नोएडा में मजदूर आंदोलन के पहले दिन से ही उत्तर प्रदेश सरकार इसे कानून-व्यवस्था का मुद्दा बनाकर आंदोलन को कुचलने की कोशिश कर रही है। सीटू की माँग है कि यह एक श्रम विवाद है और राज्य श्रम विभाग की जिम्मेदारी है कि त्रिपक्षीय वार्ता के जरिए वह सुलह कराए। इस आंदोलन से पहले यूपी और हरियाणा में अकुशल मजदूरों का वेतन क्रमश: ₹11,314/- और ₹11,257/- था। दिल्ली-एनसीआर में, जहाँ पिछले दस साल में रहन-सहन की लागत कई गुना बढ़ी है, वहाँ मजदूरों से यह उम्मीद है कि वह इतने कम वेतन में अपनी जिंदगी बितायें। आज भी कई कंपनियाँ यूपी और हरियाणा में अकुशल मजदूरों के लिए बढ़े हुए ₹13,690/- और ₹15,221/- के वेतन को लागू करने से इनकार कर रही हैं। यूपी श्रम विभाग ने इन कंपनियों पर कोई कार्रवाई नहीं की।
दूसरी तरफ यूपी पुलिस ने गैरकानूनी तरीके से डीसीपी (उद्योग) का पद बनाकर मजदूरी विवादों में दखल देना शुरू कर दिया है। नोएडा पुलिस ट्रेड यूनियन गतिविधियों पर अवैध रोक लगाना चाहती थी, जिसका मजदूरों ने हर दमन और दंबिश के बावजूद मई दिवस मनाकर विरोध किया। यूपी पुलिस द्वारा दो कार्यकर्ताओं पर रासुका लगाने की ताजा कार्रवाई भी इसी सोच से निकली है और यह बेहद निंदनीय है। सीटू दिल्ली राज्य कमेटी माँग करती है कि बेबुनियाद आरोपों में फँसाए गए सभी निर्दोष मजदूरों को तुरंत रिहा किया जाए। दिल्ली में भाजपा सरकार के पहले साल में अक्टूबर 2025 से महंगाई भत्ता (VDA) न बढ़ाकर मजदूरों की तकलीफ और बढ़ाई गई है। सीटू माँग करती है कि पूरे दिल्ली-एनसीआर में तुरंत ₹26,000/- न्यूनतम वेतन तय किया जाए।







