समाजवादी राजनीति का आधार विचार और संघर्ष होना चाहिए न कि सत्ता

नीरज कुमार

 

बिहार की राजनीति में एक सवाल बार-बार उठता है कि क्या राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को वास्तव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जरूरत है? समाजवादी दृष्टिकोण से देखें तो यह केवल चुनावी गणित का प्रश्न नहीं है, बल्कि राजनीतिक चरित्र, वैचारिक प्रतिबद्धता और जनविश्वास का भी सवाल है।
समाजवादी परंपरा हमेशा यह कहती रही है कि राजनीति का आधार विचार और संघर्ष होना चाहिए, न कि केवल सत्ता का समीकरण। राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस के वर्चस्व वाले दौर में भी यह कहा था कि कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या उसकी वैचारिक शिथिलता और संगठनात्मक ढीलापन है। आज बिहार की राजनीति में वही संकट और भी स्पष्ट रूप में दिखाई देता है। कांग्रेस का संगठन बिहार में लगातार कमजोर हुआ है। कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है, नेतृत्व निर्णायक नहीं दिखता, और सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसके चुने हुए प्रतिनिधियों की राजनीतिक प्रतिबद्धता पर बार-बार सवाल उठते हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब कांग्रेस के विधायक या सांसद सत्ता के दबाव या लालच में पाला बदलते दिखाई दिए। इससे जनता के बीच यह धारणा मजबूत हुई है कि कांग्रेस का संगठन संघर्ष की बजाय समझौते की राजनीति में अधिक विश्वास करता है।
समाजवादी राजनीति का मूल स्वभाव इससे बिल्कुल अलग रहा है। समाजवादी आंदोलन हमेशा संघर्ष, वैचारिक स्पष्टता और सामाजिक न्याय के आधार पर खड़ा हुआ। बिहार में मंडल राजनीति और सामाजिक परिवर्तन की जो धारा बनी, वह मुख्यतः समाजवादी विचारधारा की ही देन थी। इस दृष्टि से देखें तो राजद का सामाजिक आधार—पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक और गरीब तबकों की राजनीति—अपने आप में एक मजबूत सामाजिक गठबंधन है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब किसी दल के पास स्पष्ट सामाजिक आधार और मजबूत जनाधार हो, तो क्या उसे ऐसे सहयोगी की आवश्यकता है जिसका संगठन कमजोर हो और जिसके प्रतिनिधियों की स्थिरता पर भरोसा न किया जा सके?
समाजवादी दृष्टिकोण यह कहता है कि कमजोर और अवसरवादी सहयोगी कई बार आंदोलन की ऊर्जा को भी कमजोर कर देते हैं। गठबंधन तब ही मजबूत होता है जब उसमें शामिल दल वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध हों और राजनीतिक जोखिम उठाने का साहस रखते हों। यदि कोई दल केवल चुनाव के समय दिखाई दे और संकट के समय पाला बदल ले, तो वह गठबंधन की मजबूती की बजाय उसकी कमजोरी बन जाता है।
दूसरी ओर यह भी सच है कि भारतीय राजनीति में गठबंधन की मजबूरी भी है। भारतीय जनता पार्टी जैसी मजबूत और संसाधन सम्पन्न पार्टी के सामने विपक्षी दलों को व्यापक एकजुटता की जरूरत पड़ती है। लेकिन समाजवादी राजनीति हमेशा यह चेतावनी देती रही है कि सिर्फ अंकगणित से राजनीति नहीं चलती, उसके लिए रसायन भी चाहिए—और वह रसायन है विचार, संघर्ष और भरोसा।
बिहार की राजनीति आज इसी मोड़ पर खड़ी है। यदि कांग्रेस अपने संगठन को मजबूत नहीं करती, वैचारिक स्पष्टता नहीं लाती और अपने जनप्रतिनिधियों को स्थिरता व प्रतिबद्धता का संदेश नहीं देती, तो भविष्य में उसके सहयोगियों के भीतर यह सवाल और तेज़ी से उठेगा कि क्या उसके साथ चलना वास्तव में राजनीतिक रूप से लाभकारी है। समाजवादी नजरिए से अंतिम निष्कर्ष यही है कि राजनीति का असली आधार जनता का विश्वास और विचार की मजबूती है। जिस दल के पास यह दोनों हैं, वह अपने दम पर भी मजबूत हो सकता है। और जिस दल में यह कमजोर पड़ जाए, वह बड़े से बड़ा इतिहास होने के बावजूद धीरे-धीरे हाशिए पर चला जाता है।

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