लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान फिलिस्तीनी लोगों के समर्थन में और इज़रायली हिटलरवाद के खिलाफ 

नई दिल्ली। लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान ने इज़रायली सरकार की हिटलर जैसी क्रूरता की कड़ी निंदा करते हुए एक बयान जारी किया है और निर्दोष फिलिस्तीनी लोगों के नरसंहार के दोषी इज़रायली शासकों को दंडित करने के लिए एक बड़े पैमाने पर वैश्विक जनमत अभियान में अपनी भागीदारी का संकल्प लिया है।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि इज़रायल की स्थापना विश्व के आधिपत्यवादी राष्ट्रों की औपनिवेशिक साजिश थी। हर कदम पर फिलिस्तीनी लोगों के साथ अन्याय हुआ। हिटलर द्वारा प्रताड़ित यहूदियों को जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों में जहां वे सदियों से रह रहे थे वहीं बसाने के बजाय फिलिस्तीन ले जाना एक घोर अन्याय था। बाद में, शुद्ध दादागिरी से, अमेरिका और उसके साथियों ने फिलिस्तीन को दो हिस्सों में बाँट दिया  दिया और पुराने निवासियों को केवल दो अलग-अलग क्षेत्रों, वेस्ट बैंक और गाज़ा पट्टी तक सीमित कर -दिया। जैसे यह काफ़ी नहीं था,  इज़रायल ने अमेरिका और यूरोप द्वारा संरक्षित आक्रामक विस्तारवाद के माध्यम से फिलिस्तीन के निर्दिष्ट क्षेत्र को अपना उपनिवेश बना लिया है। पश्चिमी तट पर यहूदियों की अवैध बस्तियाँ भी बसाई जा रही हैं। अब वह पूरे क्षेत्र से मूल फिलिस्तीनियों को दूसरे अरब देशों में खदेड़ने की कोशिश कर रहा है। इस प्रक्रिया में गाज़ा पट्टी में 50,000 से ज़्यादा फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा वे हैं जो अपनी भूख मिटाने के लिए भोजन जुटाने की कोशिश कर रहे थे। गाज़ा एक मानवीय त्रासदी बन गया है।
यह एक दुखद विडंबना है कि नाजी क्रूरताओं और अभूतपूर्व नरसंहार के शिकार लोगों के लिए बनाए गए राष्ट्र का शासक फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ़ वैसा ही नरसंहार करने की योजना बना रहा है, जैसा हिटलर और उसके समर्थकों ने यहूदियों के ख़िलाफ़ किया था। इज़रायल सरकार के समर्थकों में फिलिस्तीनियों के लिए वैसी ही नफ़रत है जैसी हिटलर द्वारा यहूदियों के खिलाफ़ की गई कार्रवाई में स्पष्ट थी, जिसके कारण नरसंहार हुआ। अपने इतिहास को देखते हुए, इज़रायल को सभी मनुष्यों के प्रति अदम्य सद्भावना का प्रदर्शन करना चाहिए था। इसके बजाय, नस्लीय वर्चस्ववाद और उत्पीड़न का पागलपन बढ़ता गया। इतिहास का सत्य विश्व मानवता के लिए चेतावनी है, तथा युग के इस अपरिहार्य कर्तव्य का मार्गदर्शक है कि जातीय सद्भाव का एक अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक एवं सांस्कृतिक अभियान भी निरंतर चलाना होगा।
हाल ही में भारत सरकार को संयुक्त राष्ट्र में इज़रायल सरकार के साथ युद्ध विराम प्रस्ताव का स्पष्ट समर्थन करना चाहिए था। इसके बजाय, भारतीय प्रतिनिधि ने इससे परहेज किया, तथा एक तरह से चल रहे नरसंहार का समर्थन किया। युद्ध के बारे में मोदी का दृष्टिकोण अमेरिकापरस्त होने का हास्यास्पद उदाहरण बन गया है। एक ओर मोदी सरकार ट्रम्प के दबाव में भारतीय संप्रभुता की विरासत को तोड़कर पाकिस्तान के साथ युद्ध विराम पर सहमत हो जाती है, तथा दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र के युद्ध विराम प्रस्ताव को अस्वीकार करके भारत फासीवादी युद्धोन्मादी इज़रायल के साथ खड़ा हो जाता है। भारत सरकार में 150 से अधिक युद्ध विरोधी देशों के साथ रहने का साहस भी नहीं था। मोदी सरकार की भूमिका निंदनीय एवं शर्मनाक है, तथा इसने भारत की युद्ध विरोधी मानवतावादी विदेश नीति की गौरवशाली विरासत को कलंकित किया है। इज़राइल और उसके मित्र अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण करने की मोदी की नीति ने दुनिया के देशों में भारत के प्रति सम्मान को चकनाचूर कर दिया है। मोदी सरकार और उसके विदेश मंत्रालय को विश्व मानवता के लिए विनाशकारी और भारत के लिए अपमानजनक इस रवैये को तुरंत बदलना चाहिए। उन्हें गोलीबारी और भूख से निहत्थे फिलिस्तीनी लोगों, निर्दोष महिलाओं और बच्चों की हत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग करनी चाहिए।
आज कई देश वर्षों से हमले और जवाबी हमले में लगे हुए हैं। कुछ दिनों पहले इज़रायल सरकार ने ईरान पर भी हमला किया था। यह ध्यान देने योग्य है कि वर्तमान में अधिकांश युद्ध एशिया की धरती पर लड़े जा रहे हैं और इन सशस्त्र विनाशों के संचालक, संरक्षक और वास्तविक हितधारक हथियार निर्माण कंपनियों द्वारा समर्थित अमेरिका  औ  र कुछ पुराने औपनिवेशिक यूरोपीय देश हैं। अधिकांश अरब देशों के लोग इज़रायल के खिलाफ हैं, लेकिन अमेरिका ने इन देशों में लोकतंत्र को पनपने नहीं दिया है। इन अरब देशों के तानाशाह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इज़रायल और अमेरिका की मदद कर रहे हैं। जबकि इज़रायल के समझदार तत्वों सहित पूरी दुनिया के अधिकांश लोग फिलिस्तीनियों पर हो रहे अत्याचारों से नाखुश हैं।
संयुक्त राष्ट्र की जो व्यवस्था शुरू से ही कमजोर थी, वह तानाशाहों और माफिया राष्ट्रों की बेशर्म मनमानी के कारण अब प्रतीकात्मक भूमिका में सिमट कर रह गई है। अब अपनी संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय न्याय के प्रति सजग राष्ट्रीय नेताओं और विश्व नागरिकों को एक नए और अधिक सक्षम अंतरराष्ट्रीय संघ के निर्माण के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने की दिशा में काम करना होगा।
लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान और अन्य मित्र संगठन फिलिस्तीन और ईरान के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं और गाज़ा में जनसंहार और ईरान पर हमले को तत्काल रोकने की मांग करते हैं।
(इन समूहों का प्रतिनिधिमंडल इन देशों के दूतावासों का भी दौरा करेगा और औपचारिक रूप से अपनी एकजुटता व्यक्त करेगा)

  • शशि शेखर सिंह, सह संयोजक, लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान
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