(महेश मिश्रा): बंधे बालाजी धाम, झुंझुनू में शब्दाक्षर साहित्यिक संस्था द्वारा तीन दिवसीय वार्षिक साहित्योत्सव 2025 का भव्य आयोजन किया गया। समापन दिवस पर आयोजित सम्मान समारोह में साहित्यिक गरिमा और परिवारिक भावनाओं की अद्भुत झलक देखने को मिली।
संस्था प्रमुख रवि प्रताप सिंह ने अध्यक्ष पद पर हर बार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र को आमंत्रित किए जाने के प्रश्न पर कहा “डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र जी इस ‘शब्दाक्षर’ परिवार के पिता हैं और पिता हमेशा एक ही होता है, बदला नहीं जा सकता।”
कार्यक्रम का शुभारम्भ डॉ. मिश्र ने सरस्वती वंदना और अपनी मार्मिक कविता “मेरी दादी जब मुझसे चिट्ठी लिखवाती है, वो कविता बन जाती है” से किया। समारोह का संचालन राजकुमार महोबिया ने किया।
विशेष काव्य प्रस्तुतियाँ
मनोज हिंदुस्तानी ने अपने सशक्त शब्दों में बेटी-पूजन और ईश्वर-खोज की अद्वितीय अनुभूति कराई।
नीलम उपाध्याय (उत्तराखंड/दिल्ली समिति) ने राजस्थान की धरा को नमन करते हुए कहा: “शीश झुका है जिसको लेने, न वो सिर्फ बहुरंगी कपड़ा है; ये राजस्थान का गौरव है और मेरी भी प्रतिष्ठा है।”
लखन जी के नेतृत्व में सात कवियों ने समय की गरिमा बनाए रखते हुए काव्यपाठ किया। उन्होंने स्त्री-पुरुष की आत्मिक समानता को रेखांकित किया। उनके योगदान पर रवि (राम) जी ने उन्हें “दायीं भुजा” कहकर सम्मानित किया।
जांगिड़ जी ने राजस्थानी मेले का जीवंत चित्रण किया।
डॉ. अम्बिका ने छंदबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कीं, जबकि राजकुमार प्रतापगढ़िया (दिल्ली अध्यक्ष) ने ग़ज़लों का रंग जमाया।
केरल से आई डॉ. लक्ष्मी ने “सिंदूर” शीर्षक रचना से हिंदी के सम्मान में अपने ओणम पर्व का त्याग कर उपस्थित होने का संदेश दिया।
सविता बांगण जी ने हिंदी दिवस को समर्पित कविता प्रस्तुत की।
मुकेश मारवाड़ी, कुसुम ‘अग्नि’ और सर्वेश सिंह की वीर रस की कविताओं ने माहौल को उत्साह और रोमांच से भर दिया।
अन्य विशिष्ट प्रतिभागी
राजकुमार प्रतापगढ़िया, डॉ. अम्बिका मोदी, हरेंद्र यादव जी, भारती जी, गोल्डी जी, नीलम उपाध्याय (दिल्ली समिति) सहित लगभग 90 साहित्यप्रेमी इस महोत्सव में सम्मिलित हुए और अगले वर्ष पुनः मिलने का संकल्प लिया।
समापन अवसर पर दादू श्री बुद्धिशरण मिश्र के प्रेरक वचनों तथा माननीय रवि प्रताप सिंह के पारिवारिक नेतृत्व ने सभी उपस्थित साहित्यकारों और अतिथियों को भावविभोर कर दिया।







