आखिर क्यों बलूचिस्तान को नहीं छोड़ना चाहता पाकिस्तान?

पाकिस्तान के सबसे अशांत और आर्थिक रूप से समृद्ध माने जाने वाले प्रांत बलूचिस्तान को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया पर इसके स्वतंत्र देश यानी रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान होने के दावे किए जा रहे हैं. वायरल हो रहीं पोस्ट बताती हैं कि स्थानीय बलूची ताकतों ने इस विशाल भू-भाग के करीब 85 फीसदी इलाके पर अपना कब्जा जमा लिया है और जल्द ही वे अपनी अलग करेंसी और प्रशासनिक व्यवस्था भी शुरू कर रहे हैं. इस भयंकर उथल-पुथल के बीच सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर पाकिस्तान इसे छोड़ना क्यों नहीं चाहता है.

 

क्षेत्रफल के लिहाज के पाकिस्तान की रीढ़ है बलूचिस्तान

 

भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक जमीन का टुकड़ा मात्र नहीं, बल्कि उसकी पहचान का सबसे बड़ा हिस्सा है. यह प्रांत अकेले पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का लगभग 44 से 46 प्रतिशत हिस्सा घेरता है. अगर बलूचिस्तान पाकिस्तान के नक्शे से अलग हो जाता है तो पाकिस्तान का भू-राजनैतिक कद और भौगोलिक आकार घटकर लगभग आधा रह जाएगा. इसीलिए पाकिस्तान इस विशाल इलाके पर अपनी मजबूत पकड़ को कभी ढीली नहीं करना चाहती.

 

कोयला और गैस खदानों का अकूत खजाना

 

आर्थिक रूप से कंगाल होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान उसके संसाधनों की सबसे बड़ी तिजोरी है. इस क्षेत्र में 10 से ज्यादा बड़े प्राकृतिक गैस फील्ड्स मौजूद हैं, जो पूरे पाकिस्तान की 40 फीसदी से ज्यादा गैस की जरूरतों को अकेले पूरा करते हैं. इसके अलावा यहां 1200 से ज्यादा कोयला खदानें हैं. साथ ही तांबा, यूरेनियम और सोने के भी विशाल भंडार मौजूद हैं, जिनमें रेको डिक जैसी दुनिया की सबसे बड़ी सोने की खदान परियोजनाएं शामिल हैं.

 

 

ग्वादर बंदरगाह और तीन देशों की सीमाओं का जाल

 

सामरिक और रणनीतिक लिहाज से बलूचिस्तान की स्थिति दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों पर है. इसकी सीमाएं एक तरफ ईरान और दूसरी तरफ अफगानिस्तान से लगती हैं, जबकि इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा अरब सागर के लंबे तट से जुड़ा हुआ है. इस सूबे के दक्षिण-पश्चिम में स्थित ग्वादर बंदरगाह पाकिस्तान को फारस की खाड़ी और मिडिल ईस्ट के देशों तक सीधी व्यापारिक पहुंच देता है. इस समुद्री रास्ते के बिना पाकिस्तान वैश्विक व्यापार में पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जाएगा.

 

सीपेक कॉरिडोर और चीनी निवेश की सुरक्षा

 

चीन का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा CPEC पूरी तरह से बलूचिस्तान की धरती पर ही टिका हुआ है. इस 62 अरब डॉलर से अधिक की परियोजना के लिए चीन बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट को अपने शिनजियांग प्रांत से सीधे जोड़ रहा है. पाकिस्तान को उम्मीद है कि इस कॉरिडोर से उसका आर्थिक भविष्य सुधर जाएगा. चूंकि चीन का इस क्षेत्र में भारी निवेश है, इसलिए पाकिस्तान पर बीजिंग का भी यह भारी दबाव है कि वह बलूचिस्तान को अपने नियंत्रण में रखे.

 

सैन्य परमाणु ठिकानों का गढ़

 

सुरक्षा और सैन्य ताकत के मामले में भी बलूचिस्तान पाकिस्तान की सबसे सुरक्षित ढाल रहा है. पाकिस्तान के कई महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डे इसी प्रांत के तटीय इलाकों में बनाए गए हैं. सबसे खास बात यह है साल 1998 में पाकिस्तान ने दुनिया को अपनी परमाणु ताकत का अहसास कराने के लिए जो परमाणु परीक्षण किए थे, वे बलूचिस्तान की चगाई पहाड़ियों में ही किए गए थे. अपने सबसे बड़े सैन्य और परमाणु ठिकानों वाले इस प्रांत को खोना पाकिस्तान कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता है.

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