अमित शाह द्वारा पूर्व न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी पर लगाए गए आरोप निराधार

अमित शाह देश से माफी मांगे

क्या सलवा जुडूम का विरोध करने वाले राज्य सभा के उपसभापति पर कार्यवाही की हिम्मत दिखाएगी सरकार?

किसान संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष, पूर्व विधायक डॉ सुनीलम ने गृहमंत्री अमित शाह के द्वारा उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पूर्व न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी को नक्सलवाद से जोड़ने वाले बयान को असत्य, भ्रामक एवं विपक्षी पार्टियों को नक्सलवादी विचार के साथ जोड़कर बदनाम करने का षड्यंत्र बतलाते हुए कहा है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के 8 न्यायाधीशों, 3 मुख्य न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालय के 7 न्यायाधीशों ने अमित शाह के बयान को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के निष्पक्ष फैसलों पर विपरीत असर डालने वाला बयान बताते हुए कहा है कि सलवा जुडूम को लेकर दिया गया फैसला किसी भी मायने में नक्सलवाद का समर्थन नहीं करता।
डॉ सुनीलम ने कहा कि अमित शाह को पूर्व न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी के चरित्र हनन करने वाले बयान को वापस लेकर न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी और देशवासियों से गलत बयानी के लिए माफी मांगनी चाहिए।
डॉ सुनीलम ने कहा कि सलवा जुडूम अभियान के दौरान मारे गए निर्दोष और निहत्थे आदिवासियों को लेकर सरकार को श्वेत पत्र जारी करना चाहिए तथा निर्मम हत्याओं के लिए जिम्मेदार दोषियों पर हत्या के मुकदमें चलाए जाने चाहिए।
डॉ सुनीलम ने कहा कि इन हत्याओं के खिलाफ बोलने वाले सांसदों, विभिन्न पार्टी के नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को नक्सलवाद – माओवाद से जोड़ना गैर लोकतांत्रिक और असंवैधानिक है । यह सरकार द्वारा तथा अर्धसैनिक बलों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों को जायज ठहराने का प्रयास है तथा आम लोगों के बीच यह डर पैदा करने का प्रयास है कि जो भी बस्तर, कश्मीर या पूर्वोत्तर में एक्स्ट्राज्यूडिशियल हत्याओं का विरोध करेगा उसे नक्सलवाद और माओवाद से जोड़कर कार्यवाही की जाएगी या उस पर अर्बन नक्सल का लेबल चिपका दिया जाएगा।
डॉ सुनीलम ने कहा कि वर्तमान राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने सलवा जुडूम अभियान के दौरान की गई हत्याओं का विरोध किया था।
डॉ सुनीलम ने भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देते हुए कहा कि यदि हिम्मत है तो वह हरवंश नारायण सिंह पर कार्यवाही करके दिखाए।
किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष ने देश के नागरिकों से अपील की कि वे सरकार की इस साजिश को समझें और असफल करें।
डॉ सुनीलम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर बी. सुदर्शन रेड्डी का कार्यकाल 2007 से 2011 के बीच रहा, उन्होंने जो फैसले दिए, वे गहरा असर छोड़ गए। उन्होंने दिखाया कि एक जज सिर्फ कानून का तकनीकी व्याख्याता नहीं होता, बल्कि वह संविधान की आत्मा का संरक्षक भी होता है। उनके दिए फैसले भारतीय लोकतंत्र और संविधान की आत्मा से जुड़े हुए हैं। न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति सुरेश काटजू की बेंच ने सलवा जुडूम के पूरे प्रयोग को असंवैधानिक करार दिया। उनका तर्क था, सरकार अपने ही नागरिकों को हथियार देकर उन्हें मौत के मुंह में नहीं धकेल सकती। यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य की है, इसे आदिवासियों पर नहीं डाला जा सकता। कोर्ट ने आदेश दिया कि तुरंत सभी एस पी ओ को निरस्त किया जाए और उनसे हथियार वापस लिए जाएं।
सलवा जुडूम को खत्म करने के फैसले से उस समय लाखों आदिवासियों की जान बची, उन्हें कानूनी सुरक्षा मिली।
इसी तरह 2008-09 के दौरान स्विस बैंकों और विदेशी टैक्स हेवन में भारतीयों के काले धन का मुद्दा गरमा गया था। सुप्रीम कोर्ट में राम जेठमलानी और अन्य लोगों ने याचिका दाखिल की कि सरकार ढंग से जांच नहीं कर रही।
तब न्यायमूर्ति रेड्डी की बेंच ने इस पर कड़ा रुख लिया। उन्होंने फैसले में साफ कहा, सरकार ढीला रवैया नहीं अपना सकती। विदेशों में जमा काले धन की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) बनाया जाए। इस जांच दल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज करें ताकि जांच निष्पक्ष हो।
फैसले से पहली बार काले धन का मुद्दा केवल राजनीतिक नारा नहीं रहा, बल्कि न्यायपालिका ने उस पर ठोस कार्रवाई की।
आर टी आई एक्ट आने के बाद सवाल उठा कि क्या जजों को अपनी संपत्ति की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए?
तब न्यायमूर्ति रेड्डी ने इस मुद्दे को बड़े बेंच को भेजा। उन्होंने कहा कि ये सवाल बहुत गंभीर है, एक तरफ न्यायपालिका की स्वतंत्रता है तो दूसरी ओर पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग है।
फैसले से न्यायिक पारदर्शिता पर बहस तेज हुई। आगे चलकर कई जजों ने स्वेच्छा से अपनी संपत्ति का खुलासा करना शुरू किया.

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