आंदोलन को गेट के बाहर लाए बिना सहारा मीडियाकर्मियों को भुगतान मिलना मुश्किल!

चरण सिंह 

सहारा से चाहे कोई मीडिया कर्मी और या फिर निवेशक यदि किसी के आत्महत्या करने की खबर आती है तो बहुत पीड़ा होती ही। नोएडा से मीडिया कर्मी साथी अनिल मिश्रा के आत्महत्या करने की खबर पढ़ी तो विश्वास ही न हुआ। इसकी बड़ी वजह यह रही कि अनिल मिश्रा बहुत मिलनसार, हिम्मती, बड़ा जज्बा रखने वाला और बेबाक टिप्प्पणी करने वाला था। समझा जा सकता है कि इतने हिम्मती साथी को आत्महत्या करनी पड़ गई तो दूसरे साथियों की मनोदशा क्या होगी ? बात सहारा प्रबंधन की ही नहीं है बल्कि सत्ता पक्ष के साथ ही विपक्ष को भी किसी की पीड़ा से कोई लेना देना नहीं है। सिस्टम तो पूरी तरह से भ्र्ष्ट हो चुका है। साथियों लड़ाई करो या मरो की करनी पड़ेगी।

दिक्कत कितनी भी आत्महत्या को जायज नहीं ठहराया जा सकता है। अराजक लोग तो चाहते ही हैं कि लड़ाई लड़ने वाला मर जाए। आत्महत्या करके तो आदमी अपने परिवार की दिक्क्तें और बढ़ा जाता है। आठ महीनों से बकाया वेतन न मिलने से आर्थिक तंगी बताया जा रहा है। 2015-16 में जब हम लोगों ने सहारा मीडिया में आंदोलन किया था तब भी इसी तरह से 5-6 महीने का बकाया भुगतान था। उस आंदोलन के विस्तार में मैं नहीं जाऊंगा पर यह जरूर कहना चाहूंगा कि हक़ के लिए लड़ने वाले साथी सहारा परिसर में बैठे साथियों से अच्छी स्थिति में हैं। यदि आप के अंदर लड़ने के जज्बा है तो ऊपर वाला भी कोई न कोई रास्ता निकाल देता है।
नोएडा परिसर में आंदोलन कर रहे साथियों से कहना चाहूंगा कि दीवारों के अंदर आंदोलन करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। अदालत का रास्ता बहुत लम्बा है। दस साल से तो हम लड़ रहे हैं पर हम लोगों ने गेट पर बैठकर काफी पैसा तो निकाल लिया था। ऐसे ही दम तोड़ना है या फिर सहारा प्रबंधन को पैसे देने के लिए मजबूर करना है यह निर्णय आंदोलन कर रहे साथियों को करना है।
साथियों भुगतान लेना है तो आंदोलन को गेट के बाहर लाओ। गेट के बाहर आंदोलन होगा तो दूसरे संगठनों के समर्थन की उम्मीद भी जगेगी। आंदोलन को मजबूती देने का पूरा प्रयास किया जाएगा। निवेशकों की लड़ाई लड़ रहे संगठनों से भी बात की जाएगी। जब मैं निवेशकों की लड़ाई लड़ने गेट पर पहुंचा था तब भी मैंने सहारा मीडिया के साथियों से निवेशकों की लड़ाई में शामिल होकर अपनी लड़ाई भी लड़ने की अपील की थी। याद है न। परिस्थिति कुछ भी रही हो पर मैं सहारा के साथियों की लड़ाई लड़ने से पीछे नहीं हटा हूं। चाहे साथी मीडिया के हों या फिर पैराबैंकिंग के।
आंदोलन में किस साथी का क्या रोल रहा इस पर मैं नहीं जाऊंगा। यदि भुगतान लेना है तो आंदोलन को बड़ा करना होगा। यह बात समझ लीजिये कि यदि हम लोग यदि गेट पर न बैठते तो हमें भी एक पाई भी सहारा प्रबंधन देने वाला नहीं था। भुगतान नहीं हो रहा है तो नोएडा परिसर की जमीन पर दावा ठोको। वैसे भी सुब्रत राय मीटिंग यही तो कहा करते थे कि सहारा की संपत्ति पर हर सदस्य का अधिकार है। जो लोग मकान का किराया नहीं दे पा रहे हैं वे नोएडा के ऑफिस को ही अपना आशियाना बनाएं। जब तक भुगतान नहीं होता है तब तक परिवार समेत सहारा परिसर में ही रहने की व्यवस्था करें।
नोएडा परिसर में बैठने वाले साथियों का तो हर सुविधा का दावा बनता है। नोएडा के अलावा सभी जगह अख़बार निकल तो रहा है। पैसा मांगो। मेरा तो मानना है कि जितने भी साथी नोएडा परिसर में बैठे हैं। वे सभी अपना आसियाना सहारा परिसर को ही बनाएं। सहारा परिसर का इस्तेमाल अपने लिए करें।
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