सबको सुख ही क्यों चाहिए दुख क्यों नहीं?

ऊषा शुक्ला

मनुष्य के जीवन में सुख और दुःख जैसी चीज़ें कभी भी नहीं आती हैं। सबको सुख ही क्यों चाहिए दुख क्यों नहीं चाहिए । हमारे जीवन में सुख या दुःख का आना कोई पाप या पुण्य नहीं है यह केवल मात्र हमारे मन का सुकून है। जब हम सिर्फ़ अपने बारे में सोचते हैं तो हम दुखी होते हैं पर जब हम दूसरों के बारे में सोचते हैं तब हम ख़ुश होते हैं । स्वार्थी लोग दुखी ज़्यादा होते हैं जबकि जो दूसरों के बारे में सोचते हैं वो दुखी कम होते हैं । मनुष्य के दुख के लिए केवल वह स्वयं जिम्मेदार है, कोई अन्य नहीं। यद्यपि यह बात सुनकर हमें अच्छा नहीं लगता। क्या हम जानबूझकर दुखी हैं? दूसरों पर दोष लगाकर हमें राहत मिलती है कि मेरे दुखों के लिए कोई और उत्तरदाई है। लेकिन स्मरण रखिए, अगर दूसरा जिम्मेवार है, इसका नियंत्रक है तो फिर मेरी स्वतंत्रता भी नहीं है कि मैं इस दुख से मुक्त हो सकूं। अगर मैं स्वयं उत्तरदाई हूं तभी मुझे स्वतंत्रता की संभावना है कि मैं चाहूं तो इस मानसिक कारागृह के बाहर निकल आऊं। आज से ढाई हजार साल पहले भगवान बुद्ध और महावीर ने भी ऐसा ही संदेश दिया था। अपनी जिम्मेदारी पहचानो, दुख के कारण बाहर परिस्थिति में नहीं, किंतु भीतर तुम्हारी मनस्थिति में हैं। इस मन को बदलना, रूपांतरित करना हमारे हाथ में है।सुख और दुःख का अनुभव करना सिर्फ उसकी अज्ञानता है। किसी परिस्थिति में मनुष्य को सुख का अनुभव होता है और किसी में दुःख का. लेकिन यह नासमझी है. कुछ भी स्थायी नहीं है. यदि आज सुख है तो यह सुख कल चला जाएगा। यदि आज दुःख है, तो यह दुःख कल चला जाएगा. तो ऐसे सुख में क्या सुखी होना और ऐसे दुःख में क्या दुखी होना जो कल रहेगा ही नहीं.. मनुष्य जाति का इतिहास उठाकर देखिए, कितने प्रकार की क्रांतियां हो चुकीं, कितनी बार सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक उलट-पुलट हो चुकी हैं, किंतु आदमी का दुख नहीं मिटा सो नहीं मिटा। आधुनिक विज्ञान ने सुख-सुविधाएं जुटा दीं, उम्र को लंबा कर दिया, बेहतर स्वास्थ्य प्रदान कर दिया। शिक्षा प्रणाली ने हमें सुशिक्षित कर दिया, सभ्यता और संस्कृति का विकास निरंतर होता जा रहा है, संपन्नता बढ़ती जा रही है, मगर हमारा विषाद कम नहीं हो रहा। उल्टे, बढ़ता ही जा रहा है। जितने विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ रही है, उतने ही पागलखानों और कारागृहों की गिनती, आतंकवादी घटनाओं और दुर्घटनाओं व युद्धों में मारे जाने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। आज से सौ वर्ष पूर्व डिप्रैशन और ड्रग एडिक्शन के, यदा-कदा लोग शिकार होते थे, आज यह महामारी सर्वत्र व्याप्त हो गई है। इसीलिए कहा गया है कि जो मनुष्य सुख में बहुत खुश नहीं होता और दुःख में उदास नहीं होता, वही देवताओं को प्रिय होता है, और बस वही जीवन का रहस्य जानता है । इसलिए जब शरीर में मन, नेत्र, श्रोत और आत्मा आहत होते हैं तो दुख का एहसास होता है । मन किसी चीज़ की जिज्ञासा करता है और वो चीज़ पूर्ण नहीं होती है तो मन को दुख का एहसास हो जाता है । जब मन दुखी होता है तो शरीर दुखी हो जाता है । शरीर दुखी होता है तो हमारी चेतना दुखी होती है, और चेतना का संबंध अन्तःकरण के साथ होता है ।मनुष्य के जीवन में इतना दुख क्यों है? यदि केवल दो-चार प्रतिशत लोगों के जीवन तनावग्रस्त होते तो हम समझते कि उनके मन में किसी प्रकार की बीमारी है। उन्हें मनोचिकित्सा की आवश्यकता है। लेकिन जब पृथ्वी पर निवास करने वाले आठ अरब इंसान, सब के सब व्यथित एवं परेशान हैं तो हमें ख्याल ही नहीं आता कि यह हमारा मनोरोग है। चारों तरफ हमारे जैसे ही चिंताग्रस्त, उदास, क्रोधी, ईर्ष्यालु लोग रहते हैं इसलिए हमें शक नहीं होता कि हमारा या उनका दिमाग गड़बड़ है। पागलखाने के भीतर बंद लोगों को कभी पता नहीं चलता कि वे विक्षिप्त हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति संपूर्ण मनुष्य जाति की है।अपनी दुर्दशा के लिए अक्सर हम दोष देते हैं भाग्य को, किस्मत को, हस्तरेखाओं को, पिछले जन्मों के कर्मों को, जीवन में मिली परिस्थितियों तथा व्यक्तियों को। ज्योतिषी बताते हैं कि आप के ग्रह-नक्षत्र ठीक नहीं चल रहे हैं। तांत्रिक बताते हैं कि भूत-प्रेत और किसी के द्वारा किए गए जादू-टोना का प्रभाव है। अर्थशास्त्री कहते हैं गरीब-अमीर के वर्गभेद के कारण संताप है। राजनीतिक दृष्टि वाले लोग दोषारोपण करते हैं देश की व्यवस्था संभाल रहे सत्ताधरियों पर। कभी वास्तुदोष, कभी जन्म कुंडली, कभी माता-पिता, कभी गलत पति-पत्नी की जोड़ी जिम्मेदार लगती है। जब कुछ नहीं सूझता तो विदेशी हाथ…! यहां तक कि भगवान को भी दोष ठहरा देते हैं।हमारे भीतर वे कौन-कौन से कारण हैं जिनसे दुख उत्पन्न होता है? एक बार कारण समझ में आ जाएं तो निवारण का उपाय खोजना बहुत आसान है। ठीक निदान, डायग्नोसिस हो जाए, तो इलाज, ट्रीटमेंट खोजना कठिन नहीं है। हम शांति, प्रीति और आनंद में जीना सीख सकते हैं। हमारी नासमझी की वजह से जिंदगी नरक हो गई है। हम सजग और विवेकपूर्ण हो जाएं तो हमारा जीवन स्वर्ग बन सकता है।स्वर्ग एवं नर्क कोई भौगोलिक परिस्थितियां नहीं है जहां मरने के बाद आदमी पहुंचता है, बल्कि स्वर्ग और नर्क हमारी आंतरिक मनस्थितियां है जिनमें हम जीते-जी समय व्यतीत करते हैं। और, पूरी स्वतंत्रता है कि हम चाहें तो नर्क से स्वर्ग में गति कर सकते हैं। कोई भी शक्ति हमें रोक नहीं सकती। अपने भीतर छिपे परमानंद को, शांति, प्रीति, मुक्ति को, सत्यम, शिवम, सुंदरम को हम जान सकते हैं और सच्चिदानंद में जी सकते हैं। प्रत्येक मनुष्य का यह जन्मसिद्ध अधिकार है। बाहर की कोई परिस्थिति इसमें रूकावट या बाधा नहीं बन सकती।

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