प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 फरवरी 2026 को इजरायली संसद (नेसेट) को ऐतिहासिक संबोधन दिया। यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री का नेसेट में पहला भाषण था। इजरायली सांसदों ने खड़े होकर तालियां बजाईं और “मोदी-मोदी” के नारे लगाए। लेकिन मुस्लिम देशों की मीडिया (खासकर पाकिस्तान, तुर्की, कतर की अल जजीरा, मिडिल ईस्ट आई आदि) में इस भाषण से काफी नाराजगी दिखी।
मोदी के भाषण की मुख्य बातें
7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले को “बार्बरिक आतंकवादी हमला” बताया और कहा — “हम आपका दर्द महसूस करते हैं, हम आपका दुख साझा करते हैं। भारत इस पल में और आगे भी इजरायल के साथ पूर्ण विश्वास के साथ खड़ा है।”
“कोई भी कारण नागरिकों की हत्या को जस्टिफाई नहीं कर सकता। आतंकवाद को कुछ भी जस्टिफाई नहीं कर सकता”, भारत की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी का जिक्र किया और 26/11 मुंबई हमलों (जिसमें इजरायली नागरिक भी मारे गए) का उदाहरण दिया।
गाजा शांति पहल का समर्थन किया, अब्राहम समझौतों की तारीफ की और I2U2, IMEC जैसे प्लेटफॉर्म्स से क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया। आतंकवाद को दोनों देशों की साझा चुनौती बताया।
मुस्लिम देशों की मीडिया क्यों चिढ़ी?
मुस्लिम देशों (खासकर प्रो-फिलिस्तीन मीडिया) ने इसे “एकतरफा” और “भारत की पारंपरिक फिलिस्तीन समर्थक नीति से दूरी” के रूप में देखा। मुख्य कारण:गाजा का जिक्र गायब — मोदी जी ने हमास के हमले और इजरायली पीड़ितों पर खूब जोर दिया, लेकिन गाजा में हजारों फिलिस्तीनी नागरिकों की मौत (मुस्लिम मीडिया के अनुसार 70,000+), मानवीय संकट या इजरायली कार्रवाइयों की कोई आलोचना नहीं की। अल जजीरा और TRT World ने लिखा — “मोदी ने इजरायल का दर्द साझा किया लेकिन गाजा के दर्द को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।”
इजरायल की तरफ साफ झुकाव — इसे “हिंदुत्व और जियोनिज्म का वैचारिक गठबंधन” बताया गया। मिडिल ईस्ट आई और पलेस्टाइन क्रॉनिकल ने कहा कि मोदी का भाषण इजरायल को “अकेला नहीं होने” का संदेश दे रहा है, जबकि ICC में नेतन्याहू पर वारंट है।
नेतन्याहू का बयान भी आग में घी — दौरा शुरू होने से पहले नेतन्याहू ने “कट्टर शिया और सुन्नी एक्सिस” को खतरा बताते हुए भारत, ग्रीस, साइप्रस आदि के साथ “हेक्सागन एलायंस” बनाने की बात कही। पाकिस्तानी मीडिया ने इसे “मुस्लिम उम्माह के खिलाफ साजिश” करार दिया। पाकिस्तान की सीनेट ने 24 फरवरी को इसके खिलाफ प्रस्ताव पास कर दिया।
पाकिस्तान की खास बौखलाहट — डॉन, जियो न्यूज आदि ने इसे “पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी” बताया। उन्होंने याद दिलाया कि इजरायल पहले भी पाकिस्तान के खिलाफ ड्रोन टेक्नोलॉजी दे चुका है।
“कोई भी कारण नागरिकों की हत्या को जस्टिफाई नहीं कर सकता। आतंकवाद को कुछ भी जस्टिफाई नहीं कर सकता”, भारत की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी का जिक्र किया और 26/11 मुंबई हमलों (जिसमें इजरायली नागरिक भी मारे गए) का उदाहरण दिया।
गाजा शांति पहल का समर्थन किया, अब्राहम समझौतों की तारीफ की और I2U2, IMEC जैसे प्लेटफॉर्म्स से क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया। आतंकवाद को दोनों देशों की साझा चुनौती बताया।
मुस्लिम देशों की मीडिया क्यों चिढ़ी?
मुस्लिम देशों (खासकर प्रो-फिलिस्तीन मीडिया) ने इसे “एकतरफा” और “भारत की पारंपरिक फिलिस्तीन समर्थक नीति से दूरी” के रूप में देखा। मुख्य कारण:गाजा का जिक्र गायब — मोदी जी ने हमास के हमले और इजरायली पीड़ितों पर खूब जोर दिया, लेकिन गाजा में हजारों फिलिस्तीनी नागरिकों की मौत (मुस्लिम मीडिया के अनुसार 70,000+), मानवीय संकट या इजरायली कार्रवाइयों की कोई आलोचना नहीं की। अल जजीरा और TRT World ने लिखा — “मोदी ने इजरायल का दर्द साझा किया लेकिन गाजा के दर्द को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।”
इजरायल की तरफ साफ झुकाव — इसे “हिंदुत्व और जियोनिज्म का वैचारिक गठबंधन” बताया गया। मिडिल ईस्ट आई और पलेस्टाइन क्रॉनिकल ने कहा कि मोदी का भाषण इजरायल को “अकेला नहीं होने” का संदेश दे रहा है, जबकि ICC में नेतन्याहू पर वारंट है।
नेतन्याहू का बयान भी आग में घी — दौरा शुरू होने से पहले नेतन्याहू ने “कट्टर शिया और सुन्नी एक्सिस” को खतरा बताते हुए भारत, ग्रीस, साइप्रस आदि के साथ “हेक्सागन एलायंस” बनाने की बात कही। पाकिस्तानी मीडिया ने इसे “मुस्लिम उम्माह के खिलाफ साजिश” करार दिया। पाकिस्तान की सीनेट ने 24 फरवरी को इसके खिलाफ प्रस्ताव पास कर दिया।
पाकिस्तान की खास बौखलाहट — डॉन, जियो न्यूज आदि ने इसे “पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी” बताया। उन्होंने याद दिलाया कि इजरायल पहले भी पाकिस्तान के खिलाफ ड्रोन टेक्नोलॉजी दे चुका है।






