भारत में जाति और डिजिटल अर्थव्यवस्था : असमानता, सत्ता और आंबेडकरवादी चुनौती

एस आर दारापुरी 

 

पिछले दशक में भारत में डिजिटल तकनीकों का तीव्र विस्तार हुआ है। डिजिटल शासन, डिजिटल वित्त, ई-कॉमर्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और प्लेटफ़ॉर्म आधारित श्रम बाजार ने भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज को गहराई से प्रभावित किया है। नीति निर्माताओं द्वारा डिजिटल अर्थव्यवस्था को विकास, पारदर्शिता और समावेशन का माध्यम बताया जाता है। किंतु भारत की सामाजिक संरचना ऐतिहासिक रूप से जाति आधारित असमानताओं से निर्मित रही है। इस संदर्भ में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या डिजिटल क्रांति इन असमानताओं को कम कर रही है या उन्हें नए रूप में पुनः उत्पन्न कर रही है।

यह शोध लेख भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था और जाति व्यवस्था के बीच संबंध का विश्लेषण करता है। आंबेडकरवादी राजनीतिक अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से यह तर्क दिया गया है कि डिजिटल तकनीकें सामाजिक संरचना से स्वतंत्र नहीं होतीं। जब वे एक गहरे जातिगत समाज में लागू होती हैं, तो वे मौजूदा असमानताओं को पुनः निर्मित करने की प्रवृत्ति रखती हैं। इस लेख में तीन प्रमुख आयामों का विश्लेषण किया गया है—(1) जाति आधारित डिजिटल विभाजन, (2) डिजिटल श्रम बाजार में जातिगत संरचना, और (3) डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र में दलित प्रतिरोध और नई संभावनाएँ। अंततः लेख यह प्रस्तावित करता है कि डिजिटल परिवर्तन को सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप बनाने के लिए आंबेडकरवादी दृष्टिकोण अत्यंत आवश्यक है।

1. प्रस्तावना

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से ही दुनिया भर में डिजिटल तकनीकों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। इंटरनेट, मोबाइल फोन, क्लाउड कंप्यूटिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने अर्थव्यवस्था और समाज के कई क्षेत्रों को बदल दिया है। भारत में भी डिजिटल तकनीकों का प्रसार अभूतपूर्व गति से हुआ है।

भारत सरकार ने डिजिटल परिवर्तन को विकास की रणनीति के रूप में अपनाया है। डिजिटल शासन, डिजिटल पहचान प्रणाली, ऑनलाइन भुगतान व्यवस्था और ई-गवर्नेंस कार्यक्रमों को प्रशासनिक दक्षता और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक बताया गया है। डिजिटल तकनीकों के समर्थकों का दावा है कि वे भ्रष्टाचार को कम करती हैं, प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाती हैं और नागरिकों को सशक्त बनाती हैं।

लेकिन यह आशावादी दृष्टिकोण कई महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्नों को अनदेखा कर देता है। भारत में सामाजिक और आर्थिक अवसर समान रूप से वितरित नहीं हैं। जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्रीय असमानताएँ आज भी समाज के कई पहलुओं को प्रभावित करती हैं।

इसलिए डिजिटल क्रांति को समझने के लिए केवल तकनीकी दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है। इसे सामाजिक संरचना और सत्ता संबंधों के संदर्भ में देखना आवश्यक है।

यह शोध लेख इसी प्रश्न की पड़ताल करता है कि भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में जाति किस प्रकार कार्य कर रही है।

2. सैद्धांतिक ढाँचा: जाति, तकनीक और राजनीतिक अर्थव्यवस्था

तकनीक और समाज के संबंध पर विचार करते समय यह समझना महत्वपूर्ण है कि तकनीक कभी भी पूरी तरह तटस्थ नहीं होती। तकनीकी प्रणालियाँ सामाजिक संस्थाओं, आर्थिक शक्तियों और राजनीतिक निर्णयों से प्रभावित होती हैं।

भारतीय संदर्भ में जाति व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संरचना है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति को “क्रमबद्ध असमानता” की प्रणाली बताया था। इस व्यवस्था में समाज के विभिन्न समूहों को अलग-अलग स्तरों पर रखा जाता है और उनके अधिकार तथा अवसर भी उसी के अनुसार निर्धारित होते हैं।

आंबेडकर का मानना था कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक संस्थाओं तक सीमित नहीं रह सकता। यदि समाज में सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ बनी रहती हैं, तो राजनीतिक लोकतंत्र भी टिकाऊ नहीं होगा।

इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो डिजिटल तकनीकें भी उसी सामाजिक संरचना से प्रभावित होंगी जिसमें वे लागू होती हैं। यदि शिक्षा, संसाधनों और सामाजिक पूँजी तक पहुँच पहले से ही असमान है, तो डिजिटल तकनीकों तक पहुँच भी उसी असमानता को प्रतिबिंबित करेगी।

3. डिजिटल अर्थव्यवस्था का उदय

भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था कई क्षेत्रों में फैल चुकी है। इनमें प्रमुख हैं:

डिजिटल भुगतान प्रणाली, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल स्वास्थ्य सेवाएँ, प्लेटफ़ॉर्म आधारित रोजगार एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा विश्लेषण

इन तकनीकों ने आर्थिक गतिविधियों को अधिक तेज और वैश्विक बना दिया है। छोटे व्यवसाय भी अब ऑनलाइन बाजारों से जुड़ सकते हैं और उपभोक्ता मोबाइल फोन के माध्यम से विभिन्न सेवाओं का उपयोग कर सकते हैं।

लेकिन इस परिवर्तन के लाभ समान रूप से वितरित नहीं हैं।

4. जाति आधारित डिजिटल विभाजन

डिजिटल अर्थव्यवस्था में प्रवेश के लिए तीन प्रमुख संसाधनों की आवश्यकता होती है:

डिजिटल उपकरण, इंटरनेट कनेक्टिविटी एवं डिजिटल कौशल

भारत में इन तीनों संसाधनों तक पहुँच असमान है।

दलित और आदिवासी समुदायों में डिजिटल उपकरणों की उपलब्धता अपेक्षाकृत कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी भी सीमित है। इसके अलावा डिजिटल कौशल की कमी भी एक बड़ी समस्या है।

यह स्थिति केवल आर्थिक गरीबी का परिणाम नहीं है बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक बहिष्कार का परिणाम है। शिक्षा से लंबे समय तक वंचित रहने के कारण कई दलित समुदाय डिजिटल तकनीकों के उपयोग में पीछे रह गए हैं।

इस प्रकार डिजिटल विभाजन केवल तकनीकी समस्या नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न है।

5. डिजिटल शासन और सामाजिक बहिष्कार

भारत में कई सरकारी सेवाएँ अब डिजिटल प्रणालियों पर आधारित हो चुकी हैं। नागरिकों को सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए डिजिटल पहचान और ऑनलाइन प्रणालियों का उपयोग करना पड़ता है।

यह व्यवस्था प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए बनाई गई है, लेकिन इससे कुछ नई समस्याएँ भी उत्पन्न हुई हैं।

कई मामलों में तकनीकी त्रुटियों के कारण लोगों को सरकारी लाभ नहीं मिल पाता। बायोमेट्रिक पहचान की विफलता, इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या और डेटाबेस की गलतियों के कारण गरीब नागरिकों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

चूँकि दलित समुदायों का एक बड़ा हिस्सा सरकारी योजनाओं पर निर्भर करता है, इसलिए डिजिटल शासन की विफलताओं का प्रभाव उन पर अधिक पड़ता है।

6. डिजिटल श्रम बाजार और जाति

डिजिटल अर्थव्यवस्था ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग, स्टार्ट-अप कंपनियाँ और डिजिटल सेवाएँ तेजी से बढ़ रही हैं।

लेकिन इन क्षेत्रों में प्रवेश के लिए उच्च शिक्षा और तकनीकी कौशल आवश्यक हैं। चूँकि उच्च शिक्षा संस्थानों तक पहुँच ऐतिहासिक रूप से असमान रही है, इसलिए इन क्षेत्रों में भी सामाजिक असमानताएँ दिखाई देती हैं।

इसके विपरीत, डिजिटल अर्थव्यवस्था के निम्न स्तरों—जैसे डिलीवरी सेवाएँ और कैब ड्राइविंग—में दलित और गरीब समुदायों की भागीदारी अधिक दिखाई देती है।

इस प्रकार डिजिटल अर्थव्यवस्था में भी एक नया श्रम विभाजन उभर रहा है।

7. डिजिटल पूँजीवाद और सामाजिक शक्ति

डिजिटल अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें डेटा और एल्गोरिथ्म का केंद्रीय महत्व होता है। बड़ी तकनीकी कंपनियाँ विशाल मात्रा में डेटा एकत्र करती हैं और उसका उपयोग आर्थिक लाभ के लिए करती हैं।

यह स्थिति नई प्रकार की आर्थिक शक्ति उत्पन्न करती है। डेटा पर नियंत्रण रखने वाली कंपनियाँ बाजार में अत्यधिक प्रभावशाली बन जाती हैं।

यदि डेटा संग्रह और विश्लेषण की प्रक्रियाओं में सामाजिक पूर्वाग्रह मौजूद हों, तो एल्गोरिथ्म भी उन्हीं पूर्वाग्रहों को पुनः उत्पन्न कर सकते हैं।

इस प्रकार डिजिटल तकनीकें सामाजिक असमानताओं को स्वचालित रूप से दोहरा सकती हैं।

8. डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र और दलित प्रतिरोध

डिजिटल तकनीकों ने दलित आंदोलन को नए अवसर भी प्रदान किए हैं। सोशल मीडिया और ऑनलाइन मंचों के माध्यम से दलित बुद्धिजीवी और कार्यकर्ता अपने विचारों को व्यापक स्तर पर प्रसारित कर सकते हैं।

डिजिटल मंचों ने दलित साहित्य, इतिहास और आंबेडकरवादी विचारधारा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इसके अलावा सोशल मीडिया के माध्यम से जातिगत अत्याचारों के मामलों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजागर करना संभव हुआ है।

इस प्रकार डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र सामाजिक संघर्ष का एक नया मंच बन गया है।

9. आंबेडकरवादी दृष्टिकोण से डिजिटल न्याय

यदि डिजिटल अर्थव्यवस्था को सामाजिक न्याय के अनुरूप बनाना है तो कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत कदम आवश्यक हैं।

1. सार्वभौमिक डिजिटल अवसंरचना

सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इंटरनेट और डिजिटल सेवाएँ सभी नागरिकों के लिए सुलभ हों।

2. डिजिटल शिक्षा

दलित और अन्य वंचित समुदायों के लिए विशेष डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए।

3. श्रम अधिकार

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर काम करने वाले श्रमिकों को श्रम कानूनों के अंतर्गत सुरक्षा मिलनी चाहिए।

4. डेटा लोकतंत्र

नागरिकों के डेटा पर सार्वजनिक और लोकतांत्रिक नियंत्रण होना चाहिए।

5. एल्गोरिथ्मिक पारदर्शिता

डिजिटल प्रणालियों के संचालन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।

10. निष्कर्ष

भारत की डिजिटल क्रांति एक ऐतिहासिक परिवर्तन है। लेकिन यह परिवर्तन एक ऐसे समाज में हो रहा है जो अभी भी गहरी सामाजिक असमानताओं से प्रभावित है।

यदि डिजिटल तकनीकों का उपयोग सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर नहीं किया गया, तो वे मौजूदा असमानताओं को और अधिक गहरा कर सकती हैं।

डॉ. आंबेडकर ने लोकतंत्र को केवल राजनीतिक प्रणाली नहीं बल्कि सामाजिक जीवन का सिद्धांत माना था। इसलिए भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को भी समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए।

डिजिटल तकनीकें तभी वास्तव में परिवर्तनकारी बन सकती हैं जब वे समाज के सबसे कमजोर वर्गों को सशक्त बनाएं।

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