दहेज की बलि, आखिर क्यों चढ़ रही है, पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर लड़कियां?

दहेज प्रथा आधुनिक भौतिकवाद युग में समाज के माथे पर एक कलंक का टीका है। जिसके कारण भारतीय समाज में रोज हत्याएं और आत्महत्याएं हो रही हैं। यह ऐसी कुप्रथा है जिसके कारण हजारों घरों के चिराग रोशन होने से पहले ही बुझ जाते हैं। इस कुप्रथा के कारण युवाओं का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। भारत की बेटियां इस कुप्रथा के कारण अपना बलिदान दे रही हैं। दहेज प्रथा भारतीय समाज के लिए एक कैंसर है। जो देश के उत्थान विकास में रोड़ा है। जो समाज को अपंग बना देता है, अपाहिज कर देता है। यह ऐसी कुप्रथा है। जो युवाओं के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगा देती है। युवाओं के भविष्य को दीमक की तरह चाटकर खत्म कर देती है। आंकड़े बताते हैं कि 2017 से 2022 के बीच हर साल 7 हजार लड़कियां दहेज हत्या की भेंट चढ़ गईं।

आज का समाज-मुखौटा संस्कृति से ग्रस्त है। इस दौर में इंसान का चेहरा ही नहीं मिलता। कब से मैं इन नकाबों की तहे खोल रहा हूँ। आज के रावण की मंशाएं आक्रामक और दिल-दहला देने वाली घटनाएं जिसकी उम्मीद हम अपनी बीहड़ कल्पनाओं में भी नहीं करते। हर-रोज अखबार की सुर्खियां बनी रहती हैं। आज का रावण दहेज के लिए पत्नी को जलाता है। ताने-अत्याचार करके पत्नी को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करता है। शादी की नीयत से महिलाओं का अपहरण करता है। इस कुकृत्य में असफल हुआ वो बलात्कार को अंजाम देता है।

दहेज की बलि क्यों चढ़ रही है आधुनिक भारत की सुशील सभ्य लड़कियां?
ऐसे समय में जब आधुनिक भारत की लड़कियों ने घर की चौखट से लेकर संसद की चौखट तक अपने नाम का लोहा मनवा दिया। धरती से लेकर नभ तक अपनी शोहरत के नाम का डंका पिटवा दिया है। फिर भी दहेज की बलि क्यों चढ़ रही है। आखिर इसकी वजह क्या है? ऐसे समय में जब हमारे देश की लड़कियां पढ़ी-लिखी शिक्षित और आत्मनिर्भर है। तब भी वे दहेज की बलि कैसे चढ़ सकती है। दिल-दहला देने वाली ग्रेटर नोएडा दहेज हत्याकांड इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसकी मुख्य वजह मेरी राय में माता-पिता की दकियानूसी सोच और लड़के वालों की बढ़ती भौतिक-लालसा हो सकती है।

अब समय आ गया है कि मां-बाप को दकियानूसी सोच से ऊपर उठना होगा। बेटे-बेटी को बराबरी का दर्जा देना होगा, भारतीय समाज में कन्यादान को महादान माना जाता है। यही सोच मां-बाप को दहेज देने पर मजबूर करती है। बेटी पराया धन है। इसी सोच से ऊपर उठना होगा। मेरी राय में दहेज हत्या के पीछे असल समस्या सोच में गिरती गिरावट है। लड़की को बचपन से सिखाया जाता है कि शादी उसके अस्तित्व का आधार है। अब इस सोच से ऊपर उठकर मां-बाप को लड़की के साथ हिम्मत दिखानी होगी, अत्याचार बेबसी से ऊपर उठकर लड़की को सुरक्षा तथा अधिकारों से सक्षम बनाना होगा। अब समाज को समझना होगा कि औरत इस धरती पर कोई बोझ नहीं है। जिसे किसी भी कीमत पर उतार देना है। बल्कि ईश्वर द्वारा पृथ्वी पर किया गया अनूठा हस्ताक्षर है। जिसका कर्ज पूरा विश्व भी मिलकर अदा नहीं कर सकता।

अन्त मैं मेरी राय है अब समय आ गया है कि समाज को दकियानूसी सोच से ऊपर उठना होगा। महिलाओं ने धरती से लेकर नभ तक अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा दिया है। महिलाओं को सशक्त बनाना होगा, तभी देश विकसित देशों की कतार में आ सकता है। मुखौटा संस्कृति को जमींदोज करना होगा। दहेज मांगने वालों का मुखर विरोध करना होगा, बेटी को पैतृक सम्पत्ति में बराबरी का हिस्सा देना होगा। गैर-सरकारी संगठनों को दहेज विरोधी मुहिम छेड़नी होगी। इसके लिए गांवों-कस्बों में जाकर ग्रामीण लोगों को दहेज विरोधी प्रोग्राम वर्कशाप चलाकर उनकी सोच बदलनी होगी। लड़कियों को उनके कानूनी हक बताने होंगे, तभी भारतीय समाज में बुराइयों का दहन हो सकता है। इसके लिए युवा-पीढ़ी को इस लड़ाई की अगुवाई खुद करनी होगी। तभी इस बुराई को जमींदोज किया जा सकता है। कानूनी हक के हिसाब से पहले IPC 498A, अब BNS 85, 86 (भारतीय न्याय संहिता) के तहत दहेज मांगने, खुदकुशी के लिए उकसाने गंभीर शारीरिक चोट पहुंचाने या महिला के जीवन को खतरा होने पर उसे सुरक्षा मिलती है।

अन्त में
खुल जाएंगे सभी रास्ते
रुकावटों से लड़ तो सही।
सब होगा हासिल
तू जिद्द पर अड़ तो सही।।

ज्योति स्वरूप गौड़

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