UNCLOS: समंदर में चौड़ा हो रहा चीन भारत की एक चाल से हुआ चित, तिलमिलाकर रह गया बीजिंग

नई दिल्ली: भारत ने समंदर में दबदबा बढ़ा रहे चीन की चाल को मात दे दी है। भारत ने इस मामले में बड़ा दांव चलते हुए दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर अपना रुख फिर से दोहरा दिया है। भारत ने आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के फैसले का समर्थन करते हुए ‘समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCLOS)’ के मुताबिक मुक्त और खुले समुद्र की वकालत की है। भारत की यह बात चीन को चुभ सकती है, जो भारत को अपने दांव से अक्सर घेरने की कोशिश करता रहता है। तिलमिलाए चीन ने हालांकि साउथ चाइना सी मामले में समर्थन करने वाले यूरोपीय देशों को लगे हाथ नसीहत भी दे डाली है।

UNCLOS: भारत के विदेश मंत्रालय कह दी ये बात

 

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत समुद्र में आने-जाने और ऊपर से उड़ान भरने की आजादी, समुद्र के दूसरे कानूनी इस्तेमाल और बिना रुकावट व्यापार को बनाए रखने पर जोर देता रहा है। ये सभी बातें ‘ संयुक्त राष्ट्र समुद्री सीमा समझौते (UNCLOS)’ के मुताबिक होनी चाहिए।

14 देशों और यूरोपीय संघ के एक संयुक्त बयान पर मीडिया के सवाल का जवाब देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने यह बात कही। इस संयुक्त बयान में कहा गया था कि साउथ चाइना सी में चीन के बड़े-बड़े दावों का कोई कानूनी आधार नहीं है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘जहां तक भारत की बात है, दक्षिण चीन सागर से जुड़े मुद्दे पर हमारा रुख स्पष्ट और सर्वविदित है। हम UNCLOS में निहित अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार नेविगेशन और ओवरफ्लाइट की स्वतंत्रता, समुद्र के अन्य वैध उपयोग और निर्बाध व्यापार को बनाए रखने के महत्व पर जोर देते हैं। यह हमेशा से हमारा सुसंगत रुख रहा है।’
 

अमेरिका-जापान-फिलीपींस के साझा बयान में चीन के दावे खारिज

 

जापान, फिलीपींस समेत 14 देशों और यूरोपीय संघ का यह संयुक्त बयान 2016 में फिलीपींस के पक्ष में आए एक अहम अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के फैसले की 10वीं वर्षगांठ पर जारी किया गया था। उस फैसले में दक्षिण चीन सागर पर चीन के व्यापक संप्रभुता के दावे को खारिज कर दिया गया था। बीजिंग ने उस फैसले को कभी स्वीकार नहीं किया।

 

 

तिलमिलाया चीन, बोला-अपना समर्थन बंद करें

 

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने मंगलवार को कहा कि चीन ने कुछ यूरोपीय देशों से समझदारी से काम लेने और गैर-कानूनी ‘साउथ चाइना सी आर्बिट्रेशन अवार्ड’ का समर्थन बंद करने को कहा है, ताकि चीन के साथ उनके रिश्ते और सहयोग पर बुरा असर न पड़े।
हाल ही में, कई यूरोपीय देशों ने अमेरिका और फिलीपींस के साथ मिलकर इस तथाकथित फैसले के 10 साल बाद एक संयुक्त बयान जारी किया और यूरोपीय संघ ने भी एक अलग बयान जारी किया।

 

 

 

क्या है UNCLOS, जिसे कहा जाता है महासागरों का संविधान

 

 

UNCLOS एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय संधि है जो दुनिया के महासागरों और समुद्रों के इस्तेमाल के लिए कानूनी ढांचा तय करती है।
इसे अक्सर ‘महासागरों का संविधान’ कहा जाता है क्योंकि यह समुद्री इलाकों में देशों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को तय करती है। 1982 में जमैका के मोंटेगो बे में इसे अपनाया गया। पर्याप्त संख्या में देशों द्वारा मंजूरी मिलने के बाद 1994 में यह लागू हुआ।

हम UNCLOS में निहित अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार नेविगेशन और ओवरफ्लाइट की स्वतंत्रता, समुद्र के अन्य वैध उपयोग और निर्बाध व्यापार को बनाए रखने के महत्व पर जोर देते हैं। यह हमेशा से हमारा सुसंगत रुख रहा है।
भारतीय विदेश मंत्रालय

 

 

 

UNCLOS में कौन-कौन है शामिल

 

 

यूरोपीय संघ सहित 168 देश या संगठन इसमें शामिल हैं। भारत जैसी प्रमुख समुद्री शक्तियां इसकी सदस्य हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका ने इस संधि पर हस्ताक्षर तो किए हैं, लेकिन इसे अभी तक मंजूरी नहीं दी है। UNCLOS का मकसद महासागरों का शांतिपूर्ण इस्तेमाल, समुद्री संसाधनों का उचित इस्तेमाल, समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा और समुद्री सीमाओं का नियमन सुनिश्चित करना।

 

 

UNCLOS का कामकाज क्या है

 

 

UNCLOS का कामकाज समुद्री क्षेत्रों को तय करना: टेरिटोरियल सी (क्षेत्रीय समुद्र), कॉन्टिग्युअस जोन, एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) और हाई सीज (खुले समुद्र) जैसे कानूनी क्षेत्र तय करता है।
नेविगेशन के अधिकार: जहाजों के लिए क्षेत्रीय जल में नेविगेशन और ‘इनोसेंट पैसेज’ (बिना किसी नुकसान के गुजरने) की आज़ादी की गारंटी देता है।
संसाधन प्रबंधन: मछली पकड़ने, तेल और खनिजों जैसे समुद्री संसाधनों की खोज और उनके इस्तेमाल को नियंत्रित करता है।
समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा: प्रदूषण को रोकने और समुद्री जैव-विविधता की रक्षा के लिए कानूनी प्रावधान करता है।
विवादों का निपटारा: समुद्री विवादों को सुलझाने के लिए ‘इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल फॉर द लॉ ऑफ द सी’ (ITLOS) जैसे सिस्टम बनाता है।
समुद्री तल (सी-बेड) का प्रबंधन: राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर के इलाकों में खनिज संसाधनों को नियंत्रित करने के लिए ‘इंटरनेशनल सी-बेड अथॉरिटी’ (ISA) बनाता है।

 

 

अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र का क्या हैं मतलब, जानिए जवाब

 

 

अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र को खुला समुद्र भी कहा जाता है, किसी भी तटीय देश के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (200 समुद्री मील) से परे महासागर के क्षेत्र हैं।
अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नौकायन की आजादी होती है। किसी भी देश के जहाज बिना किसी रोक-टोक के स्वतंत्र रूप से यात्रा कर सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ऊपर से उड़ान की स्वतंत्रता होती है।
संयुक्त राष्ट्र समुद्री सीमा समझौते (UNCLOS) के अनुच्छेद 88 के तहत खुले समुद्र को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए आरक्षित रखा जाना चाहिए।
कोई भी देश अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र पर संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता। अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सैन्य कार्रवाई आम तौर पर प्रतिबंधित है, जब तक कि आत्मरक्षा या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति न हो। साझा विरासत का सिद्धांत: राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे समुद्र तल में मौजूद संसाधनों को मानव जाति की साझा विरासत माना जाता है।

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