Thought for 29sसंघ के 100 साल : जब कमनियुस्ट बन गए थे आरएसएस के पहले सरकार्यवाह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने पर आजतक की विशेष श्रृंखला में आरएसएस के पहले सरकार्यवाह गोपाल मुकुंद हुद्दार (जिन्हें बालाजी हुद्दार के नाम से जाना जाता है) की जिंदगी एक दिलचस्प मोड़ वाली कहानी बयां करती है। 1902 में मध्य प्रदेश के मंडला में जन्मे बालाजी आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के करीबी सहयोगी थे। उन्होंने संघ के प्रारंभिक दिनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन वैचारिक बदलाव के कारण वे कम्युनिस्ट आंदोलन की ओर मुड़ गए और दुनिया भर में ‘जॉन स्मिथ’ के नाम से मशहूर हो गए। आइए, उनकी इस यात्रा को विस्तार से समझें।

 

प्रारंभिक जीवन और आरएसएस से जुड़ाव

 

बालाजी का बचपन गरीबी और कठिनाइयों से भरा था। किंवदंती है कि नागपुर के एक अमीर उद्योगपति परिवार की विधवा ने उन्हें बचपन में डूबने से बचाया और चार साल की उम्र में गोद ले लिया, जिसके बाद वे नागपुर आ गए। यहां से ग्रेजुएशन करने के बाद वे एक गर्ल्स मिशन स्कूल में शिक्षक बने। छात्र राजनीति में सक्रिय होने पर वे पहले डॉ. बी.एस. मुंजे, फिर डॉ. हेडगेवार के संपर्क में आए। पढ़ने-लिखने वाले और युवाओं में लोकप्रिय बालाजी को 9-10 नवंबर 1929 को आरएसएस के पहले पदाधिकारियों की घोषणा में सरकार्यवाह (महासचिव) बनाया गया। उसी समय सेना से रिटायर्ड मार्तंड राव जोग को सर सेनापति नियुक्त किया गया।
आरएसएस का लक्ष्य था देशभक्त युवाओं का संगठन बनाना, जो प्राचीन भारत की परंपराओं पर आधारित हो। संघ ने शुरू से तय किया कि वह किसी आंदोलन में संगठन के रूप में शामिल नहीं होगा, लेकिन स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से भाग ले सकते थे। उदाहरण के तौर पर, सविनय अवज्ञा आंदोलन में डॉ. हेडगेवार ने सरसंघचालक पद छोड़कर जंगल सत्याग्रह में हिस्सा लिया। इसी तरह, सावरकर और हिंदू महासभा के खिलाफ आंदोलनों में कई स्वयंसेवक शामिल हुए, लेकिन संघ अपनी नीति पर अडिग रहा। डॉ. हेडगेवार के क्रांतिकारी अनुभवों से उन्हें पता था कि हिंसक संगठन लंबे समय तक नहीं चल पाते।

 

संघ से अलगाव और क्रांतिकारी मोड़

 

27 साल की उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी बालाजी के धैर्य की परीक्षा ले रही थी। संगठन विस्तार में दशकों लगने की बात उन्हें अस्वीकार्य लगी। मात्र दो साल से कम समय में उन्होंने पद छोड़ दिया। 1931 में उनका नाम ‘बालाघाट राजनीति डकैती केस’ में आया, जहां क्रांतिकारियों ने हथियार खरीदने के लिए जमींदारों के घर डाका डाला। सभी को 3-5 साल की सजा हुई। नाना पालेकर की किताब ‘हेडगेवार चरित’ में लिखा है कि अगर वे पद पर रहते, तो संघ के लिए मुश्किल हो जाती।
1935 में नागपुर जेल से रिहा होने के बाद बालाजी ने ‘सावधान’ पत्रिका का संपादन शुरू किया। अचानक पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए लंदन जाने का विचार आया, जिसमें डॉ. हेडगेवार ने मदद की। लेकिन लंदन से वे स्पेन चले गए, जहां वामपंथी विचारों का प्रभाव पड़ चुका था। ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआई5 की फाइलों के मुताबिक, वे वैचारिक रूप से झूल रहे थे—एक तरफ वामपंथ, दूसरी तरफ आरएसएस को एशिया में फैलाने की बात। उन्होंने संघ से दोबारा जुड़ने की इच्छा भी जताई।

 

‘जॉन स्मिथ’ का जन्म: स्पेन गृहयुद्ध की कहानी

 

1936-39 का स्पेन गृहयुद्ध लोकतांत्रिक सरकार के पक्ष में चल रहा था। बालाजी 16 अक्टूबर 1937 को स्पेन पहुंचे—फ्रांस होते हुए पाइरीनीज पहाड़ियां पार कर। जनरल फ्रांको की सेना ने उन्हें पकड़ लिया, जहां उन्होंने अपना नाम ‘जॉन स्मिथ’ रख लिया। लेफ्ट की इंटरनेशनल ब्रिगेड ने उन्हें ब्रिटिश बटालियन का सदस्य बना दिया, जो मारे गए भारतीय कम्युनिस्ट शापूरजी सक्लावाला के नाम पर था। रिहाई के लिए ब्रिटेन ने एक रिटायर्ड कर्नल भेजा, जिसका बेटा भी कैदी था और जो कभी नागपुर के पास तैनात रहा था। नागपुर कनेक्शन काम आया, बालाजी लंदन लौटे। वहां और बंबई में उनका भव्य स्वागत हुआ। युवा कम्युनिस्ट नेता ए.बी. वर्धन (बाद में सीपीआई महासचिव) के लिए वे हीरो बन गए। दुनिया भर के कम्युनिस्ट उन्हें ‘जॉन स्मिथ’ के नाम से ज्यादा पहचानते थे।

 

डॉ. हेडगेवार के साथ संबंध और नेताजी विवाद

 

डॉ. हेडगेवार का बालाजी के प्रति रवैया हमेशा सकारात्मक रहा। 24 दिसंबर 1938 को नागपुर लौटने पर हेडगेवार खुद रेलवे स्टेशन पहुंचे। संघ विचारक एच.वी. शेषाद्री लिखते हैं: “डॉक्टरजी का बालाजी के प्रति दोस्ताना रवैया वैचारिक बदलाव के बावजूद नहीं बदला।” हेडगेवार ने उन्हें नागपुर जिले के शिविर में बुलाया, जहां बालाजी ने मजदूर-किसान यूनियनों के अनुभव साझा किए। अनौपचारिक बातचीत में हेडगेवार ने कहा: “मजदूरों-किसानों की समृद्धि संघ का विषय है, लेकिन हमारी भाषा

 

अमीर-गरीब संघर्ष की नहीं होनी चाहिए।”

 

हालांकि, 1979 में ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ में बालाजी के हवाले से हेडगेवार पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस से न मिलने का आरोप लगाया गया। बालाजी ने कहा कि हेडगेवार ने बीमारी का हवाला देकर मना कर दिया। लेकिन ‘हेडगेवार चरित’ में स्पष्ट है कि जुलाई 1939 में हेडगेवार गंभीर बीमार थे। उन्होंने कहा: “हम 50% तैयार हैं या नहीं? सुभाषजी के पास कितनी क्षमता? नागपुर आओ, तब चर्चा करेंगे।” पत्र देरी से पहुंचा, और हेडगेवार 18 जुलाई को चल बसे।

 

अंतिम वर्ष और विरासत

 

1938 में कम्युनिस्ट पार्टी जॉइन करने के बाद 1949 में मोहभंग हुआ और 1952 में इस्तीफा दे दिया। फिर वे आध्यात्मिकता की ओर मुड़े। 1983 में उनकी मृत्यु हुई। आरएसएस ने कभी उनके नाम को छिपाया नहीं और नकारात्मक टिप्पणी से बचा। बालाजी की कहानी संघ के लचीलेपन और वैचारिक बहस की मिसाल है। यह श्रृंखला आरएसएस के 100 साल के सफर को जीवंत बनाती है।6 web pages1.1s

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