दुनिया की सबसे मीठी, दिल को छू लेने वाली और सम्मानित भाषाओं में से एक है उर्दू

उर्दू दुनिया की सबसे मीठी, दिल को छू लेने वाली और सम्मानित भाषाओं में से एक है। यह केवल अपनी बात कहने का ज़रिया नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने, मोहब्बत बाँटने और इंसान के अंदर छिपे एहसासों को सामने लाने वाली भाषा है। इसके शब्दों में ऐसी मिठास, नर्मी और खूबसूरती है कि सुनने वाला खुद-ब-खुद इसकी जादुई दुनिया में खो जाता है।

उर्दू मोहब्बत की भाषा है। यह इंसान के जज़्बात, एहसास, अरमान, खुशियाँ और ग़म को इतने सुंदर और नाज़ुक अंदाज़ में बयान करती है कि बात सीधे दिल में उतर जाती है। जब कोई शायर या लेखक अपने एहसासों को उर्दू के शब्द देता है, तो वे केवल शब्द नहीं रहते, बल्कि दिल की धड़कन बन जाते हैं।

उर्दू इंसान को कल्पना की एक सुंदर दुनिया में ले जाती है। जब कोई शायर बहते झरनों, महकते फूलों, हरी-भरी वादियों, चाँदनी रातों और चहचहाते परिंदों का ज़िक्र उर्दू में करता है, तो पढ़ने वाला खुद को उन नज़ारों का हिस्सा महसूस करने लगता है। उर्दू में प्रकृति की सुंदरता भी है और इंसानी रूह की गहराई भी।

उर्दू की तहज़ीब, शालीनता, नफ़ासत और मिठास ही इसकी सबसे बड़ी पहचान है। इसके लहजे में सम्मान है, बातों में अपनापन है और अल्फ़ाज़ में ऐसी मिठास है कि सुनने वाला बार-बार सुनना चाहता है। शायद ही दुनिया की कोई दूसरी भाषा हो जिसमें इतनी नर्मी, प्यार और दिल को छू लेने वाली खूबसूरती एक साथ मिलती हो।

उर्दू ने सदियों से मोहब्बत, भाईचारा, सहनशीलता, इंसानियत और अच्छे अख़लाक़ का पैग़ाम दिया है। इसलिए यह केवल किसी एक क़ौम या इलाक़े की भाषा नहीं, बल्कि तहज़ीब, साहित्य, संस्कृति और इंसानी जज़्बात की अमानत है। जब तक दुनिया में मोहब्बत ज़िंदा है, जब तक इंसान के दिल में एहसास ज़िंदा है, तब तक उर्दू की ख़ुशबू भी महकती रहेगी।

उर्दू केवल एक भाषा नहीं, बल्कि तहज़ीब, मोहब्बत, अदब और इंसानियत की एक ज़िंदा परंपरा है। इसके शब्दों में दिल जीतने की ताक़त है, रूह को सुकून देने की क्षमता है और मोहब्बत को हमेशा ज़िंदा रखने का जादू है। इसलिए उर्दू केवल बोली नहीं जाती, उसे महसूस किया जाता है; केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि दिल में उतारा जाता है।

“उर्दू के हर लफ़्ज़ में वफ़ा की ख़ुशबू बसती है,
यह दिल की ज़ुबान है, दुआओँ की आवाज़ है।”

लेकिन एक सवाल आज भी मेरे दिल को बेचैन करता है।

मैं हैरान हूँ कि इतनी प्यारी, इतनी नर्म, इतनी मोहब्बत से भरी भाषा बोलने वाले कुछ लोगों के दिलों में नफ़रत, सख़्ती, कट्टरता, बदगुमानी और इंसानियत के दर्द से बेपरवाही कैसे पैदा हो जाती है?

जिस ज़ुबान का हर लफ़्ज़ मोहब्बत सिखाता हो, जिसके हर जुमले में अदब हो, जिसकी हर ग़ज़ल इंसान को बेहतर इंसान बनने का पैग़ाम देती हो, उसी ज़ुबान को बोलने वाला अगर किसी मज़हब, जाति या इंसान से नफ़रत करे, तो यह उर्दू की रूह नहीं, बल्कि उसके अपने दिल की बीमारी है।

उर्दू बोलने वाले के दामन में तो खुशियों की ऐसी दौलत होनी चाहिए जो दुनिया की किसी दौलत से कम न हो। उसके दिल में इंसानियत का दर्द होना चाहिए, उसकी आँखों में दूसरों के आँसू देखकर नमी आनी चाहिए, उसके हाथ मदद के लिए उठने चाहिए और उसकी ज़ुबान से हमेशा मोहब्बत और दुआ निकलनी चाहिए।

फिर ऐसा क्यों है कि कुछ लोग इस अनमोल दौलत को छोड़कर केवल दौलत, शोहरत और माद्दी दुनिया के पीछे भाग रहे हैं? क्यों दिल छोटे होते जा रहे हैं और मकान बड़े? क्यों रिश्ते कमज़ोर हो रहे हैं और बैंक बैलेंस मज़बूत? क्यों इंसान की कीमत उसके किरदार से नहीं, बल्कि उसकी हैसियत से लगाई जाने लगी है?

अगर उर्दू ने हमें कुछ सिखाया है तो वह यह है कि इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका अख़लाक़, उसकी मोहब्बत, उसकी रहमत और उसका किरदार है; न कि उसका बैंक बैलेंस, उसका ओहदा या उसकी शोहरत।

काश, हम उर्दू को केवल बोलें नहीं, बल्कि उसे अपनी ज़िंदगी में उतारें। उसके अल्फ़ाज़ ही नहीं, उसकी रूह को भी अपनाएँ। जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन नफ़रत की जगह मोहब्बत ले लेगी, कट्टरता की जगह इंसानियत खड़ी होगी, और दुनिया पहले से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत बन जाएगी।

यही सोचकर दिल दुआ करता है कि उर्दू की मिठास केवल हमारी ज़ुबान तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे किरदार, हमारे व्यवहार और हमारी पूरी ज़िंदगी में उतर जाए। क्योंकि किसी भाषा की सबसे बड़ी इज़्ज़त उसके बोलने वालों के चरित्र से होती है।

सैयद तहसीन अहमद
(मूल उर्दू का हिंदी अनुवाद)

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