नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि कानून के दायरे में आए बच्चों की न सिर्फ बात सुनी जानी चाहिए, बल्कि उसे समझा भी जाना चाहिए, क्योंकि बहुत कम युवा पुलिस या किसी अधिकारी के सामने अपनी बात रख पाते हैं। जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) एक्ट बनने के 10 साल पूरे होने पर बोलते हुए, कांत ने कहा कि अक्सर, कानून के दायरे में आया बच्चा, कुछ समय पहले तक देखभाल और सुरक्षा की जरूरत वाला बच्चा होता है, जिस तक हम समय पर नहीं पहुँच पाते; और उनसे निपटने के दौरान यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए।
सुधार होना चाहिए न की सजा
उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में हमारा जवाब सुधार है, न कि सजा। यह एक्ट मानता है कि 18 साल से कम उम्र का कोई भी व्यक्ति किसी आपराधिक इरादे से काम नहीं करता; यह संस्थागत देखभाल को आखिरी विकल्प मानता है, औपचारिक कार्यवाही से अलग रास्ते अपनाने को बढ़ावा देता है, और जेल में रखने के बजाय काउंसलिंग, कम्युनिटी सर्विस और प्रोबेशन को प्राथमिकता देता है, साथ ही एक नई शुरुआत का वादा करता है।
ये विकल्प संविधान की उस सोच से आते हैं जो आर्टिकल 15(3) और 39 में दिखती है, और साथ ही बच्चों के अधिकारों पर कन्वेंशन’ से भी, जो युवाओं को समाज में रचनात्मक भूमिका निभाते हुए देखना चाहता है। इस तरह, 2015 का एक्ट यह उम्मीद करता है कि जिस बच्चे को दूसरा मौका दिया जाता है। उसके अपराधी का ठप्पा लगने वाले बच्चे की तुलना में समाज का एक उपयोगी सदस्य बनने की संभावना कहीं ज़्यादा होती है।
बच्चों की चिंताओं को समझें: जस्टिस नागरत्ना
सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जो SC की जुवेनाइल जस्टिस कमेटी की प्रमुख हैं, ने कहा कि बड़ों का यह फर्ज है कि वे बच्चों की चिंताओं को समझें। नागरत्ना ने कहा कि हम उनकी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते, वरना उन्हें अलग-थलग और ठुकराया हुआ महसूस हो सकता है।
किसी समाज और उसके बड़ों की असली पहचान इस बात से होती है कि वे अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। हमें यह पक्का करना होगा कि हम इस मामले में नाकाम न हों। सभी बच्चे हमारे हैं और उनकी परेशानी हमारी भी परेशानी है।







