वर्तमान स्थिति:
महाभियोग की प्रक्रिया: संसद के दोनों सदनों में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश हो चुका है। लोकसभा में 145 सांसदों (बीजेपी, कांग्रेस और अन्य दलों सहित) और राज्यसभा में 63 सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 124(4) और 218 के तहत चल रही है, जिसमें “सिद्ध दुराचार” के आधार पर जज को हटाया जा सकता है।
इस्तीफे का विकल्प: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने जस्टिस वर्मा से इस्तीफा देने को कहा था, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। इस्तीफा देने पर वे महाभियोग की प्रक्रिया और संभावित पेंशन व सुविधाओं की हानि से बच सकते थे।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जांच समिति ने तय प्रक्रियाओं का पालन किया है। जस्टिस वर्मा ने इन-हाउस जांच को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी थी, लेकिन कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया।
अब क्या रास्ता बचा है?
महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी:
लोकसभा और राज्यसभा में प्रस्ताव पास होने के बाद एक वैधानिक समिति गठित होगी, जो जांच करेगी।
यदि दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होता है, तो जस्टिस वर्मा को हटाया जा सकता है। हालांकि, भारत में अब तक कोई भी जज महाभियोग के जरिए हटाया नहीं गया है।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद राज्यसभा में उपसभापति हरिवंश सिंह इस प्रस्ताव पर फैसला लेंगे।
इस्तीफा देना: जस्टिस वर्मा अब भी इस्तीफा देकर महाभियोग की लंबी और अपमानजनक प्रक्रिया से बच सकते हैं। इससे उन्हें रिटायर्ड जज के रूप में पेंशन और अन्य लाभ मिल सकते हैं।
कुछ जानकारों का मानना है कि मॉनसून सत्र से पहले वे इस्तीफा दे सकते हैं, क्योंकि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों उनके खिलाफ एकजुट हैं।
कानूनी लड़ाई: जस्टिस वर्मा अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में और याचिका दायर कर सकते हैं। उनकी ओर से कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा जैसे वरिष्ठ वकील पैरवी कर रहे हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा रुख उनके लिए अनुकूल नहीं दिखता।
न्यायिक कार्य से निलंबन: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जस्टिस वर्मा को कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा जा रहा है। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी, जब तक इस मामले का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता।
चुनौतियां और संभावनाएं:
साजिश का दावा: जस्टिस वर्मा ने कहा है कि उनके खिलाफ साजिश रची गई है और नकदी उनकी या उनके परिवार की नहीं थी। लेकिन जांच समिति ने उनके दावों को संदिग्ध माना, खासकर यह तथ्य कि वे आग की घटना के बाद स्टोर रूम में नहीं गए।
न्यायिक जवाबदेही: यह मामला न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठा रहा है। संसद में सत्तापक्ष और विपक्ष की एकजुटता इसे ऐतिहासिक बना सकती है।
FIR की मांग: बार एसोसिएशन और कुछ सांसदों ने इस मामले में FIR दर्ज करने की मांग की है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक इसकी अनुमति नहीं दी।








