आरएसएस ने किया बीजेपी को नए प्रचारक न देने और अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप न करने का आरोप
नई दिल्ली। हाल ही में कुछ समाचारों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में दावा किया गया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय जनता पार्टी को नए प्रचारक न देने और संगठन में सीधा दखल न करने का फैसला किया है। आरएसएस के इस फैसले के बाद बीजेपी को बिहार विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है। आरएसएस की नाराजगी बीजेपी को लोकसभा चुनाव के पहले चरण में झेलनी पड़ी थी। पीएम मोदी दौड़े दौड़े नागपुर गए और आरएसएस को मनाया। आरएसएस बार बार उत्तर प्रदेश की घेराबंदी से भी नाराज है। गृह मंत्री अमित शाह की योगी के खिलाफ लॉबी तैयार करने और उससे विरोध कराने से आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत नाराज हैं।
दरअसल आरएसएस और बीजेपी नेतृत्व के बीच लोकसभा चुनाव से पहले से ही खींचतान चली आ रही है। मौजूदा समय में बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अभी तक न बनना और आरएसएस की उपेक्षा करना है। लोकसभा चुनाव के समय जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने कहा था कि बीजेपी अब “सक्षम” है और उसे RSS की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी पहले थी। इस बयान से RSS कार्यकर्ताओं में नाराजगी देखी गई, जिसके कारण 2024 के चुनावों में RSS की ओर से अपेक्षित उत्साह के साथ मतदान नहीं हुआ था। इससे बीजेपी को पूर्ण बहुमत हासिल करने में कठिनाई हुई और वह 240 सीटों पर सिमट गई।
RSS का रुख: RSS ने हमेशा खुद को एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत किया है, जो राजनीतिक गतिविधियों से दूरी बनाए रखता है। हालांकि, यह बीजेपी को वैचारिक और संगठनात्मक समर्थन देता रहा है, जिसमें प्रचारकों को बीजेपी में संगठन मंत्री के रूप में भेजना शामिल है। हाल के दावों के अनुसार, RSS ने अब अपने प्रचारकों को बीजेपी के लिए प्रचार कार्य में नहीं भेजने और संगठन में सीधा हस्तक्षेप न करने का निर्णय लिया है
मोहन भागवत, नरेंद्र मोदी, और अमित शाह के बीच हाल के समय में कोई प्रत्यक्ष या खुला विवाद सामने नहीं आया है, लेकिन कुछ मुद्दों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच मतभेद की चर्चा समय-समय पर होती रही है। ये मतभेद मुख्य रूप से नीतिगत मुद्दों, राजनीतिक रणनीति, या वैचारिक दृष्टिकोण को लेकर हो सकते हैं, क्योंकि RSS, BJP का वैचारिक मार्गदर्शक माना जाता है। हाल के कुछ संदर्भों और बयानों के आधार पर, निम्नलिखित बिंदु इस विषय पर प्रकाश डालते हैं:
मंदिर-मस्जिद विवाद पर मोहन भागवत का बयान
मोहन भागवत ने दिसंबर में पुणे में एक कार्यक्रम में मंदिर-मस्जिद विवादों पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हिंदुओं की आस्था का विषय था, लेकिन हर दिन नए विवाद खड़े करना (जैसे मथुरा, काशी, संभल में मस्जिदों के नीचे मंदिर होने के दावे) ठीक नहीं है। भागवत ने एकता और सद्भाव पर जोर देते हुए कहा कि ऐसे मुद्दों को उठाकर कुछ लोग “हिंदुओं के नेता” बनना चाहते हैं, जो देश के लिए उचित नहीं है।
विवाद का संदर्भ: इस बयान को कुछ विश्लेषकों और विपक्षी नेताओं ने BJP के शीर्ष नेतृत्व, विशेष रूप से नरेंद्र मोदी और अमित शाह, पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी के रूप में देखा। NCP नेता रोहित पवार ने कहा कि यह बयान BJP के बड़े नेताओं (मोदी, शाह, और योगी आदित्यनाथ) के लिए हो सकता है, जिससे RSS और BJP के बीच आंतरिक मतभेद की अटकलें शुरू हुईं।
प्रभाव: इस बयान ने सोशल मीडिया और मीडिया में चर्चा को जन्म दिया, जहां कुछ लोगों ने इसे BJP की आक्रामक हिंदुत्व नीति पर RSS की असहमति के रूप में देखा।
लोकसभा चुनाव 2024 के बाद RSS-BJP संबंध
उन्होंने मणिपुर हिंसा पर भी टिप्पणी की, जहां उन्होंने कहा कि मणिपुर में एक साल से शांति नहीं है, जिसे कुछ लोगों ने सरकार की नीतियों पर सवाल के रूप में देखा।
यह बयान BJP के कुछ नेताओं की आक्रामक राजनीतिक शैली और चुनावी रणनीति पर RSS की असहमति के रूप में देखे गए। RSS के कुछ नेताओं और पत्रिकाओं में भी BJP की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए।
अमित शाह का आंबेडकर विवाद
दिसंबर 2024 में अमित शाह के संसद में दिए गए एक बयान, जिसमें उन्होंने भीमराव आंबेडकर और कांग्रेस पर टिप्पणी की थी, ने विवाद खड़ा किया। विपक्ष ने इसे आंबेडकर का अपमान बताया और शाह के इस्तीफे की मांग की। इस दौरान कुछ X पोस्ट्स में दावा किया गया कि BJP इस विवाद से ध्यान हटाने के लिए मोहन भागवत के बयानों का सहारा ले रही थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हुआ कि भागवत का बयान इस संदर्भ में था या नहीं। इस विवाद में भागवत का नाम अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ा गया, लेकिन इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि यह RSS और BJP नेतृत्व के बीच सीधा टकराव था।
हाल की मुलाकातें और रणनीतिक चर्चा
अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद मोहन भागवत ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ दिल्ली में मुलाकात की थी। यह मुलाकात राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकी हमले के जवाबी कदमों पर चर्चा के लिए थी।
इस मुलाकात को कुछ विश्लेषकों ने RSS और BJP के बीच समन्वय के संकेत के रूप में देखा, लेकिन कुछ X पोस्ट्स में इसे RSS की ओर से सरकार को दिशा-निर्देश देने की कोशिश के रूप में भी देखा गया। इस संदर्भ में कोई खुला विवाद नहीं दिखा, लेकिन RSS की वैचारिक भूमिका और BJP की राजनीतिक रणनीति के बीच संतुलन की चर्चा रही।
RSS-BJP संबंधों पर व्यापक चर्चा
वैचारिक मतभेद: कुछ विश्लेषकों का मानना है कि RSS दीर्घकालिक वैचारिक लक्ष्यों (जैसे हिंदुत्व और सामाजिक एकता) पर ध्यान देता है, जबकि BJP अल्पकालिक राजनीतिक लाभ और चुनावी रणनीति पर केंद्रित रहती है।








