आज भी प्रासंगिक है अंबेडकर की चेतावनी 

आदित्य कुमार
किसी करिश्माई सत्ता के सामने बिना सोचे समझे अपने आप को समर्पित कर देने के संबंध में डॉ अंबेडकर ने चेतावनी दी थी, अंबेडकर ने जॉन स्टूअर्ट मिलन का हवाला दिया जिसने कहा था कि किसी महान व्यक्ति के चरणों में भी अपनी स्वाधीनता का समर्पण नहीं करना या फिर किसी ऐसे महान व्यक्ति को सर्वसत्ता अधिकारी नहीं बनाना जो तुम्हारी संस्था को ही भ्रष्ट कर दें। यह चेतावनी हिंदुस्तान के लिए इंग्लैंड से ज्यादा महत्वपूर्ण थी क्योंकि भारत में  भक्ति या समर्पण कर रहा या वीर पूजा राजनीति में ऐसी भूमिका निभाती है। जैसी दुनिया के किसी भी देश में नहीं निभाती, किसी धर्म में भक्ति की भूमिका आत्मा की मुक्ति के लिए हो सकती है लेकिन राजनीति में भक्ति या वीर पूजा पतन और तानाशाही की राह पर ले जाती है। डॉक्टर अंबेडकर का यह कथन आज भी राजनीति में अति महत्वपूर्ण और प्रसांगिक है पिछले 40-50 सालों में भारत की राजनीति संस्थागत ना होकर व्यक्ति केंद्रित रही है भारत के इस जनमानस की कमजोरी का लाभ उठाकर भारतीय राजनीति में सिद्धांतों का सहारा लेकर स्वयं को कथित नायक के रूप में स्थापित किया और फिर अपने परिवार को स्थापित किया किसी ने समाजवाद के नाम पर, किसी ने बहुजन के नाम पर, किसी ने गांधी के नाम पर, किसी ने राम के नाम पर स्वयं को पार्टी के माध्यम से स्थापित किया और अपने स्वयं को तथा परिवार को आर्दश का सहारा लेकर खुद को समृद्र किया तथा समाज निर्धनता का शिकार हुआ। लगभग सभी दलों का चाल चरित्र एक ही है कोई विशेष अंतर नहीं है। भारतीय राजनीति में लगभग सभी दलों के पिछले लगभग 40 वर्षों में जाति के आधार पर गोलबंदी, धर्म के आधार पर गोलबंदी, भाषा व क्षेत्र के आधार पर  गोलबंदी की है इन्हीं गोलबंदी के कारण आम जनता जातिगत विद्वेष, संप्रदायिक विद्वेष, क्षेत्रवाद तथा भाषा विद्वेष का शिकार हुई है। इन्हीं विद्वेषो का फायदा उठाकर नेतागण लोकसभा तथा विधानसभा में कथित रूप से चुनकर पहुंचते है। इस तरीके से राजनीतिक दलों ने आम जनमानस की सोचने समझने की क्षमता ही समाप्त कर दी या दूसरे शब्दों में कहा जाए राजनीतिक दलों ने कार्यकर्ता के रूप में एक गुलाम की फौज तैयार कर दी जिसने बिना सोचे समझे दल के मुखिया के सामने पूर्ण रूप से अपने आप को समर्पित कर दिया जिसके कारण देश में एक बौद्धिक तथा समग्र राष्ट्रीय नेतृत्व का घोर संकट पैदा हो गया तथा भारतीय जनमानस के इस मूल स्वभाव को देखते हुए संविधान निर्माता भारत रत्न डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की चेतावनी वर्तमान समय में सही प्रतीत होती है जिसका उल्लेख शुरू में किया जा चुका है इस घोर निराशा के संकट में इन सब का समाधान बौद्ध के एक छोटे से सूत्र में है ‘‘अत्तनो नायो केई नायो परोसिय‘‘ जिसका अर्थ है तुम्हारे सिवा तुम्हारे कोई स्वामी नहीं है तुम ही अपने स्वामी स्वयं हो बौद्ध चाहते थे ना किसी के स्वामी बनो और ना ही किसी को अपना स्वामी बनाओ जो व्यक्ति और समाज अपना स्वामी स्वयं बनेगा वह व्यक्ति व समाज सब प्रकार के शोषण व दास्ता से मुक्त होगा और समाज में मित्रता का भाव बढ़ेगा जिसमें सब प्रकार की गैर बराबरी समाप्त हो जाएगी, इसी मित्रता को भारतीय संविधान में मान्यता दी वर्तमान समय में घोर निराशा और संकट के क्षणों में भारतीय सोशलिस्ट मंच भारत की आम जनता को मित्रता का निमंत्रण देता है और अपने स्वामी बनने का आह्वान करता है या इस आह्वान से भारतीय जनमानस को जातिवाद क्षेत्रवाद संप्रदायिक वाद भाषावाद तथा परिवारवाद से मुक्ति मिलेगी और देश में समग्र राष्ट्रीय नेतृत्व का उदय होगा यही संविधान निर्माता डॉ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की मंशा थी।

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