इस सप्ताह 38 से 40 डिग्री सैल्सियस तापमान होने की संभावना 

दुधारु गायों में थनैला बीमारी होने की बढ़ जाती संभावना 

समस्तीपुर पूसा डा राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविधालय स्थित जलवायु परिवर्तन पर उच्च अध्ययन केंद्र के ग्रामीण कृषि मौसम सेवा एवं भारत मौसम विज्ञान विभाग के सहयोग से जारी 03-07 अप्रैल, 2024 तक के मौसम पूर्वानुमान की अवधि में उत्तर बिहार के जिलों में आसमान प्रायः साफ तथा मौसम के शुष्क रहने कि संभावना है। इस अवधि में अधिकतम तापमान तथा न्यूनतम तापमान दोनों में वृद्धि हो सकती है, जिसके कारण अधिकतम तापमान 38-40 डिग्री सेल्सियस के बीच रह सकता है। जबकि न्यूनतम तापमान 19-24 डिग्री सेल्सियस के आस-पास रह सकता है।
पूर्वानुमानित अवधि में औसतन 14 से 16 कि०मी० प्रति घंटा की रफ्तार से पछिया हवा चलने की सम्भावना है। सापेक्ष आर्द्रता सुबह में 65 से 75 प्रतिशत तथा दोपहर में 35 से 45 प्रतिशत रहने की संभावना है।
मौसम वैज्ञानिक ने किसानों को समसामयिक सुझाव देते हुए कहा कि पूर्वानुमानित अवधि में मौसम की शुष्क रहने की संभावना को देखते हुए तैयार फसलों की कटनी के कार्य को उच्च प्राथमिकता देकर संपन्न करे। पूर्वानुमानित मौसम में तापमान के तेजी से बढ़ने के कारण फसलों में पानी की मांग बढ़ सकता है। खड़ी फसलों में आवश्यकतानुसार सिचाई करें। गरमा सब्जियों जैसे भिन्डी, नेनुआ, करेला, लौकी (कद्दू), और खीरा की बुआई अविलंब संपन्न करें। बिगत माह बोयी गई सब्जियों की फसल में आवश्यकतानुसार निकाई-गुड़ाई करें। इन फसलों में कीट की निगरानी करें। कीट का प्रकोप फसल में दिखने पर मैलाथियान 50 ई०सी० या डाइमेथोएट 30 ई०सी० दवा का 1 मि० ली० प्रति लीटर पानी की दर से घोलकर छिड़काव करें।
लत्तर वाली सब्जियों जैसे नेनुआ, करैला, लौकी (कद्दू), और खीरा में लाल मूंग कीट से बचाव हेतु डाइक्लोरवाँस 76 इ०सी०/1 मि०ली० प्रति ली० पानी की दर से घोलकर छिड़काव करे। गाय के गोबर की राख में थोड़ा किरासन मिलाकर पौधों पर सुबह में मुरकाव करने से इस कीट का आक्रमण कम हो जाता है।
गरमा मूंग तथा उरद की बुआई प्राथमिकता देकर 10 अप्रैल से पहले संपन्न करें। खेत की जुताई में 20 किलो ग्राम नेत्रजन, 45 किलोग्राम स्फूर, 20 किलोग्राम पोटाष तथा 20 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से व्यवहार करें। मूंग के लिए पूसा विशाल, सम्राट, एस०एम०एल०-668, एच०यू०एम०-16 एवं सोना तथा उरद के लिए पंत उरद 19, पंत उरद-31, नवीन एवं उत्तरा किस्में बुआई के लिए अनुशंसित हैं। बुआई के दो दिन
पूर्व बीज को कार्बेन्डाजीम 2.5 ग्राम प्रति किलो ग्राम की दर से शोधित करें। बुआई के ठीक पहले शोधित बीज को उचित राईजोबियम कल्चर से
उपचारित कर बुआई करें। बीजदर छोटे दानों के प्रभेदों हेतु 20-25 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर तथा बड़े दानों के प्रभेदों हेतु 30-35 किलो ग्राम प्रति
हेक्टेयर रखें। बुआई की दूरी 30×10 से०मी० रखें। आम में मटर के दाने के बराबर फल लग चुके है। इस अवस्था में इमिडाक्लोरप्रीड (17.8 एस०एल०) /1 मि०ली० दवा प्रति 2 लीटर पानी में और हैक्साकोनाजोल 1 ग्राम 2 लीटर पानी या डाइनोकैप (46 ई०सी०) 1 मिली दवा प्रति 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़कने से मधुवा एवं चूर्णिल आसिता की उग्रता में कमी आती है। प्लेनोफिक्स नामक दवा/1 मिली प्रति 3 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से फल के गिरने में कमी आती है। ओल की फसल की बुआई करें। बुआई के लिए गजेन्द्र किस्म अनुशंसित है। प्रत्येक 0.5 किलोग्राम के कन्द की रोपनी के लिए दूरी 75×75 से० मी० रखें। 0.5 किलोग्राम से कम वजन की कंद की रोपाई नहीं करे। वीज दर 80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से रखें। बुआई से पूर्व प्रति गड्‌ढ़ा 3 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर, 20 ग्राम अमोनियम सल्फेट या 10 ग्राम युरिया, 37.5 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट एवं 16 ग्राम पोटेशियम सल्फेट का व्यवहार करे। ओल की कटे कन्द को ट्राइकोर्डमा भिरीडी दवा के 5.0 ग्राम प्रति लीटर गोबर के घोल में मिलाकर 20-25 मिनट तक डुबोकर रखने के बाद कन्द को निकालकर छाया में 10-15 मिनट तक सुखने दें उसके बाद उपचारित कन्द को लगायें ताकि मिट्टी जनित बीमारी लगने की संभावना को रोका जा सके तथा अच्छी उपज प्राप्त हो सके।
प्याज फसल में थ्रिप्स कीट की निगरानी करें। थ्रिप्स प्याज को नुकसान पहुँचाने वाला मुख्य कीट है। यह आकार में अतिसुक्ष्म होता है तथा यह पत्तियों की सतह पर चिपक कर रस चुसते है जिससे पत्तियों पर दाग दिखाई देते है जो बाद में हल्के सफेद हो जाते है। थ्रिप्स की संख्या अधिक पाये जाने पर प्रोफेनोफॉस 50 ई०सी० दवा का 1.0 मि०ली० प्रति लीटर पानी या इमिडाक्लोप्रिड दवा का 1.0 मि०ली० प्रति 4 लीटर पानी की दर से घोलकर छिड़काव करें।
वहुवर्षीय चारा फसल जैसे हाइब्रीड नेपीयर एवं गिनिया घास लगाने के लिए मौसम अनुकूल है। इन चारा फसलों की बुआई करें। इस मौसम में दुधारु गायों में थनैला बिमारी होने की संभावना बढ़ जाती है। थनों एवं दूध के रंग में बदलाव आने पर तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह से उपचार करवायें।

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