चाटुकार और मुखबिर बर्बाद करने वाले तो कर्त्तव्यनिष्ठ और आलोचक होते हैं सच्चे हितैषी

चरण सिंह राजपूत
ह दौर कॉरपोरेट संस्कृति का है। देश में कारपोरेट संस्कृति चाटुकारिता और मुखबिरी को बढ़ावा दे रही है। यह संस्कृति युवाओं के स्वाभिमान को मार दे रहे है। देश और दुनिया का इतिहास रहा है कि किसी भी संस्था की मजबूत नींव उसके कर्मचारियों की कड़ी मेहनत, संस्था के प्रति समर्पण और मालिक का अपने कर्मचारियों पर अटूट विश्वास होता है। संस्था को आगे बढ़ाने वाले उसके कर्त्तव्यनिष्ठ और निष्ठावान कर्मचारियों होते हैं तो बर्बाद करने वाले मालिक के करीबी माने जने वाले चाटुकार, मुखबिर और दलाल लोग होते हैं। जो मालिक कानों का कच्चा होता है उसका ऐसे लोग ज्यादा फायदा उठाते हैं। इसलिए जो दूरदर्शी लोग होते हैं वे चाटुकार पालने के बजाय आलोचक रखना ज्यादा पसंद करते हैं। आज की तारीख में भले ही अडानी और अंबानी बड़े कारोबारी माने जा रहे हों पर देश में टाटा बिडला की जगह कोई नहीं ले पाया है। इसकी वजह यह है कि इन दोनों ग्रुप में कर्मचारियों की मेहनत, समर्पण और निष्ठा को सम्मान मिला है। किसी भी संस्था का भविष्य उसके माहौल से लगाया जा सकता है। यदि संस्था का मालिक चाटुकारों और मुखबिरों से घिरा हो तो समझो उसका अंत करीब है। यदि संस्था का मालिक चाटुकारों और मुखबिरों से दूर रहते हुए काम करने वाले कर्मचारियों को सम्मान दे रहा है तो समझो उसका भविष्य बहुत अच्छा है। यह सब हर तरह के संस्थाओं, संगठनों और व्यक्तियों को लागू होता है।
किसी भी संस्था के नेतृत्व का उद्देश्य संस्था और कर्मचारी दोनों के हित का होना चाहिए। संस्था रहेगी तो कर्मचारी रहेंगे औेर कर्मचारी रहेंगे तो संस्था रहेगी। जो संस्था अपने कर्मचारियों पर विश्वास कर उनका दिल जीतती है तो उसके आगे बढ़ने से कोई नहंी रोक सकता और जो संस्था अपने कर्मचारियों को परेशान और अपनमानिक करती है उसे बर्बाद होने से कोई नहीं रोक सकता। अच्छा और सच्चा कर्मचारी वह माना जाता है जो संस्था के साथ ही अपने हक के लिए भी लड़े। अच्छा मालिक वह माना जाता है जो अपने संस्था के साथ ही कर्मचारियों के भले की भी सोचे। संस्था में हो रहे गलत काम का विरोध संस्था हित में माना जाता है। काम करने वाले कभी चाटुकार नहीं होता है और चाटुकार कभी काम नहीं करता है। यह बात मालिक को समझनी होती है कि उसे काम चाहिए या फिर चाटुकार। आज का दौर चाटुकारों का माना जा रहा है यही वजह है कि अधिकतर संस्थाएं घाटे चले में चल रही हैं। अधिकतर संस्थाओं में अपने ही कर्मचारियों का स्वभिमान मार दिया गया है। यदि कर्मचारी में स्वाभिमान नहीं होगा तो वह अपना बेस्ट नहीं दे सक्ता है। मेरा अपना अनुभव रहा है कि झूठ आदमी को कमजोर बनाता है और सत्य मजबूत। इसलिए यदि कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करनी है तो सच्चाई का रास्ता अपनाते हुए गलत का विरोध और सच का साथ दें।

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