गोदी मीडिया बनाम विरोधी मीडिया ?

पत्रकारिता का अघोषित ‘‘राजेंद्र माथुर फार्मूला’’
अपनाइए, फिर तो आपको न कोई ‘‘गोदी मीडिया’’ 
कहेगा और न ही विरोधी मीडिया !
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सुरेंद्र किशोर
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नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक राजंेद्र माथुर के साथ मेरी सन 1983 में हुई एक बातचीत का विवरण से अपनी बात शुरू कर रहा हूं।(मैं इसे पहले भी लिख चुका हूं ,पर माफ कीजिएगा, यहां एक बार फिर लिखना जरूरी हैं) 
सन् 1983 के जून की बात है।
मैं नई दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर के आॅफिस में बैठा हुआ था।
मैं ‘जनसत्ता’ ज्वाइन करने के अपने निर्णय के बाद माथुर साहब से मिलने गया था।
जबकि, माथुर साहब चाहते थे कि मैं ‘नवभारत टाइम्स’ ज्वाइन करूं।
उससे पहले मैं भी द्विविधा में था।
पर,प्रभाष जोशी से मुलाकात के बाद मेरी द्विविधा समाप्त हो गई थी।
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मिलते ही माथुर साहब ने, जिन्हें हम आदर से रज्जू बाबू कहते थे, सवाल किया कि आपने हमारा अखबार ज्वाइन क्यों नहीं किया ?
मैंने उनसे कहा कि ‘‘आपका अखबार दब्बू है।
वह इंदिरा गांधी के खिलाफ नहीं लिख सकता।’’
मेरी इस बात पर उन्होंने कहा कि
‘‘ नहीं सुरेंद्र जी , यू आर मिस्टेकन।
मेरा अखबार दब्बू नहीं है।
आप इंदिरा जी के खिलाफ जितनी भी कड़ी खबरें लाकर मुझे दीजिए, मैं उसे जरूर छापूंगा।
पर, इंदिरा जी में बहुत से गुण भी हैं।
मैं उन्हें भी छापूंगा।’’
उन्होंने यह भी कहा कि ‘एक बात समझ लीजिए।
मेरा अखबार अभियानी भी नहीं है।’’
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साथ में यह भी
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एक अन्य अवसर पर राजेंद्र माथुर ने कहा था कि 
किसी प्रेस, उसके संपादक और पत्रकारों की स्वतंत्रता उतनी ही है जितनी स्वतंत्रता उस अखबार का मालिक अपने पत्रकारों को देता है।
हालांकि जितना देता है, उतनी भी स्वतंत्रता कम नहीं है बशत्र्तें 
संपादक-पत्रकार उसका सदुपयोग करंे।
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अखबार की आर्थिकी पर
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मीडिया के अंध आलोचक अखबार की आर्थिकी को भूल जाते हैं या उसके प्रति अनजान हैं।
यदि अखबार की एक प्रति 5 रुपए में बिकती है तो उसे तैयार करने में 15 से 20 रुपए लगते हैं।
दुनिया का यही एकमात्र उत्पाद है जो लागत खर्च से कम पर बिकता है।
अब सवाल है कि उसका घाटा पूरा करके उसके मालिक को उससे मुनाफा कैसे होता है ?(कोई अखबार मालिक देश में कोई क्रांति करने के लिए तो अखबार नहीं निकालता।उसे भी मुनाफा चाहिए।)
सरकारी-गैर सरकारी विज्ञापनों से उसका घाटा पूरा होता है।
जिस अखबार को सरकार विज्ञापन नहीं देती है या कम देती है,उसकी ओर से निजी विज्ञापनदाता भी उदासीन हो जाते हैं।
अब आप ही बताइए कि क्या कोई अखबार किसी सरकार के खिलाफ ऐसा अभियान चलाने का खतरा उठा सकता है ताकि प्रतिपक्षी दल उसे ‘‘गोदी मीडिया’’ न कहे ?
हां,अखबार राजेंद्र माथुर फार्मूला अपना सकता है।क्या उतने से आज के विरोधी नेता उस अखबार व उसके पत्रकारों को गोदी मीडिया कहना छोड़ देंगे ?
अब आप समझिए किसी अखबार को बाहर-भीतर कितनी समस्याओं को सामना करना पड़ता है।
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आप पूछिएगा कि तो क्या आज गोदी मीडिया अस्तित्व में नहीं है ?
मैं प्रति सवाल करूंगा--आजादी के तत्काल बाद से ही क्या हर समय गोदी मीडिया की मौजूदगी नहीं थी ?
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दैनिक सर्चलाइट(पटना) को बिहार सरकार कुछ अन्य मीडिया की तरह ही गोदी मीडिया बनाने में विफल रह तो क्या नतीजा हुआ ?
सर्चलाइट के संपादक टी.जे.एस.जार्ज को 1966 की बिहार सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी लेखन के कारण जेल भिजवा दिया था।
उन पर राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाकर हजारीबाग जेल भेजा गया था। 
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प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने एक बड़े अखबार के संपादक बी.जी.वर्गीज को नौकरी से निकलवा दिया था।
प्रधान मंत्री नेहरू ने मशहूर पत्रकार दुर्गादास का
संबंध एक अखबार से विच्छेद करवा दिया था।
नेहरू के तीन मूर्ति भवन में टाइम्स आॅफ इडिया और इलेस्टेटेड वीकली आॅफ इंडिया का प्रवेश बंद था।नेहरू का प्रिय अखबार 
द हिन्दू था जो दिल्ली मे एक दिन बाद आता था।
इस तरह के बिहार के कई उदाहरण हैं।इन पंक्तियों को लेखक भी भुक्तभोगी हुआ है।
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और अंत में
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लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं,यह सब जानते हैं।
यदि मीडिया में हाल के वर्षों में कुछ गिरावट आई भी है तो क्या 
राजनीतिक कार्यपालिक, प्रशासनिक कार्यपालिका और न्यायपालिका की अपेक्षा कम गिरावट आई है या अधिक ,इस सवाल पर कभी कोई सर्वे हुआ है ?
मीडिया में दशकों तक काम करने का मेरा अनुभव यह कहता है अन्य तीन स्तम्भों की अपेक्षा मीडिया में कम गिरावट आई है।
अपवादों को छोड़कर पत्रकारों के बारे में अधिकतर नेताओं की राय यही रही है कि जो पत्रकार मेरे साथ नहीं है वह मेरे प्रतिद्वंद्वी के साथ है।
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