दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव में उम्मीदवार बनने के लिए अभिभावकों की सहमति से जुड़े नए नियम को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के कार्यकर्ताओं अनन्या रतूड़ी और अक्षत शिखर ने 2 सितंबर को दिल्ली हाईकोर्ट का रुख करते हुए DUSU चुनाव समिति की ओर से जारी नए एफिडेविट को चुनौती दी है। AISA का आरोप है कि नए प्रावधान के तहत वयस्क छात्रों को भी चुनाव लड़ने से पहले अपने माता-पिता की सहमति लेना अनिवार्य किया गया है।
चुनाव लड़ने के लिए छात्र और अभिभावक के हलफनामे जरूरी
संगठन ने इस व्यवस्था को लेकर सवाल उठाया है कि विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले वयस्क छात्रों पर अभिभावकीय अधिकार इस तरह कैसे लागू किया जा सकता है। AISA का कहना है कि विश्वविद्यालय के छात्र वयस्क और अपने फैसले लेने में सक्षम होते हैं. ऐसे में अगर कोई छात्र चुनाव लड़कर अपनी बात रखना चाहता है तो उसके लिए किसी अन्य व्यक्ति की अनुमति जरूरी नहीं होनी चाहिए।
संगठन ने यह भी कहा कि नए हलफनामे में यह मान लिया गया है कि छात्रों की शिक्षा का खर्च उनके माता-पिता ही उठाते हैं। AISA के अनुसार, दिल्ली विश्वविद्यालय में ऐसे भी बड़ी संख्या में छात्र हैं जो अपनी पढ़ाई और जीवन-यापन का खर्च खुद उठाते हैं। ऐसे छात्रों के लिए अभिभावक की सहमति की अनिवार्यता उनकी वास्तविक परिस्थितियों से मेल नहीं खाती।
महिला छात्रों के लिए भी खड़ी हो सकती है मुश्किल
संगठन ने आरोप लगाया है कि नए नियम DUSU चुनाव में उम्मीदवार बनने की प्रक्रिया को और अधिक सीमित कर सकते हैं. AISA ने अभिभावक की सहमति और एक लाख रुपये के बॉन्ड की शर्त को साथ रखते हुए सवाल किया कि क्या विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव को ऐसे उम्मीदवारों के लिए ज्यादा अनुकूल बना रहा है जिनके पास पर्याप्त आर्थिक और राजनीतिक संसाधन हैं। AISA का कहना है कि मंछंदा मामले के बाद हर साल सामने आने वाले ऐसे नियम DUSU चुनाव को छात्रों की आकांक्षाओं का मंच बनाने के बजाय प्रक्रिया को अधिक मनमाना और अलोकतांत्रिक बना रहे हैं।
2 सितंबर को दाखिल हुई याचिका, तत्काल सुनवाई की मांग
AISA ने बताया कि याचिका 2 सितंबर की सुबह दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल की गई है। संगठन के अनुसार, मामले को तत्काल आधार पर सूचीबद्ध किए जाने की उम्मीद है. AISA ने मांग की है कि कैंपस में छात्रों की लोकतांत्रिक भागीदारी पर इस तरह की पाबंदियां नहीं लगाई जानी चाहिए और DUSU को आम छात्रों की आकांक्षाओं और आवाज को सामने रखने का मंच बनाया जाना चाहिए।





