उम्र बढ़ी, पर बचपना और आग आज भी बाकी है!

राकेश जाखेटिया

 

उम्र बढ़ती गई, बचपना सामने आता रहा। बालों में सफेदी आई, जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ा, चेहरे पर अनुभव की लकीरें गहरी हुईं। पर मन के किसी कोने में आज भी वही पुराना राकेश जिंदा है — जो सवाल पूछता है, जो सीखना चाहता है, और जिसके भीतर अभी भी “कुछ कर गुजरने” की आग बाकी है। शायद इसी का नाम जीवन है।

जीवन में मैंने हमेशा एक ही बात सोची — अपने संपर्क में आए हर शुभचिंतक और आलोचक, दोनों को खुश रखूं। पर समय के साथ समझ आया कि यह संभव नहीं। हर व्यक्ति की सोच अलग, अपेक्षाएं अलग, कसौटियां अलग। फिर भी मेरी कोशिश यही रहती है कि सामने वाले के चेहरे पर एक पल की भी संतुष्टि आ जाए। मैं किसी से बराबरी नहीं करना चाहता। न आगे निकलने की दौड़, न पीछे छूटने का डर। बस इतना चाहता हूं कि जो काम हाथ में लूं, उसे ईमानदारी से करूं।

न मैं बहुत शिक्षित हूं और न बिल्कुल अशिक्षित। डिग्री कम रही, पर तजुर्बा बहुत मिला। जीवन की पाठशाला सबसे बड़ी होती है। इसी कारण मैं हर सोसाइटी, हर माहौल में अपने को ढाल लेता हूं। गांव की चौपाल हो या शहर की मीटिंग, धार्मिक सभा हो या व्यापारिक चर्चा — थोड़ी देर में समझ जाता हूं कि यहां की भाषा क्या है। बचपन से ही अच्छे-बुरे का ज्ञान रहा। माता-पिता और बुजुर्गों ने सिखाया था कि गलत के साथ मत खड़े होना, चाहे नुकसान ही क्यों न हो जाए।

मेरी जड़ें बहुत गहरी हैं। भारत की उस पवित्र भूमि से जुड़ी हैं जहां महात्मा विदुर का आश्रम रहा, जहां मालन नदी बहती है, जहां पहाड़ों की तलहटी है। जनपद बिजनौर, गंगा की गोद में बसा क्षेत्र। और सबसे खास — नजीबाबाद स्थित जाखेटिया हवेली। वही मेरी जन्मभूमि है। उस हवेली की ऊंची दीवारें, बड़ा आंगन, बरामदे में रखी पुरानी कुर्सियां, सब आज भी आंखों में तैरते हैं। उस मिट्टी की खुशबू, उस घर के संस्कार ही मेरी असली पूंजी हैं। जब भी वहां जाता हूं तो लगता है पूर्वज मुझे देख रहे हैं और कह रहे हैं “बेटा, नाम रोशन करना”। उस जन्मभूमि पर मुझे हमेशा गर्व रहा है।

जीवन ने मुझे दो बिल्कुल अलग दुनियाएं दिखाईं। एक तरफ ग्रामीण जीवन की सादगी। सुबह मुर्गे की आवाज, खेतों में काम करते किसान, त्योहारों पर पूरे गांव का एक साथ जश्न मनाना, किसी के दुख में सबका साथ देना। दूसरी तरफ महानगरों की भव्यता। ऊंची इमारतें, तेज रफ्तार, प्रतिस्पर्धा, नए अवसर और उतनी ही बड़ी चुनौतियां। गांव ने मुझे सिखाया “जड़ों से जुड़े रहो” और शहर ने सिखाया “समय के साथ बदलो”। दोनों के बिना जीवन अधूरा है।

इन वर्षों में मैंने समाज को बहुत करीब से देखा। सामाजिकता का मतलब सिर्फ मिलना-जुलना नहीं, एक-दूसरे के काम आना है। धार्मिकता का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, मन में करुणा रखना है। व्यवहारिकता का मतलब चालाकी नहीं, सच बोलकर रिश्ते निभाना है। राजनीति को देखा — वहां सिद्धांत भी हैं और समझौते भी। परिवार का महत्व समझा — पैसा चला जाए तो आ सकता है, पर रिश्ता एक बार टूटे तो जोड़ना मुश्किल। मित्रता की मिठास चखी और आपसी दुश्मनी की कड़वाहट भी देखी। व्यापार में उतरा तो समझ आया कि भरोसा सबसे बड़ी पूंजी है। एक बार ग्राहक का भरोसा जीत लिया तो वह पीढ़ियों तक चलता है।

लोगों से मिलते हुए एक कला और सीखी। सामने वाला व्यक्ति क्या चाहता है, यह दो-तीन संवाद में ही पता चल जाता है। उसकी आवाज का उतार-चढ़ाव, उसकी चुप्पी, उसकी आंखों की चमक सब बता देती है। इसलिए मैं बोलने से पहले सुनता हूं। आज के समय में अच्छा श्रोता मिलना सबसे बड़ी बात है।

आलोचना भी मिली है। कुछ लोगों को मेरी सादगी पसंद नहीं आई। कुछ को लगा मैं बहुत सीधा हूं। कुछ ने कहा ज्यादा सोचते हो। पर मैंने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया। क्योंकि आलोचना भी हमें तराशती है। तारीफ भी मिली। जब कोई कहता है “आपसे मिलकर अच्छा लगा” तो लगता है चलो कुछ तो सही कर रहे हैं।

कई बार रात को सोचता हूं — क्या मैं सबको खुश रख पाया? जवाब आता है नहीं। और शायद रख भी नहीं पाऊंगा। पर कोशिश करना नहीं छोडूंगा। क्योंकि इंसानियत यही है।

आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है जीवन एक लंबी यात्रा है। इस यात्रा में धूप भी मिली, छाया भी। सफलता भी मिली, असफलता भी। अपनों का साथ भी मिला, कुछ के बिछड़ने का गम भी। पर एक बात तय है — रुकना नहीं है। क्योंकि अभी मन में बहुत कुछ करना बाकी है। समाज के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए। कुछ ऐसा काम जो मेरे बाद भी लोग याद रखें।

मैं मानता हूं कि इंसान चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, उसे तीन चीजें कभी नहीं भूलनी चाहिए। पहली — अपनी मिट्टी। दूसरी — अपने संस्कार। तीसरी — अपना बचपना। मिट्टी हमें जमीनी रखती है। संस्कार हमें इंसान रखते हैं। और बचपना हमें जिंदा रखता है। जिस दिन ये तीनों चले गए, उस दिन जीवन बुझ जाता है।

इसलिए मैं आज भी सीखता हूं। नई चीजें पढ़ता हूं। युवाओं से बात करता हूं। उनकी सोच सुनता हूं। क्योंकि दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है। जो नहीं बदलेगा, वह पीछे रह जाएगा।

अंत में बस इतनी प्रार्थना है — ईश्वर मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं अपने हिस्से का काम कर सकूं। किसी का दिल न दुखाऊं। और जाते-जाते कुछ अच्छे निशान छोड़ जाऊं।

जीवन एक यात्रा है। और यह यात्रा अभी जारी है।

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