कल तक जो लोग आपके साथ चल रहे थे, वे आज इस दुनिया में नहीं हैं। कुछ की मौत हो गई, तो कुछ हालात से मजबूर होकर अपनी जान गंवा बैठे। आज आपकी आँखों के सामने जो लोग दिखाई दे रहे हैं, वे भी ज़िंदा लाशों की तरह जीवन जी रहे हैं। आंदोलन शुरू हुए एक दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन सरकारों ने हमारी पीड़ा को गंभीरता से नहीं लिया। सबसे बड़ी बात, दुश्मन कहीं बाहर नहीं है, वह हमारे बीच ही है। जब कुछ लोग संघर्ष कर रहे हैं, तब केवल 2% लोग ही आंदोलन में सक्रिय हैं, जबकि 98% लोग आज भी सहारा जैसी धोखेबाज़ व्यवस्था का बोझ अपने सिर पर ढो रहे हैं।
ऐसे में क्या हमारी जीत संभव है? ज़रा सोचिए।
कुछ लोगों ने आंदोलन को ही अपना व्यवसाय बना लिया है। आंदोलन के नाम पर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं, कुछ लोगों को हिस्सेदारी देकर पीड़ितों को बाँट रहे हैं। दो-चार लोगों के साथ घूमकर उसे आंदोलन का नाम दे रहे हैं और अपने निजी हितों के लिए हमारे बीच फूट डाल रहे हैं।
ऐसे हालात में क्या आंदोलन सफल हो सकता है?
तो फिर क्या किया जाए?
हमने न्याय की उम्मीद में अदालतों का दरवाज़ा खटखटाया। लेकिन हमारी ताकत एक रुपये की है और सहारा जैसे लोगों की ताकत सौ रुपये की। अब आप ही सोचिए, कीमत किसकी ज्यादा होगी?
हम थक चुके हैं… घर बेच दिए, बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाए, फीस नहीं भर पाए, शादियाँ नहीं कर पाए, इलाज नहीं करा पाए, और अब मौत का इंतज़ार कर रहे हैं।
क्या ऐसी स्थिति में जीत संभव है?
हाँ, संभव है… लेकिन एक शर्त पर।
हम सबको एक मंच पर आना होगा। रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन मंज़िल एक ही है। जब तक सभी पीड़ित एकजुट होकर एक ही मंच पर नहीं आएँगे, तब तक सफलता मुश्किल है।
वरना भूल जाइए… कोई अदालत आपके पक्ष में फैसला नहीं देगी। क्या न्याय सिर्फ पैसे वालों के लिए है?
अगर आपका जवाब “नहीं” है…
तो आइए, एक संयुक्त मंच का निर्माण करें। एकजुट हों, संगठित हों और अपने अधिकारों के लिए मिलकर लड़ें।
— पूजिता मिश्रा







