-पन’ है। हमारी परंपरा में चार्वाक ईश्वर के अस्तित्व को ही नहीं मानते थे। उन्होंने वर्तमान में जीने और कर्ज लेकर घी पीने का एलान किया था। हमने उनका सिर कलम नहीं किया, बल्कि ऋषि का दर्जा दिया। कबीर पत्थर को पूजने (मूर्तिपूजा) के खिलाफ खड्गहस्त थे। हमने उन्हें भक्त माना। तुलसी सगुण उपासक थे। पर उन्होंने लिखा पद बिन चले, सुनै बिन काना यानी ईश्वर बिना पैर के चलता और बिना कान के सुनता है।

यानी ईश्वर निर्गुण है। एक ही बिस्तर पर मेरी सनातनी दादी अंतकाल रघुवर पुर जाई गाती थी, तो आर्य समाजी दादा अंतकाल अकबरपुर (फैजाबाद पैतृक गांव) जाई का उद्घोष करते थे। एक मूर्ति पूजा करता, दूसरा उसका विरोध। पर दोनों हिंदू थे। एक ही छत के नीचे कोई राम भक्त, कोई शिव भक्त, कोई कृष्ण भक्त, तो कोई शक्ति की उपासना करता था। पर सब हिंदू थे। यह है हिंदू धर्म का मूल।

हिंदू धर्म की इस संवादप्रियता के कारण ही भारतीय इस्लाम और भारतीय ईसाई यहां वैसे नहीं हैं, जैसे अपने मूल रूप में अरब और पश्चिम में हैं। हिंदू धर्म में आस्तिकता की भी जगह है और नास्तिकता की भी। इसमें मूर्ति को मानने वाले भी हैं, मूर्ति को न मानने वाले भी। द्वैत-अद्वैत और सगुण-निर्गुण को मानने वाले भी।

धर्म के व्यापक फलक में सनातनी भी हिंदू हैं, आर्य समाजी भी और ब्रह्म समाजी भी। ऐसा विशाल और व्यापक धर्म दुनिया में नहीं है। तो फिर हिंदुत्व क्या है? क्या बजरंग दल और श्रीराम सेना की सोच हिंदुत्व है? क्या हिंदुत्व प्रेमी जोड़ों पर हमला है? पहनने-ओढ़ने पर सामाजिक पुलिसिंग है? क्या ‘लव जिहाद’ के नाम पर आंदोलन हिंदुत्व है? घर वापसी हिंदुत्व है?

वैलेंटाइन-डे का डंडे से मुकाबला हिंदुत्व है? प्राय: कट्टरता को नव राष्ट्रवादी हिंदुत्व का लक्षण मान रहे हैं। एक पवित्र शब्द का अर्थ ऐसे गिरा कि इस शब्द ने अपनी अर्थवत्ता ही खो दी। धारणा में हिंदुत्व के नाम पर एक आक्रामक लठैत समाज खड़ा हो गया, जिसे कोई आलोचना बर्दाश्त नहीं। जैसे बंधु-बंधुत्व, बुद्ध-बुद्धत्व, मनुष्य-मनुष्यत्व होता है, वैसे ही हिंदू-हिंदुत्व होता है।

उसमें गड़बड़ की अंग्रेजी शब्द ‘हिंदुइज्म’ ने, जिसका अनुवाद अंग्रेजीदां मित्रों ने हिंदुत्व कर लिया। हिंदुत्व शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल बंकिमचंद्र के आनंदमठ में हुआ था। बाद में सावरकर ने इसे राजनीतिक विचारधारा से जोड़ा। नासमझी दोनों तरफ है। जो हिंदुत्व में बोको हराम जैसी नृशंसता देख रहे हैं, उन्हें हिंदू धर्म के बारे में कुछ नहीं पता।

हिंदू धर्म न किसी एक किताब से जुड़ा है, न किसी एक धर्म प्रवर्तक या भगवान से। यह दुनिया का इकलौता धर्म है, जहां से आप कोई धार्मिक पुस्तक या भगवान निकाल लें, तो भी बगैर खतरे के धर्म बना रहेगा। हिंदू आत्मा के अमरत्व में विश्वास करता है। हिंदू का धर्म ही उसे वह ताकत देता है कि वह अधर्म से निपट सके।

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