ट्रंप को डुबो देगा उनका घमंड! 1 साल में ही 70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से तोड़ा नाता, क्या है प्लान?

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल (जनवरी 2025 से शुरू) के पहले साल में अमेरिका ने कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और समझौतों से नाता तोड़ा है। आपकी बात में “70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं” का जिक्र है, जो हिंदी मीडिया (जैसे ABP Live, Aaj Tak आदि) में इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन आधिकारिक रूप से व्हाइट हाउस और अमेरिकी सरकार के दस्तावेजों में मुख्य घटना 7 जनवरी 2026 को हुई, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने एक प्रेसिडेंशियल मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर किए और अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अलग होने का निर्देश दिया।

यह 66 में हैं शामिल

 

31 संयुक्त राष्ट्र (UN) से जुड़ी संस्थाएं/एजेंसियां (जैसे UN Women, UN Population Fund, UNFCCC – क्लाइमेट चेंज फ्रेमवर्क, IPCC, UN Water आदि)।
35 गैर-UN संगठन/संघ (जैसे International Solar Alliance – भारत-फ्रांस लीड वाला, International Renewable Energy Agency, IUCN आदि)।

इसके अलावा, पहले से कुछ अलगाव हो चुके थे:

WHO (World Health Organization) से जनवरी 2025 में प्रक्रिया शुरू हुई और जनवरी 2026 में पूरी हुई (एक साल की नोटिस पीरियड के बाद)।
Paris Climate Agreement से दूसरी बार अलग हुआ।
UN Human Rights Council (UNHRC), UNRWA, UNESCO आदि से भी पहले ही कदम उठाए गए।

इन सबको मिलाकर हिंदी मीडिया में अक्सर “लगभग 70” कहा जा रहा है (66 + WHO + Paris Agreement + कुछ अन्य छोटे कदम)। यह “America First” पॉलिसी का हिस्सा है, जिसमें ट्रंप प्रशासन का दावा है कि ये संस्थाएं:

अमेरिकी करदाताओं के पैसे की बर्बादी करती हैं।
“ग्लोबलिस्ट” एजेंडा चलाती हैं।
अमेरिकी संप्रभुता, सुरक्षा, आर्थिक हितों के खिलाफ काम करती हैं।
बेकार, गलत तरीके से चल रही हैं या चीन/अन्य देशों के प्रभाव में हैं।

ट्रंप का प्लान स्पष्ट रूप से अमेरिका को बहुपक्षीय (multilateral) संस्थाओं से दूर करके द्विपक्षीय (bilateral) डील्स पर फोकस करना, पैसे बचाना और “अमेरिका पहले” रखना है। वे कहते हैं कि इससे अमेरिकी संसाधन घरेलू प्राथमिकताओं (जैसे बॉर्डर सिक्योरिटी, इकोनॉमी, मिलिट्री) पर लगेंगे।
लेकिन आलोचक (जैसे पर्यावरण संगठन, UN सपोर्टर्स, कुछ यूरोपीय देश) इसे घमंड और अलग-थलग (isolationism) कह रहे हैं। उनका कहना है कि इससे:

ग्लोबल क्लाइमेट एक्शन कमजोर होगा।
स्वास्थ्य, महिला अधिकार, विकास जैसे मुद्दों पर अमेरिकी प्रभाव घटेगा।
दुनिया अमेरिका के बिना आगे बढ़ेगी, जिससे अमेरिका की लीडरशिप कमजोर पड़ेगी।

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