“संघ और स्त्रियाँ: सेविका समिति से शताब्दी तक की यात्रा”

सितंबर में आयोजित व्याख्यानमाला के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि आज महिलाओं की भागीदारी समाज और राष्ट्र निर्माण में पहले से कहीं अधिक आवश्यक है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि स्त्री-शक्ति केवल परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी उसकी बराबरी की भूमिका होनी चाहिए। भागवत ने कहा कि “मातृशक्ति के बिना राष्ट्र अधूरा है।” उन्होंने इस पर ज़ोर दिया कि भारतीय संस्कृति में नारी को सदा पूजनीय और निर्णायक स्थान दिया गया है, इसलिए संघ परिवार की शाखाओं और गतिविधियों में महिलाओं का सक्रिय योगदान भविष्य की दिशा तय करेगा।

 

डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक महत्त्वपूर्ण संगठन के रूप में स्थापित है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित यह संस्था मूलतः पुरुष swayamsevaks के लिए बनी थी। इसकी शाखाओं, अनुशासन और विचारधारा ने धीरे-धीरे भारतीय राजनीति और समाज पर गहरा असर डाला। परन्तु जब हम महिलाओं की भूमिका की ओर देखते हैं, तो तस्वीर कुछ अलग मिलती है। आरएसएस के समानान्तर 1936 में जन्मी “राष्ट्र सेविका समिति” ने ही स्त्रियों के लिए रास्ता खोला। आज जब संघ अपनी शताब्दी मना रहा है, तब इस यात्रा पर नज़र डालना ज़रूरी है कि स्त्रियों की भागीदारी कहाँ से शुरू हुई और 2025 तक वह किस मुकाम तक पहुँची।

 

 

शुरुआती दौर: 1925 से 1936

 

 

संघ की स्थापना 1925 में नागपुर में हुई। यह संगठन अनुशासन, परेड, शाखा और राष्ट्रवाद पर आधारित था। लेकिन इसकी संरचना पुरुष प्रधान रही। हेडगेवार स्वयं मानते थे कि स्त्रियों को अलग मंच चाहिए, क्योंकि उस समय के सामाजिक परिवेश में स्त्रियों का सीधे पुरुष शाखाओं में आना सहज नहीं माना जाता था। इसी पृष्ठभूमि में 1936 में लक्ष्मीबाई केलकर ने विजयादशमी के दिन वर्धा में “राष्ट्र सेविका समिति” की स्थापना की। हेडगेवार ने भी इस पहल का स्वागत किया और सुझाव दिया कि महिलाएँ अपनी संस्था चलाएँ, ताकि वे अपनी शक्ति, संस्कृति और नेतृत्व को स्वतंत्र रूप से विकसित कर सकें। इस तरह महिलाओं की भागीदारी औपचारिक रूप से शुरू हुई।

 

सेविका समिति की स्थापना और शुरुआती संघर्ष

 

1939 में पहली बार समिति ने प्रशिक्षण वर्ग आयोजित किया। धीरे-धीरे अलग-अलग प्रांतों में इसकी शाखाएँ बनने लगीं। समिति का उद्देश्य केवल राष्ट्रवादी विचार फैलाना नहीं था, बल्कि स्त्रियों में ‘मातृत्व, कर्तृत्व और नेतृत्व’ (मातृत्व, कर्र्तृत्व, नेत्रृत्व) जैसे गुणों का विकास करना भी था। इसमें शारीरिक प्रशिक्षण, योग, गीत, खेल, अनुशासन और समाज सेवा शामिल किए गए। आज़ादी के आंदोलन में भी समिति की महिलाओं ने परोक्ष रूप से भूमिका निभाई। परन्तु उनकी गतिविधियाँ मुख्यतः सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों तक सीमित रहीं।

 

1940 से 1970 का दशक: विस्तार की ओर

 

स्वतंत्रता के बाद के दशकों में समिति का नेटवर्क बढ़ा। लक्ष्मीबाई केलकर की मृत्यु (1978) तक संगठन कई राज्यों में फैल चुका था। उनके बाद सरस्वती आपटे प्रमुख संचालिका बनीं। इस समय तक शाखाओं की संख्या हज़ारों में पहुँच गई थी। समिति का जोर महिला शिक्षा, संस्कार, और सेवा परियोजनाओं पर रहा। आपातकाल (1975–77) में समिति से जुड़ी महिलाओं ने विरोध प्रदर्शनों में भी भाग लिया। इस दौर ने उन्हें राजनीतिक रूप से अधिक सचेत और सक्रिय बनाया।

 

1980–2000: आधुनिकता और परम्परा का संगम

 

90 के दशक में जब भारतीय राजनीति में भाजपा और संघ परिवार का प्रभाव बढ़ने लगा, तो महिलाओं की भागीदारी भी चर्चा में आने लगी। समिति ने इस समय शहरी और पेशेवर महिलाओं तक पहुँच बनाने की कोशिश की। महिला शिक्षिकाएँ, चिकित्सक और नौकरीपेशा स्त्रियाँ समिति के कार्यक्रमों से जुड़ने लगीं। 1994 में उषाताई चाटे और 2006 में प्रमिलाताई मेढे प्रखर नेतृत्व के रूप में सामने आईं। इन नेताओं ने महिला शाखाओं को आधुनिक मुद्दों—जैसे कामकाजी महिलाओं की चुनौतियाँ, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार में संतुलन—से जोड़ा।

 

2012 से आगे: शांथक्का का नेतृत्व

 

2012 में वेंकट्रामा शांता कुमारी, जिन्हें लोकप्रिय रूप से “शांथक्का” कहा जाता है, राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख संचालिका बनीं। उनका जन्म 1952 में हुआ और वे लंबे समय से संघ परिवार के कार्य में सक्रिय थीं। उनके नेतृत्व में समिति ने अपना विस्तार और तेज़ किया। आज समिति के पास चार से पाँच हज़ार शाखाएँ हैं, जो लगभग 800 से अधिक जिलों में फैली हुई हैं। यद्यपि सटीक आँकड़े संगठन सार्वजनिक नहीं करता, लेकिन अनुमान है कि लाखों महिलाएँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़ी हुई हैं। समिति शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, छात्रावास और महिला सशक्तिकरण परियोजनाएँ चला रही है। शहरी महानगरों में भी इसकी शाखाएँ सक्रिय हो रही हैं।

 

संघ और महिला प्रश्न

 

संघ के भीतर महिलाओं को औपचारिक सदस्यता या नेतृत्व स्थान नहीं दिया गया है। आरएसएस की शाखाएँ केवल पुरुषों के लिए ही हैं। महिलाएँ केवल समिति के माध्यम से संघ के विचारधारा संसार का हिस्सा बनती हैं। आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था महिलाओं को मुख्यधारा से बाहर रखती है। वे पुरुषों के बराबर निर्णयकारी पदों पर नहीं पहुँच पातीं। परन्तु समर्थकों का मत है कि अलग संगठन होने से महिलाएँ स्वतंत्र रूप से नेतृत्व और गतिविधियाँ विकसित कर पाती हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कई बार कहा है कि महिलाओं की भागीदारी “प्राकृतिक रूप से” बढ़ रही है। परन्तु अब भी नेतृत्व संरचना में असमानता साफ दिखाई देती है।

 

वर्तमान स्थिति (2025)

 

संघ अपनी शताब्दी मना रहा है। उसके लगभग 83,000 शाखाएँ देशभर में सक्रिय बताई जाती हैं। वहीं राष्ट्र सेविका समिति की शाखाएँ भी लगातार बढ़ रही हैं। समिति अब गाँवों के साथ-साथ महानगरों में भी काम कर रही है। इसके प्रशिक्षण वर्गों में स्कूली छात्राओं से लेकर पेशेवर महिलाएँ तक भाग ले रही हैं। 2025 में समिति का चेहरा परम्परा और आधुनिकता का मिश्रण है—जहाँ एक ओर मातृत्व और परिवार आधारित मूल्य हैं, वहीं दूसरी ओर समाज सेवा और महिला नेतृत्व के अवसर भी हैं। समिति ने लाखों महिलाओं को संगठित कर आत्मविश्वास और सामूहिकता दी। शिक्षा, सेवा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से समाज पर ठोस असर पड़ा। महिलाओं को नेतृत्व और प्रबंधन का अवसर मिला। महिलाएँ संघ की मुख्य धारा (आरएसएस) में निर्णयकारी भूमिकाओं से बाहर रहीं। संगठन का वैचारिक ढाँचा महिलाओं को परम्परागत भूमिकाओं तक सीमित करता है। आधुनिक नारीवादी विमर्श से समिति का दृष्टिकोण टकराता है, क्योंकि वह स्वतंत्रता और समानता की बजाय मातृत्व और संस्कृति पर ज़ोर देती है।

सितंबर 2025 में आयोजित व्याख्यानमाला के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि आज महिलाओं की भागीदारी समाज और राष्ट्र निर्माण में पहले से कहीं अधिक आवश्यक है। व्याख्यानमाला में यह भी कहा गया कि 2025 का भारत उस मुकाम पर खड़ा है, जहाँ महिला नेतृत्व केवल “पूरक” नहीं बल्कि “निर्णायक” भूमिका निभा रहा है। वक्ताओं ने यह भी जोड़ा कि आधुनिक शिक्षा, तकनीक और आर्थिक आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में महिलाएँ जिस तरह से आगे बढ़ रही हैं, संघ परिवार को भी उसी अनुरूप अपनी संरचना और कार्यपद्धति को और खुला बनाना होगा। व्याख्यानमाला में अन्य वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और विचारकों ने भी महिला नेतृत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कैसे राष्ट्र सेविका समिति की महिलाएँ दशकों से शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में काम कर रही हैं। यह तर्क दिया गया कि यदि 1925 में संघ की नींव रखी गई थी, तो उसी दशक में महिलाओं के लिए समानांतर संगठन की स्थापना इस बात का प्रमाण है कि महिलाओं की उपस्थिति को शुरुआत से ही महत्वपूर्ण माना गया।

1925 से 2025 की यात्रा दिखाती है कि संघ की विचारधारा से प्रेरित महिलाओं ने अपना अलग संगठन खड़ा कर लिया और उसे राष्ट्रीय स्तर तक फैलाया। लक्ष्मीबाई केलकर से लेकर शांथक्का तक यह सिलसिला निरंतर चला है। आज जब भारतीय समाज में महिलाएँ राजनीति, शिक्षा, व्यवसाय और सेना तक में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं, तब यह सवाल और महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि—क्या भविष्य में महिलाएँ सीधे संघ की शाखाओं और नेतृत्व में भी शामिल होंगी, या वे हमेशा समानान्तर संगठन तक ही सीमित रहेंगी?संघ की शताब्दी महिलाओं की इस यात्रा का पड़ाव भी है—एक यात्रा जिसमें परम्परा, अ नुशासन, सेवा और नेतृत्व का संगम है, लेकिन समानता और सहभागिता की चुनौती अब भी शेष है।

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