फिर निकाला स्वदेशी का जिन्न…

‘हर भारतीय को स्वदेशी अपनाने का संकल्प लेना चाहिए’ यह बात न किसी स्वदेशी जागरण मंच के किसी पदाधिकारी ने कही और न ही किसी गांधीवादी कार्यकर्ता ने बल्कि ये बात देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने कही थी जो खुद विदेशी वस्तुओं को पसंद या धारण करने वालों में जाने जाते हैं। मसलन उनका खुद का पेन, चश्मा घड़ी उच्च कोटि वाली नामी गिरामी कंपनियों के होते हैं चर्चा तो यह भी है कि वो विदेशी मशरूम व काजू के आटे की रोटी खाते हैं।
अब यह आह्वान किसी सादगी की प्रतिमूर्ति समझे जाने वाले ने कहा होता तो भी समझ में आता। निजी उपयोग वाली वस्तुएं तो तिल का ताड़ वाली मानी जा सकती हैं पर सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल करने वाली वस्तुएं भी तो सस्ती स्वदेशी नहीं महंगी विदेशी होती हैं जैसे देश की राजधानी के आस पास के जिलों में भ्रमण करने के लिए इस्तेमाल में आने वाली कार ही विदेशी है और हवाई जहाज भी।
अपने प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान पर अपनी पहुंच के दायरे वाले शापिंग मॉलों और निचली श्रेणी की दुकानों को चाल डाला अस्सी-नब्बे फीसद सामान विदेशी वस्तुओं से ठुंसे पड़े थे। चाहे वो घरेलू उपयोग में लाई जाने वाली दैनिक उपभोग की वस्तु हो या किसी को उपहार स्वरूप दी जाने वाली वस्तुएं हों। नब्बे फीसद पूर्ण रूप से विदेशी ही दिखाई दी। आमतौर पर किसे पूर्ण रूप से स्वदेशी समझें चकरिया गया। सुबह सुबह कौन सा टूथपेस्ट करूं जौ सौ फीसद स्वदेशी हो। अधिकतर ब्रांड विदेशी हैं। डाबर रेड, बबूल, दंत कांति आदि को हम स्वदेशी समझते हैं पर ये भी पूरी तरह से स्वदेशी नहीं हैं। उच्च कोटि की मशीनें विदेशी हैं और इसको बनाने में मिलाई जानें वाली कुछ सामग्रियां भी। गली-मोहल्ले की चक्कियों को छोड़ दें तो ब्रांडेड आटा को बनाने वाली मशीनें बोरियां विदेशी हैं। बोरियां सिलने वाली मशीनें विदेशी हैं। टूथपेस्ट करने से पहले जिस मोबाइल को टटोलते हैं सबके सब स्वदेशी नहीं हैं, हो भी नहीं सकते। लावा और कार्बन ही स्वदेशी है। लावा के बहुत से पुर्जे विदेशी तकनीक पर निर्भर हैं। लगभग सभी स्मार्टफोन में चिपसेट कोरिया से है तो डिस्प्ले ताइवान से और सॉफ्टवेयर अमेरिका का है। यही नहीं हम वाट्सऐप पर कोई भी लेख टाइप कर पोस्ट करते हैं वह विश्व गुरु बनने के मुहाने पर खड़े भारत की नहीं दूसरे देश की देन है। कोई भी सामग्री समाचार पत्रों को ईमेल करते हैं वो अमेरिका की देन है और किसी जानकारी के लिए किसी चीज़ को तस्दीक करते हैं तो वो गुगल भी अमेरिका की और एआई टूल ग्रोक-3 व चैट जीटीपी भी अमेरिका की ही है। फेसबुक, वाट्सऐप, यूट्यूब, ट्विटर (अब का एक्स) भी भारत की खोज नहीं है।
बहुत से टेलीविजन सेट भारत में बनते तो हैं पर एक भी सौ फीसद स्वदेशी नहीं है। शायद एक कुछ हद तक स्वदेशी था पर उसका भी हश्र स्वदेशी बाइक की तरह ही हुआ। हीरो होंडा आदि का बाज़ार पर कब्जा हो गया। कहने को या निकट भविष्य में आई फोन भारत में बनने लगे पर उसका आईओएस अमेरिका में बनता है तो स्क्रीन कोरिया का होता है और कैमरा जापान का। जापान को इलेक्ट्रॉनिक में महारत हासिल है तो सिलिकॉन ट्रांजिस्टर अमेरिका की देन है।
अब हमारे मन में स्वदेशी की भावना हिलोरे लेने लगे और हम कभी के स्वराज़ी रहे जमशेद जी टाटा के पूर्वजों की बनायी कार खरीद लें तो क्या यह शत प्रतिशत स्वदेशी है? इसका इंजन जर्मन तकनीक पर आधारित है तो स्टीयरिंग जापानी है।
अपनी जड़ों से जुड़ने की भावना या उसका आह्वान सपनों की दुनिया में ले जाने वाली मुंबइया फिल्मों, रानू, गुलशन नंदा के उपन्यासों में ही अच्छा लगता है। हक़ीक़त की दुनिया ठीक इसके विपरीत है। बहुत दूर क्यों जाएं। भारत के हर छोटे शहरों में खादी की दुकानें मिल जाएंगी पर इतनी की उंगलियों पर गिन लीजिए वहीं पश्चिमी शैली के परिधानों वाली सैकड़ों दुकानें होंगी। हर मॉल में खादी की दुकान नहीं होगी, होगी तो फ़ेब इंडिया की पर खरीददार वहां पर भी नहीं मिलेंगे।
और मिलेंगे भी तो कैसे हमने शुरू से ही ग्रामीण व कुटीर उद्योग हस्तशिल्प को बढ़ावा ही नहीं दिया। खादी को रस्म अदायगी के रूप में लिया। पब्लिक ट्रांसपोर्ट/कन्वेंस के बजाए निजी क्षेत्र को महत्व दिया। रिसर्च एंड डेवलपमेंट के बजाए युवा पीढ़ी को असेंबलिंग की सुरंग में धकेला। नतीजा हमसे दो साल बाद आजाद हुआ चीन आज हर क्षेत्र में आगे है। उसने उत्पादन पर जोर दिया।
आज के ग्लोबलाइजेशन वाले दौर में, युग में विदेशी वस्तुओं का परित्याग विचारणीय ही नहीं संभव भी नहीं। बैल गाड़ी वाला युग गया। आज के वैश्विककरण के प्रतिद्वंद्वी वाले दौर में हम उस प्रक्रिया से गुजरने को मजबूर हैं जहां हमें यह भ्रम छोड़ना पड़ेगा कि जो हम बनाते हैं या जो हमारा देश बनाता है। 21वीं सदी में इस सोच के साथ जीना अपने आपको उसी तरह से भ्रम में रखना है कि जलेबी और समोसा भारतीय व्यंजन है। हमारे बाप दादा यही भ्रम पाले पाले खुदा को प्यारे हो गए। आज हम उत्तर भारतीय सुबह सुबह का नाश्ता दही जलेबी के साथ करते हैं और शाम की चाय समोसे के साथ। पर ये दोनों भारतीय नहीं हैं। जलेबी १३वीं १५वीं की सदी में तो १३वीं १४वीं सदी के मध्य ईरान (प्राचीन फ़ारस से आया। हम अपनी अर्थव्यवस्था को वैकल्पिक व्यवस्था की ओर ले जाएं। पूरी तरह से विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान शेखचिल्ली की सोच का द्योतक हो सकता है। पहले हम विकल्प दें।

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