नेताजी के संघर्ष को अपनाना ही सच्ची श्रद्धांजलि 

चरण सिंह 
आज नेताजी मुलायम सिंह यादव की जयंती है। समाजवादी पार्टी के साथ ही देशभर के समाजवादी नेताजी के संघर्ष को याद कर रहे हैं। आज का समय समाजवादियों के संघर्ष को याद करने मात्र से काम नहीं चलने वाला है। समाजवादियों के संघर्ष को अपनाने की जरूरत है। नेताजी जी खुद तो संघर्ष के नाम से जाने जाते थे उनकी पार्टी समाजवादी पार्टी भी आंदोलन के नाम से जानी जाती रही है। नेताजी की जयंती पर समाजवादी पार्टी के नेता मंथन करें कि क्या आज समाजवादी पार्टी को आंदोलन की पार्टी कह सकते हैं ? क्या समाजवादी पार्टी मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका निभा पा रही है ? आज यदि समाजवादी पार्टी के नेता वास्तव में नेताजी को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहते हैं तो उनके संघर्ष को अपनाएं। जनहित में आंदोलन करें।
नेताजी के नाम से जाने जाने वाले मुलायम सिंह यादव कितने जुझारू और संघर्षशील थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नेताजी की पृष्ठभूमि एक गरीब किसान की रही। नेताजी की न तो कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि थी और न ही वह कोई बड़े वक्ता थे। चेहरा भी कोई बहुत आकर्षक नहीं था। इन सबके बावजूद उन्होंने अच्छे से अच्छे नेता को पटखनी दी और देश में जबर्दस्त मुकाम हासिल किया। नेताजी तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उनका पहला कार्यकाल 5 दिसंबर 1989 से 24 जून 1991 तक, दूसरा 4 दिसंबर 1993 से 3 जून 1995 तक, और तीसरा 29 अगस्त 2003 से 13 मई 2007 तक रहा। 1996 में जब तीसरा मोर्चा की सरकार बनी तो नेताजी रक्षा मंत्री रहे। उनके रक्षा मंत्री बने रहने की अवधि  1 जून 1996 से 19 मार्च 1998 तक रही। वह रक्षा मंत्री यूनाइटेड फ्रंट सरकार में थी। उस समय एच. डी. देवेगौड़ा और फिर आई. के. गुजराल प्रधानमंत्री थे।

मुलायम सिंह यादव की जिंदगी संघर्षों की अनगिनत दास्तानों से भरी हुई है। एक साधारण किसान परिवार में जन्मे इस समाजवादी योद्धा ने पहलवानी के अखाड़े से निकलकर राजनीति के मैदान में कदम रखा और शोषित-पीड़ित वर्गों के लिए जीवनभर लड़ाई लड़ी। उनकी कहानी न सिर्फ व्यक्तिगत मेहनत की मिसाल है, बल्कि सामाजिक न्याय, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों की जीवंत गाथा भी।

 गरीबी और मेहनत की नींव

मुलायम सिंह यादव का जन्म 22 नवंबर 1939 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के सैफई गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता सुघर सिंह यादव एक साधारण किसान थे, जो उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे, जबकि मां मूर्ति देवी घर संभालतीं। पांच भाई-बहनों में से एक, मुलायम सिंह को बचपन से ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सैफई से करीब 8 किलोमीटर दूर शिकोहाबाद के आदर्श कृष्ण कॉलेज जाने के लिए वे रोजाना पैदल चलते थे। साथ में दोस्तों की टोली होती, लेकिन रास्ते की धूल और थकान कभी उनके हौसले को नहीं तोड़ सकी। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने कुश्ती के दांव-पेंच सीखे। दंगल में तगड़े पहलवानों को चंद मिनटों में चित करने का हुनर हासिल किया। यहीं से सियासत के बुनियादी गुर भी मिले, जैसे चरखा घुमाना और सामाजिक मुद्दों पर बहस करना।

शिक्षा पूरी करने के बाद, 1963 में वे करहल के जैन इंटर कॉलेज में राजनीति विज्ञान के शिक्षक बने। आगरा विश्वविद्यालय से एमए और बीटी करने वाले मुलायम साइकिल से स्कूल आ-जाते थे, लेकिन उनका मन राजनीति में लग गया। समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया और राज नारायण जैसे समाजवादी नेताओं से प्रेरित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। यह फैसला आसान नहीं था। एक स्थिर जीवन त्यागकर अनिश्चित राजनीति के रास्ते पर कूदना उनके पहले बड़े संघर्षों में से एक था।

राजनीतिक यात्रा: जेल से सत्ता तक का सफर

1967 में जसवंतनगर से पहली बार विधायक बनना मुलायम का राजनीतिक सफर का आगाज था। वे सोशलिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े। चौधरी नत्थू सिंह जैसे गुरुओं के मार्गदर्शन में आगे बढ़े। लेकिन रास्ता कांटों भरा था। 1975 की इमरजेंसी में उन्हें 19 महीने जेल काटनी पड़ी। यह वह दौर था जब इंदिरा गांधी की सरकार ने विपक्ष को कुचल दिया। जेल से निकलकर 1977 में जनता पार्टी सरकार में मात्र 38 साल की उम्र में सहकारिता मंत्री बने, जहां उन्होंने किसानों और पिछड़ों के हितों की रक्षा की।

1980 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन हार मानना उनकी फितरत में नहीं था। चौधरी चरण सिंह ने उन्हें विधान परिषद में मनोनीत करवाया, जहां वे 1982-1985 तक प्रतिपक्ष के नेता रहे। 1989 में जनता दल की लहर पर वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। यह उनकी पहली बड़ी जीत थी। यहां उन्होंने किसान कल्याण, पिछड़ा वर्ग आरक्षण (मंडल आयोग समर्थन) और सामाजिक न्याय पर जोर दिया, लेकिन 1991 में सरकार गिर गई। इस दौर में ऊंची जातियों का विरोध और राजनीतिक साजिशें उनके सबसे कठिन संघर्ष थे।

1992 में समाजवादी पार्टी (सपा) की स्थापना उनके साहस का प्रतीक बनी। 1993 में कांग्रेस समर्थन से फिर मुख्यमंत्री बने, और 2003 में तीसरी बार सत्ता संभाली। केंद्र में 1996-1998 तक रक्षा मंत्री रहे, जहां उन्होंने सैनिकों के शवों को युद्ध क्षेत्र से लाने की परंपरा शुरू की। कुल मिलाकर, वे 10 बार विधानसभा और 7 बार लोकसभा के सदस्य बने। लेकिन हर सफलता के पीछे संघर्ष था।
1990 के अयोध्या कांड में कारसेवकों पर गोली चलवाने के फैसले से उन्हें ‘मुल्ला मुलायम’ का ताना मिला, जिसने हिंदू वोटरों में नाराजगी पैदा की। मंडल आयोग का समर्थन करने से ऊंचे वर्गों का विरोध झेला, और परिवारवाद के आरोपों से जूझते रहे।

शोषित वर्गों के लिए अनवरत लड़ाई : सिद्धांतों का प्रतीक

मुलायम सिंह के संघर्ष का मूल था राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता। वे शोषित-पीड़ित वर्गों, खासकर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अल्पसंख्यकों और किसानों के हितों के लिए जीवन समर्पित कर दिए। उत्तर प्रदेश में ओबीसी को राजनीति में ऊंचा उठाया, सामाजिक चेतना जगाई। उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास योजनाओं को मजबूत किया—जैसे लैपटॉप वितरण, कन्या विद्या धन जैसी स्कीमें। समाजवाद उनके लिए ‘सबका साथ, सबका विकास’ था, बिना भेदभाव के। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद दंगों को दबाने से लेकर भाजपा को सत्ता से दूर रखने तक, हर कदम पर उन्होंने सद्भाव की लड़ाई लड़ी। 10 अक्टूबर 2022 को 82 वर्ष की आयु में इस समाजवादी योद्धा का निधन हो गया।
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