सोशलिस्ट रत्न को भारत रत्न!

 प्रोफेसर राजकुमार जैन

सोशलिस्ट कर्पूरी ठाकुर को भारत सरकार ने ‘भारत रत्न’ के खिताब से नवाजा है। भारत रत्न से एक रात में पूरे हिंदुस्तान में शोहरत मिल जाती है, परंतु सोशलिस्ट रत्न कहलवाने के लिए तमाम उम्र इम्तिहान से गुजरना पड़ता है, कदम कदम पर अग्नि परीक्षा होती है। झोपड़ी में पैदा होने, गुरबत और जाति की आग को झेलते, फटी चप्पल, मैली धोती पहने हुए मीलो पैदल चलकर,तैरकर नदी पार करने के बाद तालीम हासिल करके मां-बाप की तमन्ना से अलग बरतानिया हुकूमत के खिलाफ जंगे आजादी में शामिल होने के कारण बंदी के रूप में जेल के सींकचौ में सोशलिस्ट नेताओं की संगत मैं सोशलिस्ट विचारधारा में दीक्षित होकर जयप्रकाश नारायण, डॉक्टर राममनोहर लोहिया के अनुयायी बन गए। हज्जाम के इस बेटे को सोशलिस्ट पार्टी ने 1952 के पहले ही आम चुनाव में विधानसभा का चुनाव लड़ने का हुक्म सुना दिया। राजपूत भूमिहारों जैसी उच्च दबंग जातियों के बाहुल्यवाले इलाके मे अपनी विनम्रता, सादगी, शराफत तथा सोशलिस्ट विचारधारा की भट्टी में तपने के कारण जुल्म- ज्यादती, मजहब, जाति, आर्थिक शोषण के खिलाफ फौलादी जहनियत से टकराने के मानस से तमाम उम्र विधायक उपमुख्यमंत्री दो बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद, जैसी झोपड़ी वालिद गोकुल ठाकुर ने गांव में हजामत का पेशा करते हुए तैयार की थी, वैसी ही आज भी है। विदेश यात्रा के प्रतिनिधि मंडल में युगोस्लाविया जाने पर वहां के राष्ट्रीयध्यक्ष मार्शल टीटो ने उनके फटे हुए कोट को देखकर अपनी तरफ से नया ओवरकोट भेंट कर ताज्जुब जाहिर किया था।
पैदल, साइकिल, नावों, बैलगाड़ियों, बसों में बैठकर, उबड़ खाबड़ रास्तो, गांव कस्बो की कच्ची पक्की पगडंडियों पर भूखे पेट चलकर परेशानियां दुश्वारियां का सामना करते हुए समाजवाद का अलख जगाने, गांव गांव में सोशलिस्ट पार्टी के सिद्धांतों, विचारों, नीतियो का प्रचार करके लाखों लोगों का यकीदा सोशलिस्ट पार्टी में पैदा कर दिया, जिसके कारण बिहार में किसी न किसी शक्ल में सोशलिस्टों की मौजूदगी संसद, विधानसभा में हमेशा बनी रही। कर्पूरी ठाकुर की दोहरी जिम्मेदारी थी, एक तरफ जहां विधानसभा में पार्टी की अगुवाई विधायी कार्यों में तर्कों तथ्यों, देश दुनिया के चिंतकों, दार्शनिकों, इतिहास की नजीरें पेश करते थे वहीं पार्टी के प्रचार प्रसार फैलाव को बढ़ाने का भार भी उनके कंधों पर था। कर्पूरी जी की शख्सियत का यह आलम था कि जब कभी वे किसी इलाके में जाते थे, लोगों का हज्जूम घंटो इन्तजार करते हुए उनको सुनने और जिंदाबाद करने को बेताब रहता था। कर्पूरी जी की हैसियत और कैफियत केवल बिहार तक ही सीमित नहीं थी। पूरे मूल्क मे सोशलिस्ट तहरीक के प्रचार प्रसार में भी उनको मशक्कत करनी पड़ती थी। उनकी काबलियत, समर्पण, संघर्ष को देखते हुए सोशलिस्ट पार्टी ने न केवल मुख्यमंत्री, पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी उनको बनाया। सोशलिस्टो का सिरमौर तथा भारत रत्न का खिताब पाने में जमीन आसमान का अंतर है। भारत रत्न शासन कर रही पार्टी उसके नेता की मर्जी, जो की हिसाब किताब, नफे नुकसान, राजनीतिक निशानों के आंकलन पर मुन्नसर होती है। अभी तक हिंदुस्तान में अनेकों ऐसे लोगों को भारत रत्न की उपाधि से नवाजा गया है और आगे भी यह जारी रहेगा जो इसके हकदार किसी भी पैमाने पर नहीं थे। इसलिए उनका कोई नाम लेवा नहीं है, कोई उनका नाम तक भी नहीं जानता। उनके घर वाले जरूर अपने ड्राइंग रूम में प्रशस्ति पत्र को लगाए रहते हैं। परंतु कर्पूरी ठाकुर अलग ही मिट्टी से बने थे। आज जीवित होते तो 100 साल के होते, इंतकाल हुए भी तकरीबन 36 साल बीत चुके हैं। पिछले एक साल से हिंदुस्तान के मुख्तलिफ इलाकों में उनकी जन्मशती मनाई जा रही है। ‘कर्पूरी ठाकुर जन्मशती समारोह समिति’ ने दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक भव्य आयोजन से इसकी शुरुआत की थी। साथी रमाशंकर सिंह के संयोजन में समाजवादी समागम के तहत ‘जननायक कर्पूरी ठाकुर एक समाजशास्त्रीय अध्ययन’ तथा ‘जननायक कर्पूरी.ठाकुर जन्मशती स्मरण ‘-ग्रंथ’ प्रकाशित किया, गया। अनेको विद्वानों ने बीते एक साल में सोशल मीडिया में लगातार लेख लिखने,तथा बहसों में हिस्सा लिया। पटना में संपन्न हुए कार्यक्रम में मूल्क के मुख्तसर इलाको से आए साथियों ने हिस्सा लिया। भयंकर सर्दी के बावजूद पटना का दृश्य अनोखा था। सियासी पार्टियां, संगठनअपने-अपने बैनर पर आयोजन कर रही थी। सड़कों पर बिहार के कोने-कोने से आए लाखों गरीब नर नारी कर्पूरी ठाकुर जिंदाबाद के नारे लगाते हुए सड़कों पर पैदल चल रहे थे। जो जितना गरीब दिखता था वह उतनी ही जोर से नारा लगाते हुए दिख रहा था। मोदी सरकार ने कर्पूरी जी को चाहे जिस मंशा से खिताब दिया हो, परतुं उसने कर्पूरी जी की शख्सियत को पूरे मुल्क के सामने पेश कर दिया।
भारत रत्न के खिताब से इतिहास की किताब में तो नाम जरूर शामिल हो जाता है, आलीशान सरकारी आयोजन में कैमरों की चुंधियाती रोशनी और राष्ट्रपति के हाथों प्रशस्ति पद सौंपने को पूरा मुल्क देखता है, परंतु कुछ ही दिनों में यह भूला हुआ, महज खिताब पाए लोगों की सूची में दर्ज नाम के सिवाय उसका कोई अर्थ नहीं होता। परंतु कर्पूरी.ठाकुर जैसे लोग हमेशा मानस को उद्वेलित करते हुए प्रेरणा देते रहेंगे। समय बीतने के साथ-साथ उनकी याद और अधिक बढ़ती जाएगी। मेरी नजर में कर्पूरी.ठाकुर को खिताब देने से खिताब की ही शान बड़ी है।

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