बिहार-यूपी के लोगों से केजरीवाल को इतनी नफरत क्यों?

 हर बार अरविंद के निशाने पर होते हैं दिल्ली में बसे पूर्वांचली!

दीपक कुमार तिवारी

पटना/नई दिल्ली। दिल्ली में दावे अपनी कामयाबी के सभी कर रहे हैं, पर निश्चिंतता का भाव किसी के चेहरे पर नहीं। आरोप-प्रत्यारोप ऐसे कि गुरुवार को चुनाव आयोग को चेतावनी जारी करनी पड़ी। महिलाओं पर टिप्पणी को लेकर आयोग ने सबको सावधानी बरतने की सलाह दी है। तनाव और चिंता का आलम यह है कि अरविंद केजरीवाल भाजपा नेता प्रवेश वर्मा के घर छापेमारी का आवेदन लेकर आयोग पहुंच जाते हैं तो भाजपा के लिए बिहार-यूपी का जिक्र केजरीवाल की जुबान पर आना ही केजरीवाल की बेचौनी बताने के लिए काफी है। हालांकि उनकी जुबान से पहली बार बिहार-यूपी को केंद्र कर प्रतिकूल प्रभाव वाली टिप्पणी नहीं निकलती है। इससे पहले 2019 में भी केजरीवाल ने कुछ ऐसा कह दिया था, जिससे काफी बवेला मचा था।
यह कम से कम दूसरा मौका है, जब बिहार-यूपी का नाम केजरीवाल की जुबान पर आया है। पहली बार उन्होंने दिल्ली कहा था कि बिहार जैसे राज्यों से लोग 500 रुपये का टिकट लेकर दिल्ली आ जा रहे हैं और 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज कराते हैं। उनके इस बयान पर भाजपा और जेडीयू ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की थी।
इतना ही नहीं, केजरीवाल ने इससे पहले यह भी कहा था कि अगर दिल्ली में एनआरसी लागू हुआ तो सबसे पहले दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी को शहर छोड़ना पड़ेगा। केजरीवाल अब कह रहे हैं कि भाजपा बिहार-यूपी से लोगों को दिल्ली लाकर वोटर बनवा रही है। पहली बार में जरूरतवश दिल्ली जाने वाले लोगों की समझ में यह बात नहीं आएगी। पर, जब वे समझेंगे तो केजरीवाल के बारे में उनकी क्या धारणा बनेगी। आमतौर पर भाजपा विरोधी पार्टियां चुनाव हारने पर ईवीएम को दोष देकर फेस सेव करती थीं, अरविंद केजरीवाल तो वे सारे दोष पहले ही गिना दे रहे हैं, जो ईवीएम के दोष बताने से भी ज्यादा प्रभावी हो सकते हैं।
भाजपा में भी वैसी ही बौखलाहट में दिख रही है। केजरीवाल और छोटे-छोटे मुद्दों पर ऐसे उलझ रही है, जैसे उसके पास बड़ा मुद्दा ही नहीं है। यानी भाजपा भी अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त नहीं है। भाजपा के पास घोषित सीएम फेस नहीं है। भाजपा लगातार 10 साल से सत्ता से बाहर है। इसलिए उसके पास बताने के लिए केंद्र की उपलब्धियों के अलावा अपना कुछ है ही नहीं। अब तक का अनुभव यही कहता है कि नरेंद्र मोदी का जादू सिर्फ संसदीय चुनाव तक ही सीमित रहता है। विधानसभा चुनाव में परिदृश्य पूरी तरह बदल जाता है।
यानी लड़ाई किसी के लिए आसान नहीं दिखती। लगातार 10 साल के अपने कामकाज से केजरीवाल को निश्चिंत रहना चाहिए, पर उनकी बेचैनी बताती है कि उन्हें भी अपनी सफलता की गारंटी नहीं दिखती। जुबान फिसलना सामान्य बात है। पर, फिसलन का पता चलते ही क्षमा याचना का प्रावधान भी तो है। केजरीवाल यह भी नहीं करते। ऐसे में पूर्वांचली इस बार सच में बिदक जाएं तो केजरीवाल को संभालना मुश्किल हो जाएगा। शायद उन्हें इसका अनुमान है। इसलिए वे नए वोटर के लिए बिहार-यूपी से लाए गए लोगों की बात कह रहे हैं। पूर्वांचली लोगों से उनके भय का यह संकेत भी हो सकता है।
दिल्ली में बसे पूर्वांचल के लोग तकरीबन दो दर्जन सीटों पर अपना प्रभाव रखते हैं। यही वजह है कि बिहार मूल की राजनीतिक पार्टियां भी दिल्ली चुनाव में ताल ठोंकने के लिए बेचौन दिखती हैं। जेडीयू और आरजेडी के अलावा एलजेपी भी पिछले चुनावों में किस्मत आजमा चुकी हैं। इस बार भी तीनों पार्टियों ने चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने तो बाजाप्ता प्रेस कांफ्रेंस कर दिल्ली में एनडीए के बैनर तले चुनाव लड़ने की बात कुछ ही दिनों पहले कही थी।

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