समाज में कई बार लोग दिखावे के लिए रस्में निभाते हैं, जबकि असलियत में उन्होंने उस व्यक्ति को जीते जी कभी सम्मान नहीं दिया होता।एक व्यक्ति अपने बुजुर्ग पिता को जीते जी कभी सम्मान नहीं देता, उनकी जरूरतों का ख्याल नहीं रखता, लेकिन जब पिता की मृत्यु हो जाती है, तो वह बड़े धूमधाम से श्राद्ध कराता है और रोने-धोने का दिखावा करता है, तो यह स्थिति “जिन्दे देखो तड़पाकर मारा पर दिखावटी श्राद्ध” के अंतर्गत आएगी। संक्षेप में, यह दिखावटीपन और पाखंड पर आधारित एक व्यंग्य है, जो किसी की मृत्यु के बाद दिखाई देने वाले झूठे या दिखावटी सम्मान और शोक पर प्रहार करता है। यह लाइन उन लोगों पर कटाक्ष करती है जो किसी को जीवन में अपमानित, उपेक्षित या तड़पाते हैं, लेकिन मरने के बाद दिखावे के लिए उनकी बहुत श्रद्धा करते हैं — जैसे श्राद्ध, श्रद्धांजलि, आदि। जिन्दे देखो तड़पाकर मारा पर दिखावटी श्राद्ध” एक कहावत है जिसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति को जिंदा रहते हुए कष्ट देना या उसका अपमान करना और फिर उसके मरने के बाद केवल दिखावे के लिए कोई भी क्रिया या श्राद्ध-तर्पण करना, जिसमें सच्ची भावना न हो। जो व्यक्ति जीवित अवस्था में तो कष्ट या अपमान सहता है, पर परिवार या समाज से अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाता या उसकी बात सुनी नहीं जाती। बाद में जब वह व्यक्ति चला जाता है, तो लोग उसके सम्मान में तर्पण, श्राद्ध और अन्य कर्मकांड करते हैं।
मरने के बाद क्या रोना, जब जीते जी सताया था;
जो हाथ पकड़ना था कभी, अब फूलों से सजाया था
यह विषय भारतीय समाज की एक गहरी विडंबना को दर्शाता है, जहाँ जीवन में किसी व्यक्ति की उपेक्षा की जाती है, लेकिन मृत्यु के बाद बड़े धूमधाम से उसके लिए कर्मकांड किए जाते हैं। “जिन्दे को परेशान करो और मरने के बाद श्राद्ध” ।जब कोई व्यक्ति जीवित होता है, तो उसे तिरस्कार, उपेक्षा, तकलीफ़, या अन्याय झेलना पड़ता है — उसके अस्तित्व को महत्व नहीं दिया जाता। लेकिन जब वही व्यक्ति मर जाता है, तो लोग दिखावे के लिए या समाजिक रीति-रिवाजों के तहत बड़े आयोजन करते हैं, जैसे कि श्राद्ध (पितरों के लिए किया जाने वाला कर्मकांड), मानो वे उस इंसान का बहुत सम्मान करते थे । ज़बकि यह पाखंड और दिखावे पर प्रहार करती है। यह बताती है कि प्रेम, आदर और सहयोग जीवित इंसान को देना चाहिए, न कि उसके मरने के बाद उसकी मूर्ति के आगे फूल चढ़ाकर। यह उन लोगों के लिए भी कटाक्ष है जो अपनों की कद्र तब करते हैं जब वो इस दुनिया में नहीं रहते। जिन्दे को परेशान करो और मरने के बाद श्राद्ध: एक सामाजिक विडंबना। भारतीय संस्कृति में मृतकों के प्रति सम्मान दिखाने की परंपरा बहुत पुरानी है। श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण जैसे संस्कारों के माध्यम से हम अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं। यह धार्मिक आस्था और पारिवारिक कर्तव्यों का प्रतीक है। लेकिन दुखद विडंबना यह है कि कई बार यही समाज जीवित व्यक्ति की उपेक्षा करता है, उसे तिरस्कृत करता है, और उसकी भावनाओं को आहत करता है। पर जब वह दुनिया से चला जाता है, तब बड़े धूमधाम से उसके लिए श्राद्ध और भोज का आयोजन होता है। समाज का असली चेहरा । कई बार देखा गया है कि माता-पिता बुजुर्ग हो जाते हैं तो उन्हें बोझ समझा जाता है। बेटा-बहू उनकी देखभाल से कतराते हैं, उन्हें अकेलेपन और तिरस्कार के अंधेरे में छोड़ देते हैं। वृद्धाश्रमों में रह रहे बुजुर्ग इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। जिनके जीते जी कोई हाल नहीं पूछता, उनके मरने पर सोशल मीडिया पोस्ट, फूल-मालाएं और श्रद्धांजलि संदेश दिए जाते हैं। यह कैसा समाज है जहाँ –जिन्दा माता-पिता को एक वक्त की रोटी देने में परेशानी होती है, लेकिन श्राद्ध भोज में 100 लोगों को खाना खिलाया जाता है। जब वे मदद मांगते हैं तो हम व्यस्त होते हैं, पर जब वे चले जाते हैं तो फोटो पर माला चढ़ाकर आंसू बहाते हैं। श्राद्ध का उद्देश्य केवल कर्मकांड नहीं है। यह एक प्रतीक है – कि हम अपने पूर्वजों को नहीं भूले हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए हम कार्य कर रहे हैं। लेकिन क्या आत्मा की शांति तब मिलती है जब वह शरीर में रहते हुए दुखी रही हो? क्या यह सच नहीं कि आत्मा को सबसे अधिक शांति तब मिलती है जब वह जीवनकाल में प्रेम, सम्मान और देखभाल पाए?
समय रहते संभल जाएं। हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि क्यों न हम जिन्दा लोगों को ही वह प्रेम, सम्मान और सहारा दें जिसकी उन्हें आवश्यकता है। किसी के मरने के बाद की श्रद्धांजलि से बेहतर है – जीते जी उसका साथ देना। एक गिलास पानी समय पर देना, हजारों लीटर गंगा जल से अधिक पुण्य दे सकता है। एक सच्चा “कैसे हो?” जीवित व्यक्ति की आत्मा को शांति दे सकता है। श्राद्ध करना गलत नहीं है, पर जिन्दा इंसान को तड़पाकर बाद में दिखावटी श्रद्धांजलि देना, समाज की खोखली मानसिकता को उजागर करता है। बदलना होगा – अपने सोच को, अपनी प्राथमिकताओं को। आइए, जीते जी अपनों को वो सब दें जो वे मृत्यु के बाद भी शायद न महसूस कर सकें।
ऊषा शुक्ला








