8 APRIL 2024 पूर्ण सूर्य ग्रहण – राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव

 

बी. कृष्णा 

नए वर्ष का पहला सूर्य ग्रहण 8 अप्रैल 2024  को  होगा| यह पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा| 8  अप्रैल  को लगने वाला पूर्ण सूर्य ग्रहण मोक्ष राशि मीन  राशि और रेवती नक्षत्र में लगेगा| वैज्ञानिकों के अनुसार यह वर्ष 2010 के बाद लगने वाला सबसे लम्बा सूर्य ग्रहण होगा| इक्कीसवीं सदी का एकलौता पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा जो पूर्णता में  तीन देशों में देखा जायेगा, मेक्सिको, अमेरिका और कनाडा| यह ग्रहण भारतवर्ष में नहीं देखा जाएगा|

इस ग्रहण के ठीक एक दिन पहले अर्थात 7  अप्रैल को चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे नज़दीक होगा|

पूर्ण सूर्यग्रहण क्या है

 

सूर्यग्रहण पूर्णतः खगोलीय घटना है जो हर वर्ष घटित होता है| पृथ्वी और सूर्य के बीच जब चन्द्रमा आ जाता है(तीनों एक सीध में आ जाते हैं) और इसकी वजह से पृथ्वी के एक हिस्से पर चन्द्रमा की छाया पड़ती है और पृथ्वी के उस भाग में अंधकार छा जाता है|| पूर्ण सूर्यग्रहण में  सूर्य,चन्द्रमा के पीछे पूरी तरह से छुप जाता है| ऋग्वेद, रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, भगवद्गीता, ज्योतिषशास्त्र  – इन सब में सूर्य ग्रहण की चर्चा की गयी है|

 

ऋग्वेद के अनुसार

 

1- ऋग्वेद में ऋषि अत्रि ने स्वरभानु ( चन्द्रमा ) नामक असुर द्वारा सूर्य को अपनी गिरफ्त में लेने की बात कही है| इसकी वजह से पृथ्वी पर गहन अंधकार छा जाता है| इस अंधकार में और रात्रि के समय व्याप्त होने वाले अंधकार में बहुत अंतर होता है| इस समय के अंधकार की वजह से पशु पक्षी भयभीत होकर अस्वाभाविक व्यवहार करने लगते हैं|

2 – इसके बाद वे कहते हैं कि स्वरभानु का सूर्य को अपनी गिरफ्त में लेने की वजह से वायु ने अपनी दिशा बदल ली| वायु के दिशा परिवर्तन की बात करते हैं| गति परिवर्तन की बात नहीं करते हैं|

3- समुद्र जल के pH मान में परिवर्तन होने लगता है| pH मान में परिवर्तन अर्थात जल के अम्लीयता और क्षारीयता में परिवर्तन की बात करते हैं| समुद्र जल में आये इस परिवर्तन की वजह से समुद्र में रहने वाले जीवों और जंतुओं पर इसका प्रभाव पड़ता है|

4 – ग्रहों के आपसी तालमेल में गड़बड़ी की वजह से पेड़ पौधों में आनेवाले फूलों और फलों की संरचना पर असर होता है|

ऋग्वेद वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, भगवद्गीता, ज्योतिषशास्त्र कहीं भी पूर्ण सूर्य ग्रहण के वैयक्तिक प्रभाव की चर्चा नहीं की गयी है की फलाने राशि वाले व्यक्तियों के लिए ऐसा होगा या वैसा होगा| राष्ट्र और राजा पर इसके प्रभाव की चर्चा की गयी है| युद्ध की बात की गयी है|
राष्ट्र और राजा पर इसके प्रभाव, युद्ध को जानने की मैंने कोशिश शुरू की और यह पाया –

वाल्मीकि रामायण ( 2 -4 -18 &19 ) राजा दशरथ के जन्म राशि का इस प्रभाव में जाना और उसके असर की चर्चा की गयी है|

महाभारत के भीष्म पर्व में भी सूर्य का राहु केतु से ग्रसित होना और उसके प्रभाव की चर्चा की गयी है|

किसी भी राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष या राज्य के राजा यदि ग्रहण के प्रभाव में आते हैं तो उसका असर संपूर्ण राष्ट्र पर , राज्य पर आएगा यह तो तय है|

इतिहास में चलें तो सूर्यग्रहण के साथ साथ ही युद्ध चलता है| तमाम ऐसे बड़े युद्ध मिलते हैं जिनकी शुरुआत ग्रहण के आस पास हुई है| यहाँ इतिहास में वर्णित एक ग्रहण की चर्चा  बनती है| 5 मई 840 का पूर्ण सूर्य ग्रहण| इस ग्रहण से यूरोप का राजा इतना परेशान हो जाता है कि कुछ ही समय पश्चात् उसकी मृत्यु हो जाती है| उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र गद्दी के लिए आपस में युद्ध करते हैं जिसकी परिणति वर्ष 843 में होती है|  यूरोप तीन भागों में बंट जाता है जिसे आजकल हम सब फ्रांस, ज़र्मनी और इटली के नाम से जानते हैं|

किस भाव में किस राशि में ग्रहण लग रहा है इसको देखने के साथ साथ राश्याधिपति की क्या स्थिति है, नक्षत्राधिपति  की क्या स्थिति है, यह भी देखना है| पूर्ण सूर्य ग्रहण के समय 8 ग्रहों का 65 डिग्री के अंशात्मक दूरी में होना, 6 ग्रहों का वरुण नाड़ी में होना, शुक्र और राहु का साथ होना, चन्द्रमा का ठीक एक दिन पहले पृथ्वी के सर्वाधिक नज़दीक होना  – हर स्तर पर आपक बदलाव का संकेत दे रहे हैं साथ ही साथ  प्राकृतिक उत्पात, मौसम में अप्रत्याशित परिवर्तन और जलवायु परिवर्तन का संकेत दे रहे हैं|

समुद्र जल के pH में परिवर्तन होगा| जिसकी वजह से कुछ समुद्री जीव के अस्तित्व पर संकट आएगा| पेड़ पौधों की क्षति होगी| पशुधन का नाश होगा| पित्त का प्रकोप बढ़ेगा और आँखों से सम्बंधित बीमारी बढ़ेगी|

पूर्ण सूर्य ग्रहण के कारण दिन के तापमान में अचनाक से तेजी से आये गिरावट की वजह से अमेरिका और कनाडा के कुछ हिस्सों में, जिसमें  टेक्सास, ऑहियो, लुसिआना प्रमुख हैं, तेज आंधी तूफ़ान की स्थिति निर्मित हो सकती है|

हालाँकि यह ग्रहण भारत में नहीं देखा जायेगा परंतु इसी दिन से नव संवत्सर की शुरुआत होना और नव संवत्सर के शुरुआत के समय भारतीय समयानुसार बनने वाली कुंडली में ग्रहों के आपसी संबंधों की वजह से यहाँ भी प्राकृतिक उत्पात और मौसम में अप्रत्याशित बदलाव की स्थिति तो बना ही रहे हैं| भारत के उत्तरी, उत्तरीपूर्वी और पश्चिमोत्तर भाग इससे प्रभावित होते हुए नज़र आ रहे हैं|

 ग्रहण और गर्भवती महिलाएं

गर्भवती महिलाओं को ग्रहण के दौरान घर में ही रहे जाने की सलाह दी जाती है| उन्हें कहा जाता है कि अगर इस दौरान वे घर से बाहर निकलेंगी तो उनका बच्चा खंड तालु अर्थात कटी हुई तालु लेकर पैदा होगा| यह एक विचारणीय प्रश्न है कि सूर्य ग्रहण के दौरान जितने भी बच्चे होंगे क्या वे खंड तालु लेकर ही पैदा होंगे? इस कतहँ की सत्यता की जानकारी के लिए शोध किया जाना चाहिए|

ज्योतिष के अनुसार गर्भवती महिला के तीसरे महीने में पुंसवन संस्कार किया जाता है| गर्भस्थ शिशु के लिए यह माह बहुत संवेदनशील होता है| इस समय वैदिक मंत्रोच्चार के साथ साथ आहार परिवर्तन और औषधीय प्रयोग द्वारा गर्भस्थ शिशु का लिंग परवर्तित किया जा सकता है| विज्ञान भी इस बात को मानता है कि तीसरे महीने में गर्भस्थ शिशु का लिंग परिवर्तन किया जा सकता है| चूँकि यह महीना इतना संवेदनशील होता है इसलिए वैसी महिलाएं जिनका तीसरा महीना चल रहा है गर्भ का, वे इस दौरान अपने खाने पीने की शुचिता का ध्यान रखें|

यह एक खगोलीय घटना है

हर वर्ष कम से  कम चार बार और अधिक से अधिक सात बार  घटती ही हैं | इस वर्ष छह ग्रहण लगेंगे| 2011 में भी छह ग्रहण लगे थे |2013, 2018, 2019 में पांच ग्रहण लगा था| 1935 और 1982 में 7 ग्रहण लगा था| हर ग्रहण अपने साथ पंद्रह दिन आगे-पीछे दूसरे ग्रहण को लेकर आता ही है |

ग्रहण की बात होते ही राहु केतु का स्मरण होने लगता है, और इन्हें सर्प सदृश मानकर अपने भीतर खतरे की घंटी बजती सुनाई देने लगती है| ग्रहण से नहीं बल्कि सांप सी विचारों की वजह से बीमार हो जाते हैं या मृत्युपाश में चले जाते हैं| इससे भयभीत मत होइए| यह एक खगोलीय घटना है, इसे सम्पूर्णता और समग्रता में समझने का स्वयं ही प्रयास कीजिये|

दान दीजिये|सूर्य उपासना कीजिये|

आदित्य ह्रदय स्तोत्र  का पाठ कीजिये|

(लेखिका ज्योतिषी, योग और अध्यात्मिक चिंतक हैं)

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