गंगाजल से नहीं, परमात्म-ज्ञान रूपी गंगाजल से धुलते हैं पाप : पूजा बहन

 

हमारा कर्म ही हमारे चरित्र की पहचान कराता।

सुभाष चंद्र कुमार
समस्तीपुर, पूसा। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा खुदीराम बोस पूसा स्टेशन रोड स्थित स्थानीय सेवा केंद्र पर आयोजित राजयोग मेडिटेशन शिविर के चौथे दिन कर्मों की गहन गति से परत दर परत पर्दा हटाते हुए ब्रह्माकुमारी पूजा बहन ने कहा कि कर्म करने के लिए हर एक मनुष्य आत्मा स्वतंत्र है किंतु कर्म करते ही उसके फल के बंधन में वह बंध जाती है। हर कर्म का फल, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, आज नहीं तो कल, इस जन्म में या अगले किसी जन्म में अवश्य मिलता ही है। कर्म से मनुष्य स्वयं को एक क्षण भी छुड़ा नहीं सकता।

उन्होंने कहा कि कर्म ही आत्मा का दर्शन कराने का दर्पण है। हमारा कर्म ही हमारे चरित्र की पहचान कराता है। अपने कर्मों के कारण ही आत्मा सुख या दुःख का अनुभव करती है। कर्म के बिना हम एक पल भी नहीं रहते लेकिन हर पल हमारे द्वारा किया जाने वाला कर्म हमारे भाग्य का निर्माण करता है। हमारे मन में उठने वाला एक विचार भी कर्म का एक सूक्ष्म रूप है।

जो कर्म हम आत्मिक स्मृति में स्थित होकर परमात्मा पिता की याद में करते हैं वह कर्म श्रेष्ठ कर्म अथवा सुकर्म कहलाता है। ऐसे कर्म का परिणाम अति सुखकारी, सर्व के लिए कल्याणकारी एवं सफलता प्रदान करने वाला होता है। इसी प्रकार जो कर्म किसी भी विकार के वशीभूत होकर किया जाता है, वह पापकर्म या विकर्म कहलाता है।

पिछले 63 जन्मों से पापकर्म करते-करते आत्मा बोझिल हो गई है। फलस्वरुप दुःख-चिंता-निराशा-भय उसके दैनिक जीवन का हिस्सा बन गये हैं। अब परमात्मा स्वयं हमें अपने पाप धोने की विधि सीखा रहे हैं। शिव भगवानुवाच: गंगा स्नान करने से आत्मा के पाप नहीं धुलते। यदि ऐसा होता तो पाप का प्रभाव कम होता जाता। लेकिन पाप तो दिनों दिन बढ़ते ही जा रहे हैं।

गंगाजल से शरीर की अशुद्धियां तो मिट सकती हैं लेकिन आत्मा पर चढ़ा हुआ पाप का मैल परमात्मा शिव की याद से ही उतर सकता है। जैसे स्नान करने से हल्कापन महसूस होता है, वैसे ही परमात्मा की याद का स्नान करने से आत्मा खुशी, हल्केपन, शांति, शक्ति और आनंद का अनुभव करती है। अभी इस एक जन्म में ईश्वर की मत पर श्रेष्ठ कर्मों के बीज बोकर हम 21 जन्मों तक स्वर्ग के राज्य-भाग्य के रूप में फल खाते रहते हैं।

उन्होंने कालचक्र के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि हर काम समय को ध्यान में रखकर ही किया जाता है और हर काम का एक निश्चित समय होता है। यदि सही समय पर सही कार्य नहीं किया गया तो समय ही कार्य की सफलता को नष्ट कर देता है। इसलिए वर्तमान समय की पहचान आवश्यक है। यह वह सृष्टि का महानतम कालखंड चल रहा है।

जब स्वयं भगवान इस धरा पर अवतरित होकर मानव के संस्कार को परिवर्तित कर इस संसार का परिवर्तन बड़ी तीव्र गति से कर रहे हैं। और यह प्रक्रिया बड़ी ही सुखकारी है क्योंकि स्वयं भगवान हमारे भाग्य तराशता है…. हमें अपनी श्रेष्ठ मत देकर श्रेष्ठ कर्म द्वारा इस थोड़े से समय में अपनी तकदीर की लंबी लकीर खींचने की कलम हमें थमा देता है। ‌

यह युग कलियुग अंत और सतयुग आदि के मध्य की वेला पुरुषोत्तम संगमयुग कहलाता है। एक इस युग में ही हम आत्माओं का परमात्मा से अनोखा मिलन होता है और हम पापात्मा से पुण्यात्मा-देवात्मा बनते हैं। अब इस युग का थोड़ा सा बचा वक्त भी बीता जा रहा है। इसलिए अभी नहीं, तो कभी नहीं।

उन्होंने लंबे समय से चली आ रही मान्यता पर से असत्य का पर्दा हटाते हुए बताया कि सत्यम् शिवम् सुंदरम् आकर हमें सत्य से अवगत कराते हैं कि मनुष्यात्मा 84 लाख योनियों में भ्रमण नहीं करती, अपितु अधिक से अधिक 84 जन्म लेती है। यदि 84 लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद मनुष्य योनि मिलती है तो इस योनि में किसी को बहुत दुःख और किसी को बहुत सुख क्यों? मनुष्यात्मा को सुख और दुःख भोगने के लिए किसी और योनि में जाने की आवश्यकता नहीं।

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