पहली बार नहीं बढ़ रहीं संसद में सीटें, 1947 में 489 सीटों के लिए हुआ था चुनाव, तब से 5 बार बदल चुका नंबर

पहली बार नहीं, लोकसभा (संसद के निचले सदन) में सीटों की संख्या 1947 के बाद से कई बार बदली है। शुरू में 1951-52 के पहले आम चुनाव में 489 निर्वाचित सीटें थीं (कुल सदस्यता 499 तक, जिसमें 2 आंग्ल-भारतीय मनोनीत भी शामिल थे)। तब से अब तक (2024-26 तक) कुल सीटें 543 हो चुकी हैं।

 

लोकसभा सीटों में प्रमुख बदलावों का इतिहास

सीटों में बदलाव मुख्य रूप से परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया के जरिए हुआ, जो जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं और संख्या तय करता है। यहां प्रमुख बदलाव:

1951-52 (पहला चुनाव): 489 सीटें (1951 जनगणना के आधार पर)। कांग्रेस को 364 सीटें मिली थीं।
1957: सीटें बढ़कर 494 हो गईं।
1962: अभी भी 494 सीटें।
1967: सीटें बढ़कर 520 हो गईं (1961 जनगणना आधारित परिसीमन के बाद)।
1971: 522 सीटें (फिर बढ़ोतरी)।
1973-77 के आसपास: 543 सीटें (1971 जनगणना पर आधारित अंतिम बड़ा परिसीमन)। इसमें सिक्किम जैसी नई व्यवस्थाएं भी शामिल हुईं।

1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए सीटों की कुल संख्या और राज्यों के बीच आवंटन को 1971 जनगणना पर फ्रीज कर दिया गया। इसका मकसद था कि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों (ज्यादातर दक्षिणी राज्य) को दंड न मिले। यह फ्रीज 2001 में 84वें संशोधन से 2026 तक बढ़ा दिया गया।

2002 का परिसीमन: सीटों की कुल संख्या 543 ही रही, सिर्फ निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं (boundaries) बदली गईं (2001 जनगणना के आधार पर)। कोई नई सीट नहीं बढ़ी।

2024 तक कुल 543 निर्वाचित सीटें हैं (84 अनुसूचित जाति + 47 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित)। आंग्ल-भारतीय मनोनीत सीटें 2020 में खत्म हो गईं।
संक्षेप में, सीटों की कुल संख्या में बड़ा बदलाव मुख्य रूप से 3-4 बार हुआ (1950 के दशक में छोटी बढ़ोतरी, 1960 के दशक में, और 1970 के दशक में अंतिम 543 तक पहुंचना)। उसके बाद 50 साल से ज्यादा समय से कुल सीटें फ्रीज हैं, हालांकि आंतरिक सीमाएं 2002 में बदली गईं।
क्यों नहीं बढ़ीं सीटें 1971 के बाद?

जनसंख्या विस्फोट के बावजूद (1952 में ~36 करोड़ से अब ~140 करोड़+), एक सांसद अब औसतन 25-30 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है (1952 में ~8 लाख था)।
उत्तर vs दक्षिण विवाद: उत्तर के राज्यों में जनसंख्या ज्यादा बढ़ी, तो नए परिसीमन से उन्हें ज्यादा सीटें मिलतीं, जबकि दक्षिण के राज्यों (जिन्होंने परिवार नियोजन बेहतर किया) को नुकसान होता। 2026 के बाद नई जनगणना के आधार पर परिसीमन की चर्चा है, जिसमें सीटें 700-850 तक बढ़ने की संभावना जताई जा रही है (महिला आरक्षण लागू करने के साथ)। लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक बदलाव नहीं हुआ। यह बदलाव संवैधानिक संशोधन और नए परिसीमन आयोग के जरिए ही होता है। अगर भविष्य में सीटें बढ़ती हैं, तो बहुमत का आंकड़ा (अभी 272) भी बढ़ेगा।

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