साहित्य का मंच या शिकार की मंडी?

नई लेखिका आई है — और मंडी के गिद्ध जाग उठे हैं

नई लेखिकाओं के उभार के साथ-साथ जिस तरह साहित्यिक मंडियों में उनकी रचनात्मकता की बजाय उनकी देह, उम्र और मुस्कान का सौदा होता है — यह एक गहरी और शर्मनाक सच्चाई है। मंच, आलोचना, भूमिका, सम्मान – सब कुछ एक जाल बन जाता है। यह संपादकीय स्त्री लेखन के नाम पर चल रही पाखंडी व्यवस्था को आईना दिखाता है, जहाँ लेखिका की कलम से ज़्यादा उसकी ‘उपस्थिति’ बिकती है। अब समय आ गया है कि साहित्य की दुनिया इस अंदरूनी शोषण को पहचाने और बदलने का साहस करे।

✍️ प्रियंका सौरभ

नई लेखिका जैसे ही साहित्य के आंगन में प्रवेश करती है, एक उत्सव-सा माहौल बनता है। वह कलम लेकर आई है — शब्दों को जीवन देने, अनुभवों को साझा करने और संवेदनाओं को स्वर देने के लिए। पर क्या केवल शब्दों की शक्ति ही काफी है इस जगत में टिके रहने के लिए?

नहीं। इस मंडी में उसकी लेखनी से पहले उसका चेहरा देखा जाता है। किताब से पहले उसकी उम्र पूछी जाती है। विचारों से पहले उसकी वाणी और मुस्कान पर चर्चा होती है। और दुर्भाग्यवश, यही वह बिंदु है जहाँ साहित्यिक क्षेत्र का स्याह सच उभरता है।

आज भी देश के तमाम साहित्यिक मंचों, गोष्ठियों और पत्रिकाओं में एक नारी लेखिका को ‘रचनाकार’ कम और ‘सौंदर्य’ अधिक समझा जाता है। वरिष्ठों की प्रशंसा के शब्दों में सराहना से अधिक ‘संकेत’ होते हैं। मंच पर बुलावा केवल कविता पाठ के लिए नहीं होता, बल्कि उस ‘नवयौवना’ ऊर्जा को भुनाने की एक शातिर कोशिश होती है।

“आप बहुत अच्छा लिखती हैं” कहने वाले बहुत होते हैं। लेकिन उनमें से कई की नज़रों में लफ्ज़ नहीं, लार होती है। गोष्ठी के बाद की पार्टियों में कविता का नहीं, शरीर का मूल्यांकन होता है। और जो लेखिका इन सबके लिए ‘ना’ कहती है, उसे ‘घमंडी’, ‘असहयोगी’, और ‘बदतमीज़’ कहा जाता है।

साहित्य की यह मंडी उस बौद्धिक आज़ादी की कब्रगाह बन चुकी है, जिसका स्वप्न लेकर कई स्त्रियाँ अपनी कलम उठाती हैं। नई लेखिका को मंच नहीं, मौन मिलते हैं। समर्थन नहीं, संशय मिलते हैं। उसके हर शब्द के पीछे मंशा तलाशने की कोशिश होती है — “किसके लिए लिखा?”, “किसके कहने पर?”, “किस इरादे से?”

यह वही समाज है जो एक ओर ‘मी टू’ आंदोलनों पर अख़बारों में कॉलम लिखता है, और दूसरी ओर साहित्यिक सम्मेलनों में युवा लेखिकाओं को एकांत में बुलाकर “व्यक्तिगत मार्गदर्शन” देने को तैयार हो जाता है।

इस मानसिकता ने न केवल नई प्रतिभाओं को कुचला है, बल्कि साहित्य के प्रति महिलाओं के विश्वास को भी तोड़ा है। लेखन की दुनिया को जिनका घर बनना था, वहां दरवाज़े बंद मिलते हैं — अगर वे ‘समझौता’ नहीं करतीं।

इतिहास गवाह है — अमृता प्रीतम, महादेवी वर्मा, मन्नू भंडारी, मृणाल पांडे, वंदना राग जैसी लेखिकाओं ने न केवल कलम चलाई, बल्कि उस पितृसत्ता के खिलाफ भी लिखीं जो साहित्य की गली में भी घर बनाए बैठी थी। उन्होंने यह रास्ता संघर्षों से सींचा, और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चेतना छोड़ी।

लेकिन फिर भी सवाल खड़ा होता है — क्यों आज भी नई लेखिका को अपनी गरिमा की रक्षा के लिए चुप रहना पड़ता है या लड़ना पड़ता है? क्यों अब भी वरिष्ठ पुरुष लेखकों के लिए ‘नारी-लेखन’ एक ‘आसान निशाना’ बना हुआ है?

कई बार तो लेखिका की लेखनी को ही पुरुष संरचना में ढालने की कोशिश की जाती है। “थोड़ा कम उग्र लिखो, ज्यादा संवेदनशील बनो, रोमांटिक कविताएं ज्यादा सराही जाती हैं” — ये सब नए नामों को सिखाने वाले ‘गुरुजन’ के परामर्श होते हैं। लेकिन सच तो ये है कि यह ‘अनुरूपता’ नहीं, बल्कि ‘अनुनय’ की मांग होती है।

एक अन्य पक्ष यह भी है कि जब कोई लेखिका सफल हो जाती है — तो उसकी सफलता का श्रेय उसके किसी ‘पुरुष मार्गदर्शक’ को दे दिया जाता है। जैसे उसकी प्रतिभा खुद उसकी नहीं थी, बल्कि किसी के ‘संपर्क’ और ‘संरक्षण’ से मिली हुई थी।

और जब वह इन चीज़ों से इनकार करती है — तो उसकी कविताओं की समीक्षा नहीं होती, बल्कि उसके चरित्र की। यही दोहरा मापदंड इस मंडी की रीढ़ बन गया है।

अब ज़रूरत है — इस व्यवस्था को सवालों के कटघरे में खड़ा करने की।
अब ज़रूरत है — कि हर नई लेखिका अपनी कविता में यह लिखे कि “मैं कोई गुलाब नहीं, जो सिर्फ़ सजने के लिए खिला हूँ — मैं वो काँटा हूँ जो तुम्हारे इरादों को चीर देगा।”

लेखिकाओं को एक-दूसरे की आवाज़ बनना होगा। उन्हें मंच साझा करने से अधिक, स्पेस साझा करना होगा — जहां वे एक-दूसरे को सुनें, समर्थन दें, और किसी को भी अकेले न छोड़ें।

प्रकाशक, संपादक, आयोजक — अब तुम्हारे लिए भी चेतावनी है। अगर तुम अपनी नीतियों को साफ़ नहीं करोगे, तो ये कलमें तुम्हारे नाम को स्याही से नहीं, आग से लिखेंगी।

यह मंडी, जो कभी विचारों की थी, आज बाजार बन गई है — जहां ‘स्त्री उपस्थिति’ बिकती है, ‘लेखनी’ नहीं।

पर यह बाज़ार भी एक दिन ढहेगा — जब हर लेखिका अपने भीतर के डर को मिटाकर मंच पर सिर्फ़ कविता नहीं, हक़ मांगेगी।

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