अब भी सुरक्षित नहीं है नारी

अरुण श्रीवास्तव 

‘अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी’ नारी की दुर्दशा पर ये बात कविता के रूप में मैथिलीशरण गुप्त ने कही थी। ये कविता कब लिखी गई थी यह तो पता नहीं पर इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि तब के समाज में भी नारी पर अत्याचार बहुत ज्यादा था और आज के समाज में भी कम नहीं हुआ है। यह कब थमेगा थमेगा भी या नहीं कहा नहीं जा सकता।
यह वक्त आंकड़ों में जाने का कारण तलाशने का है समाज में और अपने अंदर भी। इसे यह कह कर टाला नहीं जा सकता कि यह अनंत काल से होता रहा है तो क्या अनंत काल तक होता रहेगा। समाज में जब तक हम जैसे दरिंदे मौजूद रहेंगे तब तक इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी। कभी निर्भया के रूप में सामने आएंगी तो कभी अंकिता भंडारी के रूप में। कठुआ, हाथरस उन्नाव तो बीएचयू के रूप में।
आज स्थिति यह हो गई है कि, इस तरह की घटनाएं हमें प्रभावित नहीं करतीं, करतीं भी हैं तो तात्कालिक रूप में। घटना घटती है तो दो-चार दिन बाद उजागर होती है और इसका असर भी दो -चार दिनों तक ही रहता है। याद करिए निर्भया के बाद जो कुछ हुआ था और उसके बाद के घटनाक्रम को भी। हफ्ते दो हफ्ते धरना-प्रदर्शन हुआ उसके बाद तूफ़ान के बाद जैसा सन्नाटा। निर्भया के बाद पूरा देश आंदोलित हो गया था। इतना कि तत्कालीन सरकार को नया कानून लेकर आना पड़ा। उसके बाद कठुआ हुआ, निर्भया को न्याय दिलाने की मांग करने वाले कठुआ की घटना पर आरोपियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तिरंगा यात्रा में शामिल थे। कुछ ऐसा ही दिल्ली में महिला खिलाड़ियों के साथ हुआ। महिला खिलाड़ियों ने कुश्ती संघ से जुड़े बड़े पदाधिकारी पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया, हफ्तों सड़कों पर संघर्ष किया पर उस महाप्रतापी का बाल भी बांका नहीं हुआ। उल्टे महिला खिलाड़ियों को सड़कों पर घसीटा गया। यहां पर यह भी ध्यान देने वाली बात है कि, निर्भया कांड में जो महिलाएं और महिला संगठन पीड़िता के साथ थे महिला खिलाड़ियों के मामले में वो खामोश थे और जो खामोश थे वो कठुआ, हाथरस, बीएचयू व उन्नाव की घटनाओं को लेकर हाय-तौबा कर रहे हैं। यानी कि बलात्कार व हत्या जैसी घटनाओं पर हम और हमारा समाज बंटा हुआ है।
ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली कि मामला है। वहां की राज्य महिला आयोग की मुखिया के कथित अत्याचार की बात सामने आई, सत्तारूढ़ दल की महिला शाखा सड़कों पर उतर आई पर इसी संगठन ने महिला खिलाड़ियों पर हुए अत्याचार के सवाल पर चुप्पी साध लिया था। कहने का मतलब यह कि हम खांचों में बंटे हुए हैं वो भी आधी आबादी पर आधी आबादी द्वारा किए जा रहे अत्याचार पर। इसका मतलब यह भी नहीं कि आधी आबादी आधी आबादी के खिलाफ सड़कों पर आ जाए। इस तरह के अत्याचारों के पीछे हमारे दिमाग में सदियों से चली आ रही सोच। हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज रहा है चाहे युग जो भी हो रहा हो। आदिम काल को छोड़कर नारी का स्वतंत्र अस्तित्व कभी रहा ही नहीं। सामंतवाद समाप्त हो गया पर सोच कायम ही नहीं बल्कि नए स्वरूप में मजबूत हुई हैं। इस तरह की घटनाएं सामंतवादी सोच का ही नतीजा है।
बात मुद्दे की, ताजा मामला कोलकाता के एक मेडिकल कॉलेज का है। घटना के वक्त थकी-हारी महिला डॉक्टर सेमिनार हाल में सो रही थी कि उसके साथ इस तरह की विभत्स घटना हुई। यह घटना अन्य घटनाओं से हट कर सोचने को मजबूर करती है कि कितने दरिंदे हो गए हैं हम। आमतौर पर बलात्कार के बाद महिला की हत्या करने का समाचार सुनने को मिलता था। आज के सभ्य कहे जाने वाले समाज में महिलाओं के साथ दो तरह के अपराध होने लगे हैं। एक तो उसके साथ बलात्कार होता था और फिर उसकी हत्या कर दी जाती थी। लेकिन यह घटना उससे कई गुना ज्यादा आरोपी के दरिंदे होने का परिचय देता है। पुलिस के अनुसार पहले महिला की हत्या की गई थी फिर उसके साथ बलात्कार किया गया था। अब सोचिए आज के पूंजीवादी, कंप्यूटराइज्ड युग में भी इस तरह की घटनाएं हो रही हैं। यानी की मरे हुए व्यक्ति के साथ बलात्कार किया जा रहा है।

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