मार्कण्डेय सिंह तथा बहुजन नेता कांशीराम की फकीरी!

प्रोफेसर राजकुमार जैन

मेरे साथी मार्कण्डेय सिंह की 12वीं पुण्यतिथि है। बनारस यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष रहे मार्कण्डेय सिंह जैसे जमीनी, लड़ाकू, संगठनकर्ता, जंहा एक आदमी भी अपनी विचारधारा या जानकारी का ना हो वहां बिना पैसे धेले जेब में हुए सभा, धरना प्रदर्शन, संगठन को कुछ ही समय में खड़ा करने की कुव्वत तथा कला के माहिर खिलाड़ी भी थे। ‘समाजवादीयुवजनसभा (‘सोशलिस्टो का युवा संगठन) से लेकर जनता पार्टी की युवा शाखा, ‘युवा जनता’, जनता पार्टी से उनका कई सालों तक बहुत नजदीकी का साथ रहा था। मयाकृष्णन अध्यक्ष थे, वे और मैं युवा जनता के महासचिव भी रहे थे। युवा जनता के दो हिस्सों में बट जाने के बाद भी प्रोफेसर विनय कुमार की अध्यक्षता में बनी युवा जनता के भी मैं और वे महासचिव चुने गए।

अपने जमाने के मशहूर धावक रहे मारकंडेय सिंह से मेरी मुलाकात शिमला के सिसील होटल में बनारस यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधि के रूप में शिरकत करने के लिए जब वे ठहरे हुए थे हुई थी। उस समय वह बुशर्ट तथा पैंट पहने हुए थे परंतु बहुत जल्दी ही उन्होंने एक देहाती युवक के बाने खद्दर का कुर्ता, धोती जाकिट को धारण कर लिया। एक खांटी सोशलिस्ट होने के नाते देश भर में दौरा कर संगठन खड़ा करने के लिए भूखे प्यासे, पैदल, साइकिल बस, रेल, जहाज में बिना किसी अटैची बिस्तरबंद लिए एक झोले में अपना सारा साजो-सामान लेकर दौरा करते थे। केंद्र से लेकर सुबे के अनेकों मंत्रियों, एमपी एमएलए उनकी शख्सियत से वाकिफ रहते तथा डरते थे। क्योंकि अपने लिए तो कुछ मांगना उनकी फितरत में था ही नहीं, परंतु जरा भी अकड़, बेमानी, कार्यकर्ताओं की बेज्जती तथा पार्टी विचारधारा के खिलाफ कार्य देखते तो उसके खिलाफ मुहिम, आंदोलन करने में भी उन्हें गुरेज नहीं था। शिमला के रिज मैदान में राजनारायण जी की सभा भी उनकी जिद्द के कारण हुई थी। उसी को बहाना बनाकर राजनारायण जी को केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाया गया।
ईमानदारी का आलम इतना था, जब कभी दौरा करते साथी लोग अपने आप कुछ ना कुछ पैसे उनको देते। तो मार्कण्डेय सिंह खड़े-खड़े हिसाब लगाते की कितना किराया, नाश्ता पर्चे की छपाई बगैरहा पर पैसा खर्च होगा, दिए गए ₹50 में से फौरन ₹20 वापस कर देते, कई बार उनकी फटी हुई धोती को देखकर अथवा सर्दी में बिना गर्म कपड़े पहने हुए उन्हें देखकर उनके साथी उनको जबरन खादी भवन ले जाकर उनको कपड़ा भेंट करने का प्रयास करते तो वह बहुत ही जरूरी कपड़े स्वीकार करते और कहते इसमें ही काम चल जाएगा। केंद्र के कई मंत्री उनको खुश रखने की कोशिश करते,परंतु वह उनके कारनामों को उजागर करने में ज्यादा रुचि रखते। पांच पैसे के पोस्टकार्ड पर वे सैकड़ो की तादाद में अपने आवागमन, क्रियाकलापों, अपने प्रोग्राम तथा राजनीतिक माहौल की खबरें भेजते रहते थे।
उनकी फांका मस्ती का आलम यह था कि विट्ठल भाई पटेल भवन के कमरे में सोशलिस्ट पार्टी का केंद्रीय दफ्तर चलता था, वहीं पर दिल्ली दौरे के वक्त वे पार्टी की ऑफिस के बैंचों पर गद्दी को मोड़कर तकिया लगाकर सो जाते। उन्हीं दिनों बहुजन नेता कांशीराम जी भी इस फकीरी के आलम में विट्ठल भाई पटेल भवन के एक कमरे में सिर के नीचे गद्दी मोड़ कर कुर्सियों को जोड़कर सोते हुए दलित आंदोलन की जड़े जमाने में खप रहे थे। सुबह के वक्त मार्कण्डेय तथा कांशीराम जी दोनों एक साथ विट्ठल भाई पटेल भवन के बाहर सड़क पर चाय वाले के यहां काशीराम जी लुंगी पहने तथा मार्कण्डेय सिंह धोती पहने हुए देश दुनिया के सियासी मंजर पर बतियाते हुए चाय पीते। कांशीराम जी चाहते थे कि वह उनके अभियान में शामिल हो परंतु मारकंडे भाई हमेशा अपनी सोशलिस्ट तहरीक को आगे बढ़ाने में ही रुचि रखते थे।
साथी मार्कण्डेय की शख्सियत को एक बड़ी किताब में भी कलमबंद नहीं किया जा सकता। एक संपन्न किसान परिवार से संबंध रखने वाले मारकंडेय सिंह तमाम उम्र आंदोलनकारी ही बने रहे, एक वक्त ऐसा आया की मजबूरी में उन्हें फिर अपनी बची हुई खेती को करके अपना गुजर बसर करने पर मजबूर हो गए। वे चाहते तो बड़ी आरामदायक श्याम शौकत की जिंदगी गुजार सकते थे, परंतु अफसोस कानपुर में बस में बैठे हुए उनका इंतकाल हो गया।
ऐसे जांबाज, बेखौफ, सादगी, ईमानदारी के साथ-साथ साथियों के साथ खुलूश मोहब्बत का रिश्ता निभाने वाले साथी को याद करना, सियासत के उजले पक्ष को नमन करना है।

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