दुनिया के सभी राष्ट्रों का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप होना ही विश्व कल्याण के लिए प्रासंगिक होगा : अजय खरे

धर्म निजी आस्था का विषय, राष्ट्र की अवधारणा तय करने का नहीं

 

रीवा। समता सम्पर्क अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि धर्म नितांत निजी आस्था का विषय है। धर्म के आधार पर किसी राष्ट्र के गठन की अवधारणा को कदापि सही नहीं ठहराया जा सकता है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी आदि विभिन्न धर्म और सम्प्रदायों के आधार पर बनाए जाने वाले किसी भी राष्ट्र के गठन की बात किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। किसी भी देश में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक धार्मिक आबादी के आधार पर अपने नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है। किसी भी धर्म और संप्रदाय के लोगों के साथ दोयम दर्जे जैसा दुर्व्यवहार अनावश्यक और आपत्तिजनक है। धर्मनिरपेक्षता (Secularism) एक ऐसा विचार और सिद्धांत है जो राज्य (सरकार) और धर्म को अलग-अलग रखने की व्यवस्था सुनिश्चित करता है। धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत राज्य का अपना कोई आधिकारिक धर्म नहीं होता है। राज्य में विभिन्न धर्मो के लोग रहते हैं। देश आस्तिक और नास्तिक सभी का है। राज्य सभी धर्मों और विचारों के प्रति तटस्थ रहकर सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता प्रदान करता है। श्री खरे ने बताया कि समाजवादी चिंतक डॉ राम मनोहर लोहिया ने राजनीति को अल्पकालिक धर्म और धर्म को दीर्घकालीन राजनीति कहा था। दरअसल धार्मिक मूल्य अच्छाई को स्थापित करते हैं और राजनीति बुराई के खिलाफ एक सशक्त अभियान है। यह भारी विडंबना है कि धर्म और राजनीति का दायरा काफी संकुचित होता जा रहा है। धार्मिक संकीर्णता से पाखंडवाद पनपता है वहीं राजनीति में गिरावट से कलह और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। धर्म और राजनीति के उद्देश्य अच्छे होते हुए भी जब उनके बीच समन्वय का अभाव या संतुलन बिगड़ता है तो सांप्रदायिकता और अराजकता को बढ़ावा मिलता है। सरकारी कामकाज में धर्म या धार्मिक संस्थानों का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता के रूप में हर व्यक्ति को अपना धर्म मानने, आचरण करने और प्रचार करने की आजादी होती है। लेकिन दूसरे धर्म के प्रति कडुवाहट , कट्टरता और दुराग्रह फैलाने की इजाजत नहीं दी जा सकती । राज्य किसी एक धर्म को विशेष दर्जा नहीं दे सकता और अपने नागरिकों के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। इसका उद्देश्य धार्मिक आधार पर समाज को बांटने के बजाय समानता और शांति को बढ़ावा देना है। भारत में, इसे “पंथनिरपेक्षता” के रूप में भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों के प्रति समभाव (बराबर सम्मान) रखता है, न कि वह धर्म-विरोधी है। श्री खरे ने कहा कि धर्म को लेकर राज्य की भूमिका निष्पक्ष, तटस्थ और न्यायपूर्ण होना चाहिए। दुनिया के सभी राष्ट्रों का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप होना ही विश्व कल्याण के लिए प्रासंगिक होगा, इस बात की पुरजोर कोशिश होना चाहिए।

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