मांझी और चंपाई सोरेन के बाद अब दिल्ली सीएम आतिशी, लेकिन सबसे ‘चालू’ निकले लालू!

दीपक कुमार तिवारी

नई दिल्ली/पटना। दिल्ली की नवनिर्वाचित सीएम आतिशी ने एक नई मिसाल कायम की है। अगर यह वास्तविक है तो यकीन करना चाहिए कि उन्होंने राम-भरत के प्रेम और भरत के आदर्श को स्थापित किया है। अगर यह अवास्तविक है, जैसा कई राज्यों में अब तक दिखा है, तो यकीन मानिए कि सुपर स्टार्स के अभिनय भी उनके सामने फीके पड़ेंगे। दोनों में से कोई भी सच हो सकता है। इसलिए दोनों ही स्थितियों को ध्यान में रख कर आतिशी का आकलन करना चाहिए या आगे का अनुमान लगाना चाहिए।
आतिशी ने अरविंद केजरीवाल की कुर्सी पर बैठने से मना कर दिया। यह उनका अरविंद के प्रति आदर का भाव है या नफरत का, यह तो उनका मन ही जानता होगा। कई बार लोग उस स्थल या स्थान पर जाने-बैठने से परहेज करते हैं, जो अशुभ साबित हुआ हो। यह भी संभव है कि आतिशी को वह चेयर अभिशप्त लगा हो, जिसकी वजह से अरविंद केजरीवाल को जेल यात्रा तक करनी पड़ी और आखिरकार इस्तीफा देना पड़ गया। यह इस प्रसंग का दूसरा पहलू है। यह वामपंथी विचारधारा की आतिशी का बदला नजरिया भी हो सकता है, जिसने भारत के आदर्श का पालन करने की उन्हें प्रेरणा दी। इस प्रसंग का पहला पहलू यह है कि आतिशी ने अरविंद के प्रति आदर भाव ही प्रकट किया है। इसे इसलिए बल मिलता है कि आतिशी को चंपाई सोरेन और जीतन राम मांझी बन कर कुछ हासिल नहीं होना है। सच यह है कि अरविंद के जेल में रहते आतिशी ने ही 177 दिन सरकार चलाई। उन्हें अब इससे भी कम दिन सीएम रहना है। इस तरह देखें तो आतिशी भले औपचारिक सीएम 21 सितंबर 2024 को बनी हैं, पर अनौपचारिक सीएम तो वे पिछले करीब छह महीने से हैं। इसलिए अरविंद के प्रति आतिशी के आदर भाव को उनके सच्चे मन की छाया ही मानना ज्यादा सटीक लगता है।
बिहार में नीतीश कुमार की नजर में बेहद सीधे और उनके विश्वसनीय थे जीतन राम मांझी। नीतीश कुमार भाजपा से रूठ कर 2014 के संसदीय चुनाव में अकेले खम ठोंकने के लिए अचानक 2013 में छटपटा गए। उन्हें लगा कि राजकाज से फ्री होकर वे मैदान में उतरे तो नरेंद्र मोदी को औकात बता देंगे। उन्होंने आनन-फानन सीएम की कुर्सी अपने भरोसेमंद जीतन राम मांझी को कुछ समय तक संभालने के लिए सौंप दी। संसदीय चुनाव में तो वे सिर्फ दो सीटें जीत कर औंधे मुंह गिरे ही थे, मित्र मांझी से उन्होंने सीएम की कुर्सी अपने लिए खाली करने को कहा तो उन्होंने नाकों चने चबवा दिए थे। कुर्सी वापस मिल तो गई, लेकिन इसके लिए उन्हें कितने पापड़ बेलने पड़े, सभी जानते हैं।
बिहार के पड़ोस में ही है झारखंड। 24 साल पहले तक यह झारखंड का ही हिस्सा था। विधानसभा के मौजूदा कार्यकाल में पहले राउंड में सीएम बने हेमंत सोरेन के जब दुर्दिन शुरू हुए तो हेमंत ने अपने परिवार के प्रति वफादार और विश्वासपात्र चंपाई सोरेन को सत्ता सौंप दी। चंपाई ने आतिशी की तरह हेमंत की कुर्सी खाली नहीं छोड़ी और न बगल में अपने लिए अलग कुर्सी लगाई। वे सीधे उनकी ही कुर्सी पर बैठे। अलबत्ता अपने बोल-वचन से इस बात का एहसास कराते रहे कि वे भी खड़ाऊं सीएम ही हैं। वास्तविकता यह थी कि कुर्सी ने इस कदर उन्हें जकड़ लिया कि वे कुर्सी से उतरते ही छटपटा गए। अब वे भाजपा के साथ हेमंत के खिलाफ हवा बनाने के अभियान में लग गए हैं।
इस मामले में अगर कोई सबसे चालू निकला तो वे बिहार के पूर्व सीएम और आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव हैं। चारा घोटाले (Fodder Scam) में जब लालू के जेल जाने की नौबत आई तो तो उन्होंने किसी पर भरोसा नहीं किया, सिवा पत्नी राबड़ी देवी के। राबड़ी को सत्ता सौंपने की उनकी दूरदृष्टि ही थी कि आरजेडी पर आज भी उनके परिवार की ही पकड़ कायम है। अगर हेमंत और नीतीश जैसी चूक उन्होंने की होती तो शायद वे आज तेजस्वी यादव को सीएम बनाने का सपना भी नहीं देख पाते। खैर, आतिशी का आकलन होना बाकी है कि वे चंपाई सोरेन और जीतन राम मांझी की राह पकड़ती हैं या सच में उन्हें केजरीवाल के पुनरागमन का इंतजार है।

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