इंदिरा गांधी के समय शुरू हुआ प्रचलन

अब पार्टी नहीं, नेता के चेहरे पर मिलते हैं वोट

अभिजीत / रामनरेश

पटना । आजादी के बाद से 1967 तक के चुनाव में लोग वोट के लिए पार्टी का चयन उसकी विचारधारा के आधार पर करते थे। लेकिन इंदिरा गांधी के समय शुरू हुआ चेहरे पर चुनाव 1971 से शुरू हुआ और आज शिद्दत से महसूस किया जा रहा है।
लगातार दो आम चुनाव बीजेपी ने नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़े और पार्टी सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गई। इसे लेकर नरेंद्र मोदी के नाम की चर्चा अगर समर्थकों के अलावा उनके विरोधियों की जुबान पर भी है तो यह मोदी की उस ताकत को साबित करता है, जो उन्हें ब्रांड बताने को बाध्य करती है।
आजादी के बाद से 1967 तक के चुनाव में लोग वोट के लिए पार्टी का चयन उसकी विचारधारा के आधार पर करते थे। उनका मत किसी नेता को नजर में रख कर नहीं पड़ता था। यह ट्रेंड 1971 से शुरू हुआ और आज शिद्दत से महसूस किया जा रहा है। पहली बार 1971 में लोगों ने बांग्लादेश बनाने में इंदिरा गांधी की भूमिका को ध्यान में रख कर उनके नाम पर वोट किया था। 1977 के आम चुनाव में भी इंदिरा के नाम पर ही कांग्रेस ने चुनाव लड़ा।
दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों ने इंदिरा के खिलाफ जनता पार्टी बना कर जो गोलबंदी की, उसके नेता के रूप में जय प्रकाश नारायण का चेहरा लोगों के दिमाग में था। इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं। जिन लोगों ने 1971 में दिल खोल कर इंदिरा का साथ दिया था, वे उनकी इमरजेंसी की त्रासदी से तबाही के कारण 1977 में जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की ओर मुखातिब हो गए। पर, यहां भी चेहरे पार्टियों पर भारी पड़ गए। कांग्रेस का नाम तो सब जानते थे, पर नवगठित जनता पार्टी का नाम तो अधिकतर लोगों ने पहली बार सुना था। अलबत्ता इंदिरा के खिलाफ आंदोलन के नायक जेपी को सभी जान गए थे। जेपी के नाम पर ही कांग्रेस के खिलाफ मतदाताओं का ध्रुवीकरण हुआ था।
यह अलग बात है कि जनता पार्टी की सरकार ज्यादा दिन नहीं चली और 1980 में मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गई। तब भी कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के नाम पर ही चुनाव लड़ा और सत्ता में वापसी की। राजीव गांधी को 1984 पहली बार ऐतिहासिक जीत मिली तो साए के रूप में इंदिरा गांधी का ही चेहरा था। कांग्रेस को शिकस्त देकर 1989 में जनता दल की सरकार भी वीपी सिंह के चेहरे पर ही बनी थी। भाजपा तो चेहरे पर ही चुनाव लड़ती रही है। पहले अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा का चेहरा होते थे तो 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के चेहरे पर पार्टी चुनाव लडती रही है। कांग्रेस ने भी बीच के 10 साल की अवधि में सोनिया गांधी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ा था। भले ही पीएम मनमोहन सिंह बने। 2014 और 2019 में कांग्रेस ने राहुल गांधी का चेहरा सामने रख कर चुनाव लड़ा। उनका सक्सेस रेट सभी को पता है। उन्होंने कांग्रेस को 2014 में 44 सीटों तो 2019 में 52 सीटों पर सिमटा दिया।
जिस नेता के चेहरे पर उसकी पार्टी को लगातार बढ़त के सफलता मिली हो, उसे ब्रांड बताना अतिशयोक्ति नहीं। मोदी के चेहरे पर भाजपा 2014 में 283 सीटें पा गई तो 2019 में 303 सीटों पर पहुंच गई। 2024 में विपक्ष का कोई सर्वस्वीकार्य चेहरा नहीं है। यहां तक कि कोई चेहरा ही विपक्षी गठबंधन ने अभी तक नहीं चुना है। कहने को कांग्रेस गठबंधन का नेतृत्व कर रही है, पर जय प्रकाश नारायण की तरह विपक्ष ने कोई चेहरा न देकर 1971 के पहले की स्थिति पैदा कर ली है। यह जानते हुए भी कि बिना चेहरे का चुनाव जीतना अब मुश्किल है, इंडिया ब्लॉक ने यह भूल कर दी है।

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