गाँव की सूनी चौपाल और मेहमान बनते बेटे

डॉ. सत्यवान सौरभ

“गांव वही है, खेत वही हैं, माटी की महक पुरानी,
पर उसमें अब प्राण नहीं हैं, न वह बात रही कहानी।
बेटे अब अतिथि बने हैं, आते हैं दो दिन के ताज,
गांव बना है वृद्धाश्रम, न कोई मेला, न कोई साज।”**

डॉ. सत्यवान सौरभ की ये कुछ पंक्तियाँ न सिर्फ कविता हैं, बल्कि वे एक चेतावनी हैं, एक सामाजिक रिपोर्ट हैं, और एक अंतर्मंथन का न्यौता भी। ये पंक्तियाँ किसी काल्पनिक पीड़ा का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि भारत के लाखों गाँवों की जमीनी सच्चाई को उजागर करती हैं—जहाँ चूल्हे ठंडे हैं, चौपालें सूनी हैं, और माता-पिता दरवाजे पर टकटकी लगाए बेटों की बाट जोहते रहते हैं।

 

 

गाँव की चौपाल: जो कभी संवाद का केंद्र थी

 

एक समय था जब गांव की चौपाल किसी लोकतांत्रिक संसद से कम नहीं होती थी। वहाँ शाम होते ही बुजुर्ग बैठते, बच्चे खेलते, और जवान अपने अनुभवों को साझा करते। हर निर्णय सामूहिक होता, हर समस्या साझा होती, और हर खुशी पूरे गाँव की होती। मगर अब वही चौपाल खामोश है। न वहाँ बैठने वाले हैं, न सुनने वाले।

शहरों की तरफ रुख करते युवाओं के पीछे जो खालीपन छूटता है, वह सिर्फ भौतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक भी है। चौपाल सिर्फ एक जगह नहीं थी, वह हमारे ग्रामीण समाज का भावनात्मक और बौद्धिक केंद्र थी, जो अब वीरान होती जा रही है।

 

बेटों की “मेहमानगिरी” और माँ-बाप की चुप्पी

 

आजकल बेटों की गाँव में उपस्थिति एक उत्सव जैसी होती है—लेकिन वह उत्सव भी असहज और अल्पकालिक होता है। शहरों में बस चुके बेटे अब गाँव दो दिन के लिए आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, त्योहार मनाते हैं और फिर “बिजी” जिंदगी का हवाला देकर लौट जाते हैं। गाँव उनके लिए “Emotional Weekend Retreat” बन गया है।

लेकिन माँ-बाप के लिए वह दो दिन किसी त्योहार से ज्यादा एक लंबी प्रतीक्षा का अंत होते हैं। उन दो दिनों में वे सारे सपने, शिकायतें, और संजोए हुए पल बेटों की नजरों में भर देना चाहते हैं। पर अक्सर बेटे समय का बहाना बना कर भावनाओं से बचते हैं। नतीजा—दो दिन की खुशी, और बाकी साल की तन्हाई।

 

बुजुर्गों का अकेलापन: एक अदृश्य महामारी

 

भारत सरकार की कोई रिपोर्ट शायद यह नहीं बताएगी कि हमारे गाँवों में बुजुर्ग अकेलेपन के शिकार हैं। लेकिन एक सर्वेक्षणिक दृष्टि से देखें तो पाएँगे कि ग्रामीण क्षेत्रों में वृद्धों के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य की हालत अत्यंत चिंताजनक है।

बुजुर्ग माँ-बाप के लिए न कोई हेल्थकेयर है, न कोई संवाद का साथी। मोबाइल फोन पर एक कॉल ही उनका ‘संपूर्ण सुख’ बन जाता है। बेटे की आवाज़ सुनकर वे ज़िंदा महसूस करते हैं और फ़ोन कटते ही जैसे सन्नाटा फिर से लौट आता है। यह अकेलापन अब सामाजिक महामारी बन गया है, जिसके लिए कोई नीति नहीं, कोई फंड नहीं, और कोई चर्चा नहीं।

 

गाँवों का आर्थिक-सामाजिक ढांचा चरमरा रहा है

 

बेटों के पलायन से गांवों की आर्थिक रीढ़ भी कमजोर हुई है। खेती के लिए अब मज़दूर नहीं मिलते, क्योंकि गाँव में काम करने वाले युवा नहीं हैं। कई गाँवों में तो अब केवल बुजुर्ग और महिलाएँ ही बचे हैं, जो खेती, पशुपालन, और घरेलू कामों को जैसे-तैसे संभाल रहे हैं।
स्थानीय व्यापार, हाट-बाज़ार, और सामाजिक आयोजन लगभग खत्म हो चुके हैं। गांव के त्योहार अब केवल रस्म अदायगी बन गए हैं—जैसे शरीर जीवित हो लेकिन आत्मा कहीं खो गई हो।

 

शहर: क्या यह उम्मीद है या छलावा?

 

शहरों की ओर पलायन को अक्सर ‘प्रगति’ की संज्ञा दी जाती है। पर क्या हर कोई जो गाँव छोड़ शहर गया, वह सफल हुआ? बहुत से लोग शहर में दिहाड़ी मज़दूर बनकर रह गए, झुग्गियों में बसे और दो वक़्त की रोटी के लिए जूझते रहे।

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि शहर बुरा है। प्रश्न यह है कि क्या गाँव में रहकर भी कोई सम्मानजनक जीवन संभव नहीं होना चाहिए? यदि सरकार, समाज और निजी क्षेत्र मिलकर गाँव में ही बेहतर रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराएं तो पलायन की आवश्यकता ही नहीं पड़े।

 

क्या समाधान है? — गाँव को फिर से जीवंत कैसे करें?

 

. स्थानीय रोजगार का सृजन

गाँवों में छोटे उद्योग, हस्तशिल्प, जैविक खेती और स्थानीय पर्यटन जैसी योजनाओं को बढ़ावा देकर रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। इसके लिए पंचायतों और स्वयंसेवी संस्थाओं को सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

2. डिजिटल गाँव की सच्ची परिभाषा

डिजिटल इंडिया का सपना तभी साकार होगा जब इंटरनेट, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल बैंकिंग जैसी सुविधाएँ गाँव तक पहुंचें और गाँव का युवा वैश्विक अवसरों से जुड़ सके।

3. शैक्षिक पाठ्यक्रम में ‘गाँव’ को महत्व

प्राथमिक शिक्षा से ही बच्चों को गाँव के महत्व, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों से जोड़ा जाए। सिर्फ विज्ञान और गणित नहीं, सामाजिक मूल्य भी पढ़ाए जाएँ।

4. सामाजिक सम्मान की पुनर्स्थापना

‘गाँव में रहना’ पिछड़ेपन की निशानी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और प्रकृति से जुड़ाव की पहचान बने—इसके लिए मीडिया, साहित्य और सिनेमा को सकारात्मक भूमिका निभानी होगी।

सिर्फ लौटना नहीं, जुड़ना जरूरी है

गाँवों में जाकर एक बार फोटो खिंचवाना और सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देना “Connect to Roots” नहीं होता। असली जुड़ाव तब होता है जब बेटा माँ-बाप के लिए समय निकालता है, चौपाल में बुजुर्गों के साथ बैठता है, और गाँव की मिट्टी को सिर्फ चरण-स्पर्श नहीं, आत्म-स्पर्श समझता है।

कविता से चेतना तक: डॉ. सत्यवान सौरभ का योगदान

डॉ. सत्यवान सौरभ की पंक्तियाँ हमें एक विचार देती हैं—कि हम क्या खो रहे हैं, क्यों खो रहे हैं और कैसे बचा सकते हैं। उनकी कविता हमें यह सोचने को विवश करती है कि:

> “शहर की दौड़ में अगर गाँव छूट गया,
तो समझो हमने अपने संस्कार खो दिए।
माँ-बाप अगर इंतज़ार में रह गए,
तो समझो हमने जीवन की धुरी खो दी।”

यह कविता एक दस्तावेज़ बन जाती है उस दर्द की जो आँकड़ों में नहीं आता, जो अखबार की सुर्खियाँ नहीं बनता, मगर हर दूसरे गाँव की आत्मा में दर्ज है।

 

 

निष्कर्ष: गाँव की पुकार सुनिए

 

आज ज़रूरत सिर्फ योजना बनाने की नहीं, ज़मीन पर जुड़ने की है। यदि हम चाहते हैं कि अगली पीढ़ियाँ भी गाँव को जानें, अनुभव करें और अपनाएँ—तो हमें आज से ही काम शुरू करना होगा।

हमें गांव को फिर से जीवंत बनाना होगा, चौपालों की हँसी लौटानी होगी, और बेटों को “मेहमान” से “सपूत” बनाना होगा।

 

“जहाँ चूल्हे में आग नहीं, वहाँ घर नहीं होता।
जहाँ माँ के आँसू और बाप की चुप्पी हो,
वहाँ प्रगति नहीं, पराजय होती है।
गाँव को बचाइए—यह मिट्टी नहीं, आपकी जड़ें हैं।”

  • Related Posts

    जंतर-मंतर प्रदर्शन: फिलहाल तीन बातें
    • TN15TN15
    • July 25, 2026

    प्रेम सिंह कल एक मित्र ने पूछ लिया…

    Continue reading
    एक भूख हड़ताल ‌ ऐसी भी थी!
    • TN15TN15
    • July 25, 2026

    जंगे -आजादी के सिपहसालार सोशलिस्‍ट तहरीक के जन्‍मदाताओं…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    CJP का प्रोटेस्ट खत्म करने का ऐलान, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद लिया फैसला

    • By TN15
    • July 25, 2026
    CJP का प्रोटेस्ट खत्म करने का ऐलान, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद लिया फैसला

    धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अभिजीत दीपके का बड़ा बयान, कहा- मुझे हीरो मत बनाइए क्योंकि…

    • By TN15
    • July 25, 2026
    धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अभिजीत दीपके का बड़ा बयान, कहा- मुझे हीरो मत बनाइए क्योंकि…

    ‘झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए’, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर बोले अभिजीत दीपके, CJP का पहला रिएक्शन

    • By TN15
    • July 25, 2026
    ‘झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए’, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर बोले अभिजीत दीपके, CJP का पहला रिएक्शन

    NTA मॉडल फेल, शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र दिखावा है – सीटू ने की NTA भंग करने की मांग : गंगेश्वर दत्त शर्मा

    • By TN15
    • July 25, 2026
    NTA मॉडल फेल, शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र दिखावा है – सीटू ने की NTA भंग करने की मांग : गंगेश्वर दत्त शर्मा

    जंतर-मंतर प्रदर्शन: फिलहाल तीन बातें

    • By TN15
    • July 25, 2026
    जंतर-मंतर प्रदर्शन: फिलहाल तीन बातें

    प्रोफेसर नामवर सिंह जन्म शताब्दी समारोह

    • By TN15
    • July 25, 2026
    प्रोफेसर नामवर सिंह जन्म शताब्दी समारोह